लोया मामले पर राजनीति की कुटिल व्यूह रचना

अनूप भटनागर

बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ कांड के मुकदमे की सुनवाई करने वाले सीबीआई की विशेष अदालत के न्यायाधीश बृजगोपाल हरकिशन लोया के दिसंबर, 2014 में निधन के करीब तीन साल बाद अचानक ही गुजरात विधानसभा चुनाव से कुछ सप्ताह पहले नवंबर, 2017 में एक पत्रिका में प्रकाशित खबर में यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया गया कि उनकी मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई।
इन लेखों के प्रकाशन के समय को लेकर शुरू से ही इसमें राजनीति की गंध महसूस की जा रही थी और शीर्ष अदालत में हुई बहस और फिर इस पर सुनाये गए फैसले से इन शंकाओं की काफी हद तक पुष्टि भी होती है। प्रकाशित तथ्यों और सामग्री के आधार पर कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दलों ने लोया के निधन को बहुत बड़ी साजिश करार देने का प्रयास ठहराने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन उनके ये मंसूबे पूरे नहीं हो सके।
यह दीगर बात है कि उच्चतम न्यायालय ने सभी पक्षों को सुनने के बाद रिकार्ड में उपलब्ध साक्ष्यों और दूसरे तथ्यों के आधार पर न्यायाधीश लोया की मृत्यु को स्वाभाविक करार देते हुए सारी याचिकाएं खारिज कर इसे मुद्दे पर हमेशा के लिये विराम लगा दिया। ऐसा करते समय न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे और इन्दिरा जयसिंह तथा अधिवक्ता प्रशांत भूषण के आचरण की भी तीखी आलोचना की।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने सुनवाई के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का नाम घसीटने का प्रयास किया लेकिन न्यायालय के सख्त रुख की वजह से उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली। न्यायालय का स्पष्ट मत था कि इन याचिकाओं की आड़ में देश की न्यायिक संस्था पर सीधे हमला करके उसकी प्रतिष्ठा और गरिमा को तार तार करने तथा उसे बदनाम करने का प्रयास किया गया। न्यायपालिका और न्यायाधीशों की विश्वसनीयता पर हमला किया गया। यही नहीं, सुनवाई के दौरान इन वकीलों द्वारा न्यायाधीशों के प्रति विनम्रता बरतने का शिष्टाचार ही नहीं भूल गए बल्कि अपने हितों की खातिर उन्होंने पीठ के दो न्यायाधीशों न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ से इस मामले की सुनवाई से हटने का भी अनुरोध किया। तर्क यह दिया कि ये दोनों न्यायाधीश महाराष्टÑ के हैं और वे इस मामले से संबंधित बंबई उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों को अच्छी तरह जानते हैं।
न्यायालय ने यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि ये मुकदमे ओछे और राजनीतिक हिसाब किताब बराबर करने के लिये जनहित याचिका की आड़ में न्यायिक अधिकारियों और बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले थे। शीर्ष अदालत ने न्यायाधीश लोया के निधन की घटना को सियासी रंग देने और इसकी आड़ में न्यायाधीशों को निशाना बनाने के प्रयासों पर तीखी टिप्पणी की और कहा कि राजनीतिक और कारोबारी प्रतिद्वन्द्विता का हिसाब किताब बराबर करने की जगह अदालतें नहीं हैं। इसके लिये चुनाव का मैदान और बाजार ही उचित स्थान है।
शीर्ष अदालत ने यह भी याद दिलाया कि जनहित याचिकाएं न्याय दिलाने का कारगर हथियार हैं लेकिन कुछ लोग अपने निजी और राजनीतिक एजेंडे के लिये इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। न्यायालय की यह टिप्पणी काफी हद तक सही है। शीर्ष अदालत पहले भी कई मामलों में सख्ती से कह चुकी है कि पब्लिक इंटरेस्ट लिटीगेशंस को पर्सनल इंटरेस्ट लिटीगेशंस और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटीगेशंस बनाने का प्रयास नहीं होना चाहिए।
न्यायाधीश लोया के मृत्यु के करीब चार साल बाद अचानक ही एक पत्रिका में 20 और 21 नवंबर, 2017 को बहुत ही विस्तार से दो लेख प्रकाशित होने के साथ ही राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने अपने राजनीतिक हितों को साधने की कवायद शुरू की थी। हद तो उस समय हो गई जब बंबई उच्च न्यायालय में बंबई लायर्स एसोसिएशन और महाराष्टÑ के पत्रकार बंधुराज संभाजी लोने की याचिकाएं लंबित होने के दौरान ही कांग्रेस के नेता तहसीन पूनावाला ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की।
