तन पे मलमल सी पड़ती फुहारें, भीग गया मेरा मन- कैलाश खेर

अजय विद्युत।

आइए बारिशों का मौसम है। सूरज चाचा ने जितना तपाना था तपा लिया। अब ठंडी बूंदों का जादुई असर है जो या तो आपको बचपन में ले जाता है या जवानी में। बूढ़ा तो किसी को होने ही नहीं देता। जैसे नए सिरे से जीवन की शुरुआत। खुशी को हम गाकर या नाचकर ही व्यक्त करते हैं। सो बारिश में भी एक से एक गीत हैं जो प्रकृति के और प्रणय के सूत्रों से जीवन को गूंथते हैं। आज संगीत का एक बड़ा स्रोत एफएम रेडियो है। युवाओं में पढ़े लिखे, आधुनिक और पश्चिमी फैशन से प्रभावित लोग भी बारिश के मौसम में पुराने गाने ही ज्यादा सुनते हैं। वजह क्या है। नए बन नहीं रहे या भा नहीं रहे। बारिश हो तो इस बर्गर-पिज्जा युग में भी पकोड़ा ही क्यों याद आता है? ये तमाम बातें भी करेंगे हम। प्रकृति के साथ संपूर्ण मानवता के इस उत्सव में इस बार हमारे साथ हैं जाने-माने गायक कैलाश खेर ।

वर्षा ऋतु में ऐसा क्या खास है कि इसका सम्मोहन सबको बांधता है?

वर्षा ऋतु बहुत धनी ऋतु मानी गई है। सबको भिगोती है न! देखिए साहेब जब आप स्वयं अमीर होंगे, छके होंगे, तभी किसी को खिला सकते हैं। वर्षा ऐसी ही ऋतु है। सबको खिलाती है, छकाती है। एक बड़ी बात यह है कि खुशी किसी आयु विशेष तक सीमित नहीं होती। जिस प्रकार बच्चों में खुशी का प्रतिपादन होता है, मौसमों से उसी प्रकार बड़ों, युवाओं में भी होता है। प्रकृति का जो प्रभाव होता है उसमें किसी भी आयु विशेष को छोड़ा नहीं जा सकता। जब मनुष्य नृत्य करता है खुशी में तो फिर बालक भी नृत्य करता है और बुजुर्ग भी नृत्य करता है। पक्षी भी नृत्य करता है और दादुर, मोर, झींगुरवा भी। चूंकि यह मौसम प्रेरित करता है संगीत उत्पादित करने को तो हमारे भारत में लाखों गाने मौसमों से उत्गृत हैं खासकर वर्षा ऋतु से। हमारे जीवन में तो वर्षा ऋतु का बहुत ही गजब महत्व है। युवाओं को यह रोमांच देती है और यह रोमांच श्रृंगार रस की ओर ले जाता है। रोमांटिक बना देता है। संगीत जो हमारी धमनियों में होता है वह आता ही प्रकृति से है। प्रकृति का अहम हिस्सा होते हैं मौसम। मौसमों से बनती हैं ऋतुएं। और ऋतुओं से हमें प्रेरणा बहुत मिलती है गाने की। जैसे-

सुन री सखी जिया की बिथा

पिया बिना कैसे करूं मैं सिंगार

बोलन लागी पपिहरा रे

मुरवा दादुरवा झिंगार।

तो इसमें विरह की बात भी की जा रही है। लेकिन यह है रोमांटिक। दादुरवा मोवा झींगुरवा ये सब बोल रहे हैं कि हे सखी कितनी झमाझम वर्षा हो रही है और पिया यहां कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।

आधुनिक संस्कृति और सरोकारों से जुड़े युवाओं की पसंद एफएम चैनल में पुराने गानों का प्रतिशत अधिक रहता है?

