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मनुष्य, पशु और कानून

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पशुओं के अधिकार के संबंध में जो फैसला दिया है वो सराहनीय तो है लेकिन सवाल है कि हम जिस तरह के भौतिक संसार के निर्माण में लगे हैं उसमें क्या किसी कानून के जरिये पशुओं से आत्मीय संबंध बनाए जा सकते हैं।

बनवारी

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने हाल ही में एक प्रशंसनीय फैसला सुनाया है। अदालत ने जानवरों को मनुष्य जैसा कानूनी दर्जा देते हुए कहा है कि कानून की दृष्टि में उनके भी मनुष्य जैसे अधिकार हैं और उनके साथ मनमाना अत्याचार नहीं किया जा सकता। आर्थिक उन्नति के उतावलेपन में जब हम जानवरों और अन्य प्राणियों के अस्तित्व को बिल्कुल ही भुला बैठे हैं, यह निर्णय महत्वपूर्ण है और इसे अदालतों के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। यह फैसला जस्टिस राजीव शर्मा और लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने सुनाया है। अपने 57 पृष्ठ के फैसले में उन्होंने पशुओं के प्रति व्यवहार को नियमित और मर्यादित करने की कोशिश की है। हालांकि यह दावा कोई नहीं कर सकता कि हाई कोर्ट के इस फैसले से राज्य में पशुओं के प्रति बरती जा रही क्रूरता और लापरवाही समाप्त हो जाएगी। लेकिन इस तरह के फैसलों की सबसे बड़ी उपयोगिता यही होती है कि ये समाज के एक बड़े वर्ग का ध्यान आकर्षित करते हैं। अगर उनमें से कुछ लोगों की भी पशुओं के प्रति मनुष्यों के दायित्व की भावना जगाई जा सके तो एक ऐसा वातावरण बन सकता है जहां राजकीय संस्थाएं और सामान्य नागरिक मिलकर पशुओं के लिए बेहतर परिस्थितियों का निर्माण कर सकें। लेकिन कठिनाई यह है कि हम जिस तरह का भौतिक संसार बना रहे हैं उसमें मनुष्यों के दूसरे मनुष्यों से आत्मीय संबंध पनपने की संभावना भी घटती जा रही है। ऐसे में मनुष्य का पशुओं से अब तक की जीवनशैली में जो स्वाभाविक और आत्मीय संबंध रहा है उसके फिर से पैदा होने की गुंजाइश कम ही रह जाती है।

भारत-नेपाल सीमा पर स्थित उत्तराखंड के चंपावत जिले के बनवासा कस्बे के निवासी नारायण दत्त भट्ट ने पशुओं के अधिकारों की रक्षा करने संबंधी याचिका हाई कोर्ट में दायर की थी। अपनी याचिका में भट्ट ने कहा था कि उनके कस्बे से नेपाल के लोगों और सामान को ले जाने के लिए तांगों का इस्तेमाल होता है। इन तांगों के मालिक अपने मुनाफे के चक्कर में अधिक सवारियां और भारी सामान भर लेते हैं। इससे तांगों में जोते गए जानवरों पर बड़ा अत्याचार होता है। याचिका में अदालत से अपील की गई थी कि सीमा पार के परिवहन में तांगों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी जानी चाहिए। यह याचिका उसी तरह की थी जिस तरह की मांग आजकल मानवाधिकार या पशु अधिकार वाले लोग करते रहते हैं और पशुओं के लिए न्याय के नाम पर वे मनुष्यों का पशुओं से संबंध ही समाप्त करवा देते हैं। यह अच्छी बात है कि उत्तराखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीशों ने उनकी इस मांग को मानने लायक नहीं समझा। इसकी जगह उन्होंने बनवासा की नगरपालिका को इस संबंध में उचित नियम बनाने के लिए कहा ताकि तांगों में जोते जाने वाले पशुओं के साथ अत्याचार न हो। पर इस याचिका का उपयोग उन्होंने कानून की परिधि बढ़ाने और उसमें पशुओं को भी उचित अधिकार दिए जाने के लिए किया।

