संपादकीय- संघर्ष और विराम की दुविधा

प्रदीप सिंह
Mon, 04 Jun, 2018 15:24 PM IST

प्रदीप सिंह/संपादक/ ओपिनियन पोस्ट

जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी की चर्चा हो रही है। सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्र सरकार से अपील की है कि रमजान के महीने के मद्देनजर आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे सेना के अभियान को कुछ समय के लिए रोक दिया जाय। उन्होंने कहा कि नौ मई को श्रीनगर में हुई सर्वदलीय बैठक में इस बात पर आम सहमति थी। पर दूसरे ही दिन उपमुख्यमंत्री ने कहा कि सर्वदलीय बैठक में ऐसा कोई फैसला हुआ ही नहीं। उनका सवाल था कि एक तरफा संघर्ष विराम कैसे हो सकता है? महबूबा का कहना है कि जिस तरह वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने रमजान के समय संघर्ष विराम की घोषणा की थी, मोदी सरकार को भी वैसा ही करना चाहिए। भारत के थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने भी कहा है कि वे संघर्ष विराम के लिए तैयार हैं। पर इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि संघर्ष विराम का यह मतलब नहीं है कि आतंकवाद के प्रति जीरो टालरेंस की हमारी नीति में कोई बदलाव आएगा। जनरल रावत ने कहा कि उन्हें पता है कि इस समस्या का हल सैनिक कार्रवाई के जरिये नहीं हो सकता। महबूबा का तर्क है कि आतंकवादियों के खिलाफ सेना की दबिश, तलाशी अभियान और कार्रवाई से आम लोगों को परेशानी होती है। सभी पक्षों का मानना है कि आखिरकार हल तो बातचीत से ही निकलेगा। पर सवाल है कि क्या सेना की कार्रवाई रुकने से बातचीत का माहौल बनेगा। उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या दूसरा पक्ष बातचीत के लिए तैयार है?
महबूबा मुफ्ती और दूसरे कई कश्मीरी नेता अक्सर कश्मीर समस्या के हल के लिए वाजपेयी सरकार के कदमों का जिक्र करते हैं। कश्मीर समस्या के हल के लिए वाजपेयी के इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के रास्ते की बात सब करते हैं। पर यह कोई नहीं बताता कि यह कहने और शांति का पैगाम कश्मीर में और पाकिस्तान में देने के बाद वाजपेयी को क्या मिला। उनकी पहल का नतीजा क्या हुआ। क्या पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकवादियों को भेजना बंद कर दिया। क्या अलगाववादियों ने आतंकवादियों का साथ देना बंद कर दिया? फिर इस बात की क्या गारंटी है कि आतंकवादी संघर्ष विराम के समय का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने में नहीं करेंगे। घाटी में राजनीतिक दलों और अलगावादियों के नेता क्यों पत्थरबाजों के खिलाफ नहीं बोलते। ऐसा क्यों होता है कि जब सेना और सुरक्षा बल किसी आतंकवादी के खिलाफ कार्रवाई कर रहे होते हैं उस समय कुछ लोग आतंकवादियों पर नहीं सेना पर पत्थर बरसाते हैं।
दरअसल, साल 2016 में आतंकवादियों के पोस्टर ब्यॉय बने बुरहान वानी के सफाए के बाद से सेना और सुरक्षा बलों का अभियान रंग लाने लगा है। सेना की इसी कामयाबी से बौखलाकर आतंकवादियों ने जुलाई 2017 में अमरनाथ यात्रियों से भरी बस पर हमला किया था। उसके बाद से सेना ने न केवल अमरनाथ यात्रियों पर हमला करने वालों का सफाया किया बल्कि बुरहान वानी के पूरे गुट का सफाया कर दिया। आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में सेना को लगातार कामयाबी मिल रही है। ऐसा भी नहीं है कि सेना हर हाल में आतंकवादियों को मारने पर ही तुली है। ऐसे कई वाकए सामने आए हैं जब सेना के अधिकारियों ने निर्णायक कार्रवाई से पहले आतंकवादियों को समझाने की कोशिश की है कि वे इस रास्ते को छोड़ दें और आत्मसमर्पण कर दें। कई मामलों में तो आतंकवादियों के माता-पिता को बुलाकर उनसे अपील करवाई गई है। आतंक के खिलाफ कार्रवाई में भारतीय सेना और सुरक्षा बलों ने अपने मानवीय पक्ष का भी प्रदर्शन किया है। जनरल रावत ने कहा भी है कि अपने लोगों के खिलाफ कार्रवाई में सेना नरमी और सतर्कता बरतती है।
जनरल बिपिन रावत ने एक बात और कही है जो कश्मीर के लिए बहुत अहम है। उन्होंने कहा कि कश्मीर के युवक समझ लें कि उन्हें आजादी कभी नहीं मिलने वाली। अच्छा होता कि इस तरह का बयान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की ओर से आता। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है इस मामले में किसी को कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। पिछले तीन सालों में विभिन्न जांच एजेंसियों की कार्रवाई से हुर्रियत कांफ्रेंस को पाकिस्तान से होने वाली फंडिंग का पूरा तंत्र ध्वस्त हो चुका है। इससे पहले भी सरकारों को पता था कि हुर्रियत कांफ्रेंस और दूसरे अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान और कुछ अन्य देशों से अलगाववादी गतिविधियां चलाने के लिए पैसा मिलता था। पर इससे पहले किसी सरकार ने इसके रोकने का कोई प्रयास नहीं किया।
कश्मीर के साथ ही देश में एक वर्ग है जिसका मानना है कि केंद्र सरकार को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। यह ऐसी पहेली है जिसका हल किसी के पास नहीं है। जिसे अवसर कहा जा रहा है कहीं यह बड़ी चूक न बन जाय। जब हालात ऐसे हों कि पाकिस्तान समर्थक पत्थरबाज स्कूली बच्चों को, सैलानियों को निशाना बना रहे हों, ऐसे में किस पर यकीन किया जाय। अभी कुछ समय पहले ही तो महबूबा सरकार ने पत्थरबाजों (पहली बार पत्थर फेंकने वाले) को आम माफी देते हुए उनके खिलाफ सारे मामले वापस ले लिए थे। उसका नतीजा क्या निकला। कानून के चंगुल से निकलने के बाद उनमें से