ध्यान रहे कि सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी हैदराबाद से गुजरात लौटते समय गांधीनगर के निकट नवंबर, 2005 में एक मुठभेड़ में मारे गए थे। सोहराबुद्दीन हत्याकांड का चश्मदीद गवाह तुलसीराम प्रजापति भी बाद में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था।
राजनीतिक दलों को भी इसमें अपना हित नजर आया क्योंकि सीबीआई के विशेष न्यायाधीश के रूप में बी एच लोया बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ कांड के मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे। यह मुकदमा उच्चतम न्यायालय के सितंबर 2012 के एक आदेश पर ही गुजरात से मुंबई की अदालत में स्थानांतरित किया गया था। लोया के निधन के बाद यह मामला न्यायाधीश एम बी गोसावी की अदालत को सौंपा गया।
इस अदालत ने 30 दिसंबर, 2014 को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह , राजस्थान के गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया, राजस्थान के ही कारोबारी विमल पाटनी, गुजरात पुलिस के पूर्व प्रमुख पी सी पांडे, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक गीता जौहरी और गुजरात पुलिस के दो अधिकारियों अभय चुडास्मा और एन के अमीन को आरोप मुक्त कर दिया था।
अदालत के इस आदेश के खिलाफ चूंकि सीबीआई ने अपील नहीं की तो सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने बंबई उच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी लेकिन उसने बाद में पांच अक्टूबर, 2015 को अपनी याचिका वापस लेने का अनुरोध किया। उच्च न्यायालय ने 23 नवंबर, 2015 को उसे इसकी अनुमति दे दी थी।
यहीं से सारे मामले ने राजनीतिक रूप से तूल पकड़ना शुरू किया और एक नागरिक की हैसियत से हर्ष मंडेर इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय पहुंच गए। याचिकाकर्ता की ओर से कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बहस की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। न्यायमूर्ति एस ए बोबडे और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने एक अगस्त 2016 को याचिका खारिज कर दी। इसके बाद न्यायालय ने 19 अक्टूबर को उनकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी।
न्यायाधीश लोया के निधन की परिस्थितियों पर संदेह व्यक्त करने संबंधी दो लेख प्रकाशित होने के बाद जब मामला शीर्ष अदालत पहुंचा तो यहां सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने महाराष्टÑ सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी के पेश होने पर प्रतिवाद करते हुए जिस भाषा का इस्तेमाल किया था वह कल्पना से परे था।
शायद यही वजह थी कि न्यायिक अधिकारियों और न्यायाधीशों पर याचिकाकर्ताओं के वकीलों के आक्षेपों की आलोचना करते हुए प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ को अपने 114 पेज के फैसले में यहां तक कहना पड़ा कि एक अवसर पर तो उसने याचिकाकर्ताओं और उनके वकीलो पर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के बारे में सोचा भी, लेकिन बाद मे यह विचार त्याग दिया।
एक बात समझ में नहीं आई कि ये वकील तो याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें पेश कर रहे थे तो फिर इन्होंने इस मामले को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की शक्ल देने का प्रयास क्यों किया? क्या इसके पीछे कोई व्यक्तिगत कारण है? इस बात का जिक्र करना उचित होगा कि सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी को मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को लेकर उच्चतम न्यायालय में मृतक के भाई रुबाबुद्दीन की ओर से भी दुष्यंत दवे ने ही पैरवी की थी और उस समय भी तत्कालीन मोदी सरकार के प्रति उनका रवैया बेहद आक्रामक था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने न्यायाधीश लोया के साथ एक दिसंबर, 2014 को नागपुर में मौजूद चार न्यायाधीशों के बयानों पर भी संदेह व्यक्त करने में गुरेज नहीं किया। न्यायाधीश लोया अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी में शामिल होने गए थे और ये सभी सरकारी वीआईपी अतिथि गृह रवि भवन में ठहरे थे।
न्यायालय ने इनकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कहा कि इन चारों न्यायाधीशों- श्रीकांत कुलकर्णी, एस एम मोदक, वी सी बर्ड और रूपेश राठी के बयानों में तारतम्यता है और इन पर इनकी सच्चाई पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है।