अपने फैसले में कोर्ट ने पशुओं के लिए बनाए गए दो पुराने कानूनों का हवाला दिया। कोर्ट ने गोविंद बल्लभ पंत कृषि और प्रौद्योगिकी संस्थान पंत नगर के उप कुलपति को निर्देश दिया कि वे पशु चिकित्सा से संबंधित दो सबसे वरिष्ठ प्रोफेसरों की समिति बनाकर 12 सप्ताह में यह निर्णय दें कि पशुओं से संबंधित वर्ष 2001 के कानून में उनसे काम लेने के लिए उनके वजन को लेकर जो निर्देश दिए गए हैं, वे ठीक हैं कि नहीं। कोर्ट ने अधिक गर्मी और अधिक ठंड में जानवरों से काम लेने की मर्यादाएं भी बांधी। लेकिन इस सबसे ऊपर कोर्ट ने कहा कि पशुओं पर अत्याचार न हो, यह दायित्व राज्य के सभी मनुष्यों का है। इस दायित्व को कानूनी बल देते हुए कोर्ट ने आवश्यक बना दिया और राज्य को निर्देश दिया कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिससे जानवरों के आश्रय और पोषण की व्यवस्था हो। कामकाज में पशुओं का उपयोग करने वाले लोगों से कोर्ट ने कहा कि वे ऐसे नुकीले बेंत, हल या दूसरी चीजों का उपयोग न करें जिससे पशुओं को चोट पहुंच सकती हो, घाव लग सकता हो या खरोंच आ सकती हो। इतना ही नहीं अदालत ने यह निर्देश भी दिया कि पशुओं को हर दो घंटे में पानी और हर चार घंटे में कुछ चारा मिलना चाहिए ताकि वे प्यासे और कुपोषित न रहें।

कोर्ट ने कहा कि यह निर्णय उत्तराखंड सरकार के कृषि और पशुपालन मंत्रालय को ऐसी सब जगह भिजवानी चाहिए जहां पशुओं से संबंधित नियम बनाए जा सकते हैं। सभी शहरी क्षेत्रों में उसकी जानकारी यह कहते हुए भेजी जानी चाहिए कि इस निर्णय की भावना के अनुरूप नगर निगम और नगरपालिकाएं नियम आदि बनाएं। हालांकि अदालत के कुछ निर्देश समस्या भी पैदा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए न्यायाधीशों ने कहा है कि पशु चालित वाहन मशीनें नहीं हैं। फिर भी उन्हें सड़कों आदि के इस्तेमाल का अधिकार होना चाहिए। व्यस्त नगरों की बहुत सी सड़कें पशु चालित वाहनों के लिए प्रतिबंधित कर दी जाती हैं। नगरीय व्यवस्था को देखते हुए यह उचित भी है। लेकिन इस निर्णय को पूरी तरह लागू किया जाए तो समस्या आ सकती है। ऐसी स्थिति में व्यावहारिक रास्ता अपनाना पड़ता है। न्यायपालिका को भी उससे एतराज नहीं होगा।

अदालत के इस निर्णय की प्रशंसा करते हुए इस त्रासदी की ओर इशारा करना भी जरूरी है कि भारत जैसे देश में न्यायाधीशों को यह कहने की आवश्यकता पड़ी कि हमें सभी तरह के जानवरों चाहे वे स्थलचर हों, नभचर हों या जलचर, के प्रति व्यवहार करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका कानूनी दर्जा मनुष्य के बराबर ही है। संसार के सभी देशों में मनुष्य ने उन पशुओं से आत्मीय संबंध बनाए हैं जो उनके जीवन और उनके कामधाम में उनके सहयोगी रहे हैं। लेकिन भारत में मनुष्य का पशुओं से संबंध जितना गहरा और आत्मीय रहा है उसकी बराबरी संसार का कोई और समाज नहीं कर सकता। भारत में इसे मनुष्य के अच्छे और बुरे स्वभाव पर नहीं छोड़ दिया गया। भारत में उसकी दार्शनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक सभी स्तरों पर व्याख्या की गई। भारत में सभी मनुष्यों के स्वभाव में यह बात दृढ़तापूर्वक डालने की कोशिश की गई कि हमारा संबंध और हमारा दायित्व संसार के सभी प्राणियों से है, उन सबके प्रति अपने दायित्व निबाहने के कारण ही हम मनुष्य हैं। मनुष्य वही है जो विवेकपूर्वक आचरण करे और विवेक का आधार यह है कि उस परिस्थिति विशेष में हमारा धर्म क्या है।

