न्यूज फ्लैश

घूस लेने में अव्‍वल भारतीय पुलिस  

दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाले ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने कराया सर्वे

नई दिल्ली।

देश के 70 फीसद लोगों को भ्रष्‍टाचार का सामना करना पड़ता है, क्‍योंकि बिना घूस दिए उनका काम नहीं होता। यह अलग बात है कि अन्‍ना हजारे ने इस मुद्दे पर खूब हंगामा खड़ा किया था, लेकिन देश भर में जागरूकता आने के बावजूद भ्रष्‍टाचार बदस्‍तूर जारी है। दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाले ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के एक सर्वे के मुताबिक 10 में से करीब 7 भारतीयों को सार्वजनिक सेवाएं लेने के लिए किसी न किसी रूप में घूस देनी पड़ती है।

आंकड़ों की बात करें तो रिश्वतखोरी में भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अव्‍वल है। सर्वे के अनुसार भारत में 69 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें घूस देनी पड़ी। वियतनाम में ऐसा कहने वालों की संख्या 65 फीसदी, पाकिस्तान में 40 फीसदी और चीन में 26 फीसदी थी। रिश्वत देने की दर जापान में सबसे कम 0.2 फीसदी और दक्षिण कोरिया में केवल तीन फीसदी पाई गई। भारत में पुलिस विभाग सबसे ज्यादा भ्रष्ट है।

सर्वे में 73 फीसदी लोगों ने कहा कि पिछले कुछ सालों में उनके देश में रिश्वत का चलन बढ़ा है। रिश्वत के मामले में पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, जापान, म्यामांर, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देश भारत से नीचे रहे और भारत का स्थान सातवां रहा। एशिया प्रशांत क्षेत्र की करीब 90 करोड़ की आबादी वाले 16 देशों के 20 हजार से अधिक लोगों ने कहा कि उन्हें पिछले एक साल में कम से कम एक बार तो रिश्वत देनी ही पड़ी।

केवल 14 प्रतिशत भारतीयों ने कहा कि कोई भी धार्मिक नेता भ्रष्ट नहीं है, जबकि 15 प्रतिशत उनके भ्रष्ट तरीकों से वाकिफ नहीं थे। पुलिस के बाद पांच सर्वाधिक भ्रष्ट श्रेणी में सरकारी अधिकारी (84 प्रतिशत),  कारोबारी अधिकारी (79 फीसदी), स्थानीय पार्षद (78 प्रतिशत) और सांसद (76 फीसद) रहे, जबकि टैक्स अधिकारी छठे स्थान (74 फीसदी) पर हैं। जिन लोगों को सर्वे के दायरे में लिया गया उनमें से निर्धनतम 38 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने रिश्वत दी। सर्वे में लोगों से पूछा गया था कि उन्होंने कितनी बार रिश्वत दी, किस रूप में रिश्वत दी, किसे रिश्वत दी और क्यों रिश्वत दी।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अध्यक्ष जोस उगाज ने कहा, ‘सरकारों को अपनी भ्रष्टाचार निरोधक प्रतिबद्धताओं को हकीकत का रूप देने के लिए और अधिक प्रयास करने चाहिए। यह समय कहने का नहीं, बल्कि करने का है। लाखों लोग लोकसेवकों को रिश्वत देने के लिए बाध्य होते हैं और इस बुराई का सर्वाधिक असर गरीबों पर पड़ता है।’

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