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स्वाधीन भारत की राष्ट्रभाषा होगी हिंदी : सुभाष चंद्र बोस

महात्मा गांधी के सभापतित्व में 29 दिसंबर 1928 को कलकत्ता में राष्ट्रभाषा सम्मेलन का अधिवेशन हुआ था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वागत समिति के सभापति थे। यह उनका हिंदी में स्वागत भाषण है।

हिंदी प्रेमियों,

बड़ी खुशी के साथ इस नगर में हम लोग आपका स्वागत करते हैं। जो सज्जन कलकत्ते से वाकिफ हैं, उनको यह बताने की जरूरत नहीं है कि कलकत्ते में पांच लाख हिंदी भाषा भाषी रहते हैं। शायद हिंदुस्तान के किसी भी प्रांत में-जो प्रांत हिन्दीवालों के घर हैं, उनमें भी कहीं इतने हिंदुस्तानी जबान बोलने वाले नहीं पाए जाते। साहित्य की दृष्टि से भी कलकत्ते का स्थान हिंदी के इतिहास में बहुत ऊंचा है। मैं हिंदी भाषा का पंडित नहीं हूं- बडेÞ खेद के साथ यह बात भी मुझे स्वीकार करनी पड़ेगी कि मैं शुद्ध हिंदी बोल भी नहीं सकता इसलिए आप मुझसे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि मैं हिंदी साहित्य के इतिहास के विषय में कुछ कहूं। अपने मित्रों से मैंने सुना है कि आजकल के हिंदी गद्य का जन्म कलकत्ते में ही हुआ था। लल्लू लाल ने अपना ‘प्रेम सागर’ इसी नगर में बैठकर बनाया और सदल मिश्र ने ‘चन्द्रावली’ की रचना भी यहीं पर की। और यही दोनों सज्जन हिंदी गद्य के आचार्य माने जाते हैं। हिंदी का सबसे पहला प्रेस कलकत्ते में ही बना और सबसे पहला अखबार ‘बिहार-बंधु’ भी यहीं से निकला। इसीलिए हिंदी संपादन-कला के इतिहास में कलकत्ते का स्थान बहुत ऊंचा है। सबसे पहले कलकत्ता विश्वविद्यालय ने ही हिंदी को एमए में स्थान दिया। आजकल भी हिंदी के लिए कलकत्ते में जो काम हो रहा है वह महत्त्वपूर्ण है। इसलिए जिनकी मातृभाषा हिंदी है, कलकत्ता उनके लिए घर जैसा ही है। कम से कम वे तो हमारे स्वागत की त्रुटियों या अभाव के लिए हमें क्षमा कर ही देंगे।

सबसे पहले मैं गलतफहमी दूर कर देना चाहता हूं। कितने ही सज्जनों का ख्याल है कि बंगाली लोग या तो हिंदी के विरोधी होते हैं या उसके प्रति उपेक्षा करते हैं। बेपढ़े लोगों में ही नहीं, बल्कि सुशिक्षित सज्जनों के मन में भी इस प्रकार की आशंका पाई जाती है। यह बात भ्रमपूर्ण है और इसका खंडन करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं।

मैं व्यर्थ अभिमान नहीं करना चाहता पर इतना तो अवश्य कहूंगा कि हिंदी साहित्य के लिए जितना काम बंगालियों ने किया है उतना हिंदीभाषी प्रांत को छोड़कर और किसी प्रांत के निवासियों ने शायद ही किया हो। यहां मैं हिंदी प्रचार की बात नहीं करता, उसके लिए स्वामी दयानंद ने जो कुछ किया और महात्मा गांधी जी जो कुछ कर रहे हैं, उसके लिए हम सब उनके कृतज्ञ हैं, पर हिंदी साहित्य की दृष्टि से कहता हूं बिहार में हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार के लिए स्वर्गीय भूदेव मुखर्जी ने जो महान उद्योग किया था, क्या उसे हिंदी भाषा-भाषी भूल सकते हैं? और पंजाब में स्वर्गीय नवीनचंद्र राय ने जो प्रयत्न किया, क्या वह कभी भुलाया जा सकता है। मैंने सुना है कि यह काम इन दोनों बंगालियों ने 1880 के लगभग ऐसे समय में किया था, जब कि बिहार और पंजाब के हिंदी भाषा-भाषी या तो हिंदी के महत्त्व को समझते ही न थे, अथवा उसके विरोधी थे। ये लोग उत्तरी भारत में हिंदी आंदोलन के पथ-प्रदर्शक कहे जा सकते हैं।
संयुक्त प्रांत में इंडियन प्रेस के स्वामी स्वर्गीय चिंतामणि घोष ने प्रथम सर्वश्रेष्ठ मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ द्वारा और पचासों हिंदी ग्रन्थों को छपवाकर हिंदी साहित्य की जितनी सेवा की है, उतनी सेवा हिंदी भाषा-भाषी किसी प्रकाशक ने शायद ही की होगी। जस्टिस शारदाचरण मिश्र ने एक लिपि विस्तार परिषद को जन्म देकर और ‘देवनागर’ पत्र निकालकर हिंदी के लिए प्रशंसनीय कार्य किया था। ‘हितवार्ता’ के स्वामी एक बंगाली सज्जन ही थे और ‘हिंदी बंगवासी’ अब भी इसी प्रांत के एक निवासी द्वारा निकाला जा रहा है। आजकल भी हमलोग थोड़ी-बहुत सेवा हिंदी साहित्य की कर ही रहे हैं। कौन ऐसा कृतघ्न होगा जो श्री अमृतलाल जी चक्रवर्ती की, जो 45 वर्ष से हिंदी पत्र सम्पादन का कार्य कर रहे हैं, हिंदी सेवा को भूल जावे? श्री नगेन्द्रनाथ बसु लगभग 15 वर्ष से हिंदी विश्वकोश द्वारा हिंदी की सेवा कर रहे हैं। श्री रामानंद चटर्जी ‘विशाल भारत’ द्वारा हिंदी की सेवा कर रहे हैं। हमारी भाषा के जिन पचासों ग्रंथों का अनुवाद हिंदी में हुआ है और उनसे हिंदी-भाषा- भाषियों के ज्ञान में जो वृद्धि हुई है उसकी बात मैं यहां नहीं कहूंगा।