कारवां पत्रिका में 20 और 22 नवंबर, 2017 को इस मामले में दो लेख प्रकाशित होते ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गर्इं। कांग्रेस के तहसीन पूनावाला ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 11 दिसंबर, 2017 को याचिका दायर की जबकि जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल और बंधुराज संभाजी लोने ने भी इसी तरह की याचिका दायर कीं। इसी तरह बंबई उच्च न्यायालय में सूर्यकांत उर्फ सूरज ने 27 नवंबर, 2017 और बंबई लायर्स एसोसिएशन ने चार जनवरी, 2018 को याचिकाएं दायर कीं। इन सभी याचिकाओं में यही तर्क दिया गया था कि इनमें उनका कोई निजी हित नहीं है और सिर्फ ‘समाज के कल्याण’ की खातिर इन्हें दायर किया गया है। सारी याचिकाएं कारवां पत्रिका के दो लेखों पर ही आधारित थीं।
यह मामला अभी शीर्ष अदालत में लंबित ही था कि 12 जनवरी को चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस करके प्रधान न्यायाधीश पर संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुकदमों के आवंटन में भेदभाव का आरोप लगाया। न्यायाधीश लोया से संबंधित मुकदमा भी इसमें से एक था।
शीर्ष अदालत की दो सदस्यीय पीठ ने 16 जनवरी, 2018 को इस मामले में एक सप्ताह के भीतर आवश्यक दस्तावेज पेश करके इसे उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के निर्देश के मद्देनजर 19 जनवरी को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष उल्लेख किया गया जिसने इसे 22 जनवरी को उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था।
महाराष्टÑ सरकार ने 22 जनवरी को सीलबंद लिफाफे में दस्तावेज दाखिल किए जिनकी प्रतियां याचिकाकर्ताओं के वकील को उपलब्ध करायी गर्इं। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे और इन्दिरा जयसिंह ने कहा कि वे इसमें हस्तक्षेप के लिये आवेदन दायर करेंगे। न्यायालय ने इसकी अनुमति दे दी तो इनके वकील ने सूचित किया कि वे कुछ दस्तावेज रिकार्ड पर रखेंगे जिनका इस मामले से कुछ ताल्लुक हो सकता है।
एक ही विषय पर उच्च न्यायालय और शीर्ष अदालत में याचिकाएं लंबित होने की वजह से 22 जनवरी को न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि उच्च न्यायालय से मामले को यहीं पर स्थानांतरित कर लेना बेहतर होगा। इस पर दुष्यंत दवे और इन्दिरा जयसिंह ने सहमति दी। हालांकि जयसिंह ने बाद में कहा कि इस मामले में उनकी सहमति दर्ज नहीं की जाए।
सारे मामले को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने के आदेश के बाद प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने इन याचिकाओं पर दो, पांच, नौ, 12, 19 फरवरी, पांच, आठ, नौ और 16 मार्च, 2018 को सुनवाई की।
इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे, सुश्री इन्दिरा जयसिंह, वी गिरि, पल्लव सिसोदिया, पी वी सुरेन्द्रनाथ और कुलदीप राय तथा अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से दलीलें रखीं। महाराष्टÑ सरकार की ओर से पूर्व अटार्नी जनरल तथा वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने बहस की।
इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे न्यायाधीशों से जिरह करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें न्यायिक अधिकारियों पर भरोसा नहीं है। यही नहीं, उन्होंंने बंबई उच्च न्यायालय की प्रशासनिक समिति पर भी आक्षेप लगाये और एक अवसर पर तो समिति के सदस्य न्यायाधीशों को अवमानना नोटिस जारी करने की भी मांग की। दवे की मांग का इन्दिरा जयसिंह ने भी समर्थन किया था। यही नहीं, अधिवक्ता वी गिरि तो एक कदम और आगे बढ़ गए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि जांच के दौरान जिन न्यायाधीशों के बयान दर्ज किये गए हैं, वे संदिग्ध हैं। मौजूदा मामले की सुनवाई कर रहे शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों को भी नहीं बख्शा।
शीर्ष अदालत के सुविचारित फैसले पर व्यक्त प्रतिक्रियाओं को देखते हुए फिलहाल यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। हां, याचिकाकर्ताओं के पास अभी भी तीस दिन के भीतर पुनर्विचार याचिका दायर करने का विकल्प उपलब्ध है। इसमें यदि सफलता नहीं मिलती है तो वे सुधारात्मक याचिका का भी सहारा लेने के लिये स्वतंत्र होंगे। अब देखना यह है कि राजनीतिक लाभ उठाने के प्रयास में न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाने वाले राजनीतिक दलों का अगला कदम क्या होगा।’

×