जदयू के आधार वोटर होंगे निर्णायक

सासाराम सुरक्षित संसदीय सीट पर आजादी से लेकर साल 1986 तक बाबू जगजीवन राम का आधिपत्य रहा. हाल यह था कि चुनाव में उनके खिलाफ  सारे जातीय समीकरण धरे के धरे रह जाते थे. चाहे वह कांग्रेस के टिकट पर मैदान में आ जाएं या जनता पार्टी या अपने दल कांग्रेस-जे से. उनका व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार एवं राजनीतिक पकड़ ही वोटरों  की गोलबंदी के लिए पर्याप्त होते थे. उनके बाद हुए छेदी पासवान, मीरा कुमार एवं मुन्नी लाल राम ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन किसी में वह बात नहीं दिखी कि उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वोटरों ने अपनी सहमति जताई हो, हमेशा जातीय समीकरणों के सहारे ही उम्मीदवारों की नैया पार लगी.

इस बार भी वही कहानी दोहराई जाने वाली है. पिछले चुनाव में लगभग 63 हजार वोटों से छेदी पासवान भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. भाजपा ने उनका मीरा कुमार को हराने का रिकॉर्ड देखकर उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था, रही-सही कसर मोदी लहर ने पूरी कर दी. उस चुनाव में जदयू के उम्मीदवार केपी रमैया ने 93 हजार वोट पाकर सभी राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था, क्योंकि उनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी. वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे. रमैया जब सासाराम सीट पर इतने वोट ले आए, तो सबकी जुबान पर एक ही बात थी कि ये जदयू के आधार वोट हैं. इस बार जदयू भाजपा के साथ है, इसलिए उसके वोटरों को भी एनडीए का हिस्सा माना जा रहा है. लेकिन, कुर्मी के अलावा अति पिछड़ा वर्ग की कुछ जातियां हैं, जिन पर महागठबंधन की काग दृष्टि लगी हुई है. अति पिछड़ा वर्ग से भाजपा के चैनपुर विधायक ब्रज किशोर बिंद अच्छी पकड़ वाले नेता माने जाते हैंं. चेनारी, चैनपुर एवं भभुआ विधानसभा क्षेत्रों में बिंद जाति के वोटरों की संख्या उल्लेखनीय है.

इसके अलावा अन्य अति पिछड़ी जातियां भाजपा एवं महागठबंधन, दोनों के निशाने पर हैं, जिनके लिए जोर-आजमाइश जारी है. दलितों में रविदास एवं पासवान वोटों को लेकर कहीं कोई संदेह नहीं, वे अपने स्वजातीय उम्मीदवारों के साथ रहेंगे, लेकिन मैदान में कूदे अशोक बैठा एवं उनके स्वजातीय रासपा (सेकुलर) के संजीव कुमार के कारण जाति के वोटरों की गोलबंदी बिखर सकती है. बहुजन समाज पार्टी के मनोज राम भले ही नए उम्मीदवार हैं, लेकिन पार्टी के आधार वोटों के चलते महागठबंधन का कुछ नुकसान हो सकता है. कुल मिलाकर इस बार लड़ाई इसलिए दिलचस्प है, क्योंकि दोनों पुराने विरोधी चेहरे मैदान में हैं और उनके साथ संजीव कुमार, मनोज राम एवं अशोक बैठा जैसे उम्मीदवार भी हैं, जिनके साथ जमीन से जुड़ी पार्टियों एवं कार्यकर्ताओं का समर्थन है, जो चुनाव परिणाम ही प्रभावित नहीं कर सकते, बल्कि उसमें उलट-फेर करने की ताकत भी रखते हैं.

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