जान बचाने के लिए नाचने को मजबूर आठ साल की मासूम

ओपिनियन पोस्ट
Mon, 05 Oct, 2015 15:54 PM IST

नवीन कुमार राय

 

फिल्म शोले में बसंती ‘जब तक है जान, जाने जहां’ के बोल पर नाचती है। इतना नाचती है कि उसके पांव से खून बहने लगता है। फिल्म में बसंती वीरू की जान बचाने के लिए नाचती है। असल जिंदगी में यह काम आठ साल की तनुश्री कर रही है- अपनी जान बचाने के लिए।  वह जो पैसा कमाती है, उससे खून खरीदती है। गरीब परिवार की यह मासूम थैलीसीमिया (रक्त कैंसर) की चपेट में है। हर महीने उसके शरीर का खून बदला जाता है, जिसमें चार हजार रुपये खर्च होते हैं। मां-बाप दोनों काम करते हैं, फिर भी इतना नहीं कमा पाते कि उसके इलाज का खर्च उठा सकें। पिता एक स्कूल में दो हजार रुपये की पगार पर दरबानी करते हैं, तो मां दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर अपना घर चलाती है।

पिता सपन चटर्जी की गोद में तनु
पिता सपन चटर्जी की गोद में तनु

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कैनिंग में सपन चटर्जी का घर है। फूस और टूटे खपरैलों के घर में रहने वाला यह परिवार बुनियादी सुविधाओं का मोहताज है। दो बेटियों और पत्नी रूपा के साथ रहने वाले सपन को उस वक्त गहरा धक्का लगा, जब डॉक्टरों ने बताया कि उसकी छोटी बेटी तनुश्री थैलीसीमिया से पीड़ित है। इलाज के चक्कर में जमा पूंजी खत्म हो गई। बर्तन तक बिक गए। शुरुआती दौर में कुछ लोग मदद के लिए आगे आए, लेकिन धीरे-धीरे वे लोग भी हाथ खींचने लगे।

नृत्य ही सहारा

वक्त के साथ तनुश्री बड़ी होने लगी। पड़ोस का घर, जहां रवींद्र संगीत का चलन है, तनु के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। यहां रहने वाली मौसमी आंटी ने उसका उत्साह बढ़ाया। धीरे-धीरे वह रवींद्र नृत्य शैली में पारंगत होने लगी। इसी बीच, एक मिशनरी स्कूल में उसका दाखिल हो गया। परिवार की गरीबी और तनु की प्रतिभा को देखते हुए स्कूल ने न सिर्फ उसकी फीस माफ कर दी, बल्कि पोशाक और पुस्तकें भी मुहैया कराने लगा। नृत्य में उसकी रुचि बढ़ने के साथ आसपास के इलाकों में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों से उसे बुलावा आने लगा। मगर आर्थिक रूप से पिछड़े इस इलाके में उसे फीस के रूप में महज दो-तीन सौ रुपये ही मिल पाते हैं। इसे उसके घर वाले इलाज के लिए बचाकर रखते हैं।

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अपनी बेबसी और लाचारी पर तनुश्री की मां रूपा चटर्जी कहती हैं, ‘हम क्या करें, कहां से लाएंगे इसके इलाज के लिए रुपया। मदद के लिए हमने हर दरवाजा खटखटाया, लेकिन मायूसी ही हाथ लगी। पति-पत्नी दोनों काम करते हैं। फिर भी जिंदगी की गाड़ी किसी तरह खींच रहे हैं। कई बार घर में चूल्हा भी नहीं जलता।’ तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद इस परिवार के पास न तो इंदिरा आवास योजना के तहत मकान है और न ही सरकारी इलाज की सुविधा। बीपीएल का कार्ड तो है, लेकिन वह भी शोपीस है। गरीबी को तकदीर का लिखा मान मां की आंखें आंसू बहाने के अलावा और भला कर भी क्या सकती हैं।

सपन चटर्जी को अपनी बेटी पर नाज है। उसके नृत्य से होने वाली आय उसकी जान बचाने का जरिया बन गई। दो बेटियों के इस पिता को इस बात से राहत मिलती है कि कक्षा दो में पढ़ने वाली तनुश्री और कक्षा पांच में पढ़ने वाली उसकी बड़ी बहन का पेट स्कूल में मिलने वाले दोपहर के भोजन से भर जाता है। रात जैसे-तैसे कुछ खाकर कट जाती है। उन्हें तकलीफ उस वक्त ज्यादा होती है, जब पूजा पंडाल या फिर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तनुश्री को नृत्य के लिए बुलाया जाता है। वह थककर चूर हो जाती है। वह आराम करना चाहती है। फिर भी वे लोग उसे नाचने के लिए मजबूर करते हैं। वे कहते हैं कि नहीं नाचेगी तो पैसा नहीं मिलेगा। खराब स्वास्थ्य के बावजूद पैसों के लिए बेटी को नाचना पड़ता है। उस वक्त इस गरीब बाप का कलेजा दुख से फट जाता है। अपनी बेटी की जान बचाने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री, राज्यपाल, शिक्षामंत्री, समाज कल्याण मंत्री, जिलाधिकारी, बीडीओ से पत्र के जरिए मदद की गुहार लगाई मगर किसी ने मदद का हाथ नहीं बढ़ाया।