हां, उन्हें पुराने गाने अभी भी इसीलिए ज्यादा पसंद आ रहे हैं क्योंकि माल नया आ नहीं रहा है बाजार में। आ भी रहा है तो कूड़ा आ रहा है माल के नाम पर।

मॉडर्न युवाओं को बारिश पर जो आधुनिक संगीत पसंद आ रहा है मोहरा फिल्म का ‘टिप टिप बरसा पानी’ वह भी बीस साल पुराना है?

यह गाना मैंने सुना नहीं है। टु बी वेरी आॅनेस्ट। जो गाना आप बता रहे हैं टिप टिप बरसा पानी इसके अगर आप विजुअल हटा दो तो पचास फीसदी तो यह वैसे ही मर जाएगा। अगर आप कुछ अंग दिखाएंगे सम्मोहित करने वाले, आपकी पिपासा और कामाग्नि को जगाने वाले विजुअल दिखाएंगे तो बेशक आप थोड़ी बहुत बदतमीजी वाले शब्द भी चिपका देंगे तो फिर लोगों को ऐसा लगता है कि कोई भजन ही चल रहा है यह भी। इसमें ऐसी कोई मुश्किल नहीं है। यह इसलिए क्योंकि मनुष्य इंद्रियों का गुलाम है। इंद्रिय सुखों में सब जकड़े हुए हैं। तो उसके लिए लोग जस्टिफिकेशन खुद लोग देने लगते हैं- दिस इज नॉट बैड टाइप आॅफ सॉन्ग। इट्स ओके। इससे पहले भी काफी गाने बनते थे इस तरह के। है न… अब मजा तो दे ही रहा है न सबको।

यूथ पहनावे, बोली, भाषा, लाइफ स्टाइल से कितना भी आधुनिक हो गया हो, लेकिन पुरानी मेलोडी ही क्यों असर करती है उस पर?

अब हमारी बात सुनिये गहरे में। हम कितने भी मॉडर्न हो जाएं लेकिन खांसी हो जाए तो लहसुन भून के जो मां खिलाती थी, दादी खिलाती थी वह फार्मूले तो कभी पुराने होंगे नहीं। बेशक समय, प्रवृत्तियां, हमारे फैशन और लाइफ स्टाइल बदल जाएं, लेकिन प्रकृति का जो सत्य है वह कभी बदलता नहीं। पुरानी मेलोडी में प्रकृति का असर होता था, एक सत्य होता था।

हमारा एक गाना 2007 में रिलीज हुआ था चेरापूंजी नाम से। शब्द देखें-

तीखी तीखी नुकीली सी बूंदें/ बहके बहके से बादल उनींदें/ गीत गाती हवा में/ गुनगुनाती घटा में/ भीग गया मेरा मन… मस्तियों के घूंट पी/ शोखियों में तैर जा/ इश्क की गलियों में आ/ इन पलों में ठहर जा/ रब का है ये आइना/ शक्ल हां इसको दिखा/ जिंदगी घुड़दौड़ है/ दो घड़ी ले ले मजा… चमके चमके ये झरनों के धारे/ तन पे मलमल सी पड़ती फुहारें/ पेड़ हैं मनचले से/ पत्ते हैं चुलबुले से/ भीग गया मेरा मन….

गजब का लोकप्रिय हुआ। लंदन के पास एक जगह है न्यू कैसल। वहां रहने वाले हमारे एक फैन को यह गाना इतना भाया कि उसने इस एक गाने के चक्कर में वहां हमारा शो कराया था। हमारे लाखों फैन्स कहते हैं कि जब बारिश आती है तो फिल्मों के अलावा केवल एक गाना हमें समझ में आता है- भीग गया मेरा मन। अध्यात्म से रचा गया गाना है लेकिन है पूरी तरह रोमांटिक। तो गुणवत्ता की अभी भी कमी नहीं है। लेकिन कभी कभी ओछी चीजों का बाजारीकरण बहुत अच्छी तरह से हो जाता है और हिट हो जाती हैं। लेकिन नया नौ दिन और पुराना सौ दिन वह अपनी जगह अभी भी सटीक है।

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