न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में ईशावास्य उपनिषद आदि से उद्धरण देते हुए यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि भारत में सभी प्राणियों में आत्मभाव देखा गया है। लेकिन दार्शनिक स्तर पर भारतीय दृष्टि पश्चिमी दृष्टि से कितनी अलग है, यह कानून की परिधि में रहने वाले न्यायाधीश नहीं बता सकते थे। भारत की दार्शनिक मान्यता यह है कि समस्त सृष्टि प्राणियों का समूह है। यहां निर्जीव कुछ नहीं है। पत्थर भी प्राणी ही है। पिछली शताब्दी में पश्चिमी विज्ञान की प्रयोगशालायी दृष्टि से यह बात सिद्ध करने में जगदीश चंद्र बसु लगे रहे। उन्होंने परीक्षणों द्वारा यह समझाने की कोशिश की कि पेड़-पौधों ही नहीं, पत्थर में भी प्राण होता है और उन्हें सुख-दु:ख का अनुभव होता है। जबकि पश्चिमी दृष्टि मनुष्य पर केंद्रित है। मनुष्य में भी सभी मनुष्यों का समावेश नहीं है। यूनानी दर्शन में मनुष्य की परिभाषा एक तर्कशील प्राणी के रूप में की गई है और मान लिया गया है कि उत्पादन में लगे पुरुष और स्त्रियां तर्क की सामर्थ्य नहीं रखते। यूनानी नगर राज्य दास व्यवस्था पर आधारित थे जिसमें नगर की छोटी सी तर्कशील पुरुष आबादी ही पूर्ण मनुष्य मानी गई थी। शेष 90 प्रतिशत उत्पादन में लगे पुरुष और स्त्रियां मनुष्य से हीन दूसरे दर्जे की श्रेणी में डाल दिए गए थे। अंग्रेजी में इसे सबह्यूमन कहा जाता है। उत्पादन में लगे सभी लोगों को तो दास का ही दर्जा था और वे नगर राज्यों की कार्यप्रणाली में भाग नहीं ले सकते थे। कानून बनाने का अधिकार और सामर्थ्य नगर के तर्कशील माने गए पुरुषों का था। वे दूसरों को नियंत्रित करने के लिए जो कानून बनाते थे उसी में उसका दर्जा भी निर्धारित करते थे। अधिकांश मनुष्यों का दर्जा पशुओं के बराबर ही था। इसी दृष्टि के आधार पर रोमन कानून बना, उसी का कुछ परिवर्धित और परिष्कृत रूप आज के यूरोपीय कानूनों में देखा जा सकता है जिनकी नकल पर हमारे अपने कानून बने हैं।

ईसाई दृष्टि में भी मनुष्य दो वर्गों में विभाजित हैं। पहला वे जो ईसाई मत में ले आए गए और दूसरा वे जो उस मत में नहीं आए। इस दूसरे वर्ग को सामान्य मनुष्य का दर्जा नहीं दिया जाता था। यह स्थिति भारत के पश्चिम में बसी अधिकांश जातियों की रही है। उसकी तुलना में भारत और उससे पूर्व में यह दृष्टि रही है कि यह समूची सृष्टि देवमय है। जल, पृथ्वी, पशु, पक्षी, मनुष्य सभी का अधिष्ठान देव शक्तियां ही हैं इसलिए सबमें एक सा आत्मभाव है। भारत के पश्चिम में विभिन्न मतावलंबियों में जिस तरह का बैर भाव रहा है वैसा भारत और उसके पूर्व के देशों में नहीं रहा। भारत में तो सृष्टि को एक रूप में देखने की पराकाष्ठा रही है। हमारी अनेक महत्वपूर्ण देवशक्तियों का साक्षात्कार मानवेतर पशु-पक्षी के रूपों में किया गया। जापान के हर शिंटो मंदिर में एक छोटा मंदिर भगवान बुद्ध का होता है और हर बौद्ध मंदिर में एक प्रकोष्ठ शिंटो आस्था का। यही स्थिति चीन में रही है जहां सभी तीर्थ और पवित्र पर्वत ताओ और बौद्ध मंदिरों को साथ-साथ रखकर ही पुण्यदायी हुए हैं। भारत में जिस तरह का आत्मभाव पशु, वनस्पति और स्थावर जगत से देखा गया उसके लिए कानून की नहीं, धर्मबुद्धि जगाने की आवश्यकता थी। वही भारत में किया जाता रहा। भगवान शिव के मंदिरों में बाहर नंदी की प्रतिमा को प्रणाम किए बिना नहीं जाया जाता। यह समस्त वृषभ जाति से आत्मभाव बनाने का निमित्त बना रहा है।