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हार नहीं मानूंगी

तनुश्री को अपने घर से 82 किलोमीटर दूर कोलकाता महीने में दो बार आना पड़ता है। चितरंजन अस्पताल में जब उसका खून बदला जाता है, तो उसे काफी तकलीफ होती है। इस तकलीफदेह प्रक्रिया से गुजरने के बाद उसे बस, रिक्शा और नाव की सवारी करते हुए 82 किलोमीटर का थकान भरा सफर फिर तय करना पड़ता है। अगर किसी कार्यक्रम का बुलावा रहता है तो वह रात में अस्वस्थ होने के बावजूद जाती है और नाचती है। मां-बाप अपनी बेबसी पर केवल आंसू बहाते हैं, लेकिन तनुश्री ने अपनी हिम्मत नहीं हारी। वह मुस्कुराती है क्योंकि वह अपनी जिंदगी की हकीकत को जान गई है। उसे पता है कि वह ज्यादा दिन की मेहमान नहीं है। इसलिए हंसते हुए कहती है, ‘भगवान ने रोग दिया, मां-बाप को गरीबी दी, यह सब पहले से तय है। उसी भगवान ने मुझे नाचने का हुनर दिया। इसलिए तब तक नाचूंगी जब तक शरीर में जान है।’

समाज सेवा के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर अखबारों में तस्वीरें छपवाने वाले समाजसेवी अगर वाकई में समाजसेवा का छोटा हिस्सा जरूरतमंदों के बीच खर्च करें, तो तनुश्री जैसी न जाने कितनों का भला हो जाता।

और भी हैं मुश्किलें

तनुश्री को जब खून बदलने के लिए कोलकाता के चितरंजन कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च में आना होता है, तो उसकी तैयारी मुंह अंधेरे ही करनी पड़ती है। पहले अपने गांव आम्रबेरिया से 20-25 मिनट पैदल चल कर नदी के घाट तक जाना होता है। अगर तकदीर सही रही तो घाट से बस पकड़ कर धर्मतल्ला (कोलकाता) पहुंच जाती है। नहीं तो नाव से कैनिंग आना पड़ता है। फिर वहां से बस पकड़कर धर्मतल्ला पहुंचना पड़ता है। वहां से दूसरी बस पकड़ कर हाजरा मोड़ पहुचना होता है, जहां चितरंजन अस्पताल है। इस सफर का दर्द सहना तनुश्री की मजबूरी है। घर से आते वक्त यह दूरी उतनी नहीं खलती, जितनी जाते वक्त। अगर बस में बैठने की जगह नहीं मिली, तो 82 किलोमीटर का सफर जानलेवा बन जाता है। तमाम तकलीफों के बावजूद तनुश्री अपनी जिंदगी के लिए लड़ रही है। इसमें उसका पूरा परिवार साथ है, लेकिन कोई मददगार नहीं जो उसकी तकलीफों को साझा कर सके।

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अपने जैसों की मदद को डॉक्टर बनेगी तनु

 

tanu3तुमने नृत्य कहां से सीखा?

जब चलना सीखा तो पड़ोस की मौसमी आंटी के घर जाना मुझे अच्छा लगने लगा क्योंकि वहां हमेशा संगीत बजता रहता था। संगीत बजते ही मेरे पांव थिरकने लगते थे। मुझे थिरकता देख आंटी मुझमें रूचि लेने लगीं और मुझे नृत्य सिखाने लगीं। पढ़ना और स्कूल जाना मुझे अच्छा लगता है। वहां मुझे भरपेट खाना मिलता है।

स्टेज पर नाचना कब से शुरू किया?

चार साल की थी, तब इलाके के क्लब ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में मुझे नाचने के लिए बुलाया। शुरू में थोड़ा डरी हुई थी, लेकिन लोगों ने उत्साह बढ़ाया। आयोजकों ने इसके लिए दो सौ रुपये दिए। दर्शकों की ओर से सौ रुपये इनाम में मिले। उस दिन मेरे नृत्य की काफी तारीफ हुई। तब से मुझे दूसरी जगहों से भी बुलावा आने लगा।

नृत्य के अलावा तुम जिंदगी में क्या बनना चाहती हो?

मैं ठीक होना चाहती हूं, जो मुमकिन नहीं लगता। अगर जिंदगी रही और पढ़ने का मौका मिला तो डॉक्टर बनना चाहूंगी ताकि अपने जैसे गरीब लोगों की इलाज में मदद कर सकूं। जानती हूं कि डॉक्टर बनने के लिए काफी खर्च करना पड़ता है। अगर यह सपना पूरा नहीं हुआ तो डांस टीचर बनूंगी ताकि नृत्य में रूचि रखने वाले बच्चों की सहायता कर सकूं।

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