मैं शेखी नहीं मारता, व्यर्थ अभिमान नहीं करता, पर मैं नम्रतापूर्वक आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या यह सब जानते हुए भी कोई यह कहने का साहस कर सकता है कि हम लोग हिंदी के विरोधी हैं? मैं इस बात को मानता हूं कि बंगाली लोग अपनी मातृभाषा से अत्यंत प्रेम करते हैं और यह कोई अपराध नहीं है। शायद हममें से कुछ ऐसे आदमी भी हैं, जिन्हें इस बात का डर है कि हिंदीवाले हमारी मातृभाषा बंगला को छुड़ाकर उसके स्थान में हिंदी रखवाना चाहते हैं। यह भी निराधार है। हिंदी प्रचार का उद्देश्य केवल यही है कि आजकल जो काम अंग्रेजी से लिया जाता है, वह आगे चलकर हिंदी से लिया जाए। अपनी माता से भी प्यारी मातृभाषा बंगला को तो हम कदापि नहीं छोड़ सकते। भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों के भाइयों से बातचीत करने के लिए हिंदी या हिंदुस्तानी तो हमको सीखनी ही चाहिए और स्वाधीन भारत के नवयुवकों को हिंदी के अतिरिक्त जर्मन, फ्रेंच आदि यूरोपीय भाषाओं में से भी एक-दो सीखनी पड़ेगी, नहीं तो हम अंतरराष्ट्रीय मामलों में दूसरी जातियों का मुकाबला नहीं कर सकेंगे।

महात्मा गांधी जी से और आप लोगों से मैं प्रार्थना करूंगा कि हिंदी प्रचार का जैसा प्रबंध आपने मद्रास में किया है, वैसा बंगाल और आसाम में भी करें। स्थायी कार्यालय खोलकर आप लोग बंगाली छात्रों और कार्यकर्ताओं को हिंदी पढ़ाने का इंतजाम कीजिए। इस कलकत्ते में कितने ही बंगाली छात्र हिंदी पढ़ने के लिए तैयार हो जाएंगे। पढ़ाने वाले चाहिए। बंगाल धनवान प्रांत नहीं है और न यहां के छात्रों के पास इतना पैसा है कि वे शिक्षक रखकर हिंदी पढ़ सकें। यह कार्य तो अभी आप लोगों को ही करना होगा। अगर कलकत्ते के धनी-मानी हिंदी भाषा-भाषी सज्जन इधर ध्यान दें, तो कलकत्ते में ही नहीं, बंगाल तथा आसाम में भी हिंदी का प्रचार होना कोई बहुत कठिन काम नहीं है। आप बंगाली छात्रों को छात्रवृत्ति देकर हिंदी प्रचारक बना सकते हैं। बोलचाल की भाषा चार-पांच महीने में पढ़ाकर और फिर परीक्षा लेकर आप लोग हिंदी का कोई प्रमाण-पत्र दे सकते हैं। मेरे जैसे आदमी को भी, जिसे समय बहुत कम मिलता है, आप हिंदी पढ़ाइए और फिर परीक्षा लीजिए। हम लोग, जो मजदूर आंदोलन में काम करते हैं, हिंदुस्तानी भाषा की जरूरत को हर रोज महसूस करते हैं। बिना हिंदुस्तानी भाषा जाने हम उत्तरी भारत के मजदूरां के दिल तक नहीं पहुंच सकते। अगर आप हम सब के लिए हिंदी पढ़ाने का इंतजाम कर देंगे, तो मैं यह विश्वास दिलाता हूं कि हम लोग आप के योग्य शिष्य होने का भरपूर प्रयत्न करेंगे।

अंत में बंगाल के निवासियों से और खासतौर से यहां के नवयुवकों से मेरा अनुरोध है कि आप हिंदी पढ़ें, जो लोग अपने पास से शिक्षक रखकर पढ़ सकते हैं, वे वैसा करें। आगे चलकर बंगाल में हिंदी प्रचार का भार उन्हीं पर पड़ेगा, यद्यपि अभी हिंदी प्रांतों से सहायता लेना अनिवार्य है। दस-बीस हजार या लाख-दो लाख आदमियों के हिंदी पढ़ लेने का महत्त्व केवल पढ़ने वालों की संख्या तक ही निर्भर नहीं है। यह कार्य बड़ा दूरदर्शितापूर्ण है और इसका परिणाम बहुत दूर आगे चलकर निकलेगा। प्रांतीय ईर्ष्या, विद्वेष को दूर करने में जितनी सहायता इस हिंदी प्रचार से मिलेगी उतनी दूसरी किसी चीज से नहीं मिल सकती।

अपनी-अपनी प्रांतीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए, उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं पर सारे प्रांतों की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी या हिंदुस्तानी को ही मिले। नेहरू-रिपोर्ट में भी इसी की सिफारिश की गई है। यदि हम लोगों ने तन-मन-धन से प्रयत्न किया तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी हिंदी।

(कलकत्ता से प्रकाशित ‘विशाल-भारत’ के जनवरी 1929 अंक में प्रकाशित) 

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