कानून और धर्म का सबसे बड़ा अंतर यह है कि कानून राजा या राज्य बनाता है अन्य सबको नियंत्रित और निर्देशित करने के लिए। धर्म के लिए कानून की आवश्यकता नहीं है। जीवन के नियम क्या हों, यह शुद्ध अंत:करण में झांककर कोई भी समझ सकता है। उसकी सहायता के लिए पूर्व के शुद्ध अंत:करण वाले ऋषियों और मनीषियों ने कुछ नियम बनाए हैं पर वे बाध्यकारी नहीं हैं। केवल दिशा-निर्देश के लिए हैं। धर्म तर्क का नहीं, बोध का विषय है। इसलिए बिना किसी कानून के समस्त पशु जगत से आत्मीयता का भाव हमने धर्म मानकर रखा है। हर भारतीय अपनी पारिवारिक स्मृति के आधार पर यह जानता है कि भोजन बनाते समय पहली रोटी गाय के लिए निकालकर अलग कर दी जाती है और भोजन के समय कुछ कौर कुत्तों को अवश्य डाले जाते हैं। यह ध्यान रखा जाता रहा है कि गांव के सहजीवन में मनुष्य की ही तरह पशु-पक्षी भी हैं। कुएं के मेढक तक के लिए सामाजिक विधि-विधान रहे हैं। इस बात का ध्यान रखा जाता था कि पृथ्वी के भीतर रहने वाले कृमियों और चींटी आदि छोटे जीवों के पोषण की भी व्यवस्था बनी रहनी चाहिए। जिन पशुओं का हम अपने जीवन या उत्पादन तंत्र में उपयोग करते हैं, उनके साथ हमारा संबंध कैसा होता था इसकी एक मार्मिक गाथा प्रेमचंद की कहानी हीरा-मोती में है। हमारे पुराने साहित्य का बड़ा हिस्सा पशु और वनस्पति जगत के आत्मीय वर्णनों से भरा हुआ है। संसार में और किसी जाति के साहित्य में पशु और वनस्पति जगत के इतने विस्तृत, विविध और आत्मीय वर्णन नहीं मिलेंगे जितने कि संस्कृत के पुराने सभी तरह के ग्रंथों में मिलते हैं।

जिस भारत में इतनी विस्तृत व्यवस्थाएं खड़ी की गर्इं, वहां पशु जगत को मनुष्य के जीवन और दायित्व बोध का अंग बनाने के लिए हाई कोर्ट को यह कहना पड़े कि राज्य के सभी मनुष्य कानूनी रूप से पशुओं पर अत्याचार न करने और उनके सुख और पोषण की व्यवस्था करने के लिए विवश हैं, यह अपने आपमें कम आश्चर्य और ग्लानि की बात नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि पश्चिम जैसी समृद्धि को पाने के उतावलेपन में हम सबसे अपना संबंध खत्म करते चले जा रहे हैं। हम जिस तरह की वैज्ञानिक खेती की ओर मुड़ रहे हैं, उसमें पशुओं की जगह नहीं है। भारत में दुधारू पशुओं की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। इसका कारण यह है कि दूध जिस तरह भारतीयों के भोजन का अनिवार्य अंग है वैसा संसार में और कहीं नहीं है। लेकिन पिछले कुछ दशकों से हमारे गांव और शहर-कस्बों में जो परिवर्तन हुए हैं, उनके कारण पशुओं की चरागाहें समाप्त हो गई हैं। अब सभी के पशु खूंटों पर बंधे रहते हैं। पहले कृषि में उनके चारे की अलग से व्यवस्था होती थी। अब उनका चारा रूखा और पोषणहीन होता जा रहा है। न उन्हें बिनौला खाने को दिया जाता है, न अनाज से भरा शस्य। हम जिस तरह के शहर बना रहे हैं उनमें पक्षियों के रहने की कोई गुंजाइश नहीं बची। हमारी खेती, कल-कारखाने, रहन-सहन सब ऐसा होता जा रहा है जिसमें सामाजिकता ही लुप्त हो रही है। पशुओं से संबंध तो बाद की बात है। ऐसी स्थिति में उत्तराखंड हाई कोर्ट का यह निर्णय कितना प्रभावी होगा इसकी कल्पना की जा सकती है।

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