भारत तक सड़क-रेल नेटवर्क चाहता है चीन

ओपिनियन पोस्ट
Thu, 19 Apr, 2018 17:47 PM IST

नई दिल्ली।

विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज 22 अप्रैल को चीन की यात्रा पर हैं और इस दौरान चीन उन्‍हें चीन-पाकिस्‍तान इकोनॉमिक कॉरीडोर (सीपीईसी) तरह के एक प्रोजेक्‍ट के लिए लुभाने की कोशिश कर सकता है। चीन से पाकिस्तान तक जाने वाले वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) पर भारत के विरोध का समाधान निकालने के लिए चीन का यह नया दांव हो सकता है। उसने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर की तर्ज पर चीन-नेपाल-भारत के बीच एक कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव रखा है।

पाकिस्तान और चीन के बीच बनने वाले ओबीओआर या बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का भारत विरोध कर रहा है, क्योंकि यह भारत की संप्रभुता वाले इलाके पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा, ‘हमारा मानना है कि इस तरह के अच्छे विकसित नेटवर्क से चीन, नेपाल और भारत के बीच एक आर्थिक कॉरिडोर तैयार करने के लिए दशाएं तैयार की जा सकती हैं।’

उन्होंने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि इस तरह के सहयोग से तीनों देशों में विकास और समृद्ध‍ि को बढ़ावा दिया जा सकेगा।’ असल में चीन के नेता वहां के दौरे पर जाने वाले नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली द्वारा चीनी प्रोजेक्ट के लिए दिखाए गए उत्साह से काफी खुश दिख रहे हैं।

वांग ने ग्यावली के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘चीन और नेपाल एक बहुपक्षीय हिमालय पार संपर्क नेटवर्क बनाने के दीर्घकालिक दृष्ट‍िकोण पर सहमत हुए हैं। मेरा यह सपना है कि एक आधुनिक ट्रेन में बैठकर चीन से नेपाल जाऊं और रास्ते की सारी खूबसूरती को देखूं। इस प्रोजेक्ट से बुनियादी ढांचे का भी विकास होगा, रेलवे और सड़क से सीमा पार संपर्क बढ़ेगा। व्यापार, पर्यटन और निवेश बढ़ेगा और जनता के बीच भी परस्पर संपर्क बढ़ेगा।’

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चीन को लगता है कि नेपाल से उसके इस बारे में होने वाले सौदों से भारत के लिए बीआरआई को स्वीकार करने का दबाव बढ़ेगा। चीन अपने रेल नेटवर्क को बढ़ाकर नेपाल के लुंबिनी तक ले जाना चाहता है जो भारतीय सीमा के बहुत करीब है। चीन का मानना है कि इससे चीनी माल को भारत पहुंचाने में भी आसानी होगी।

चीन को यह भी उम्‍मीद है कि नेपाल, भारत पर बीआरआई और इसके निर्माण कार्य को स्‍वीकारने में भारत पर दबाव डाल सकता है। चीन, पाकिस्‍तान से बाहर बीआरआई को स्‍वीकार्यता दिलाने के लिए काफी बेसब्र है। हालांकि कई देशों की ओर से इस प्रोजेक्‍ट पर इसकी लागत की वजह से चिंता भी जताई जा चुकी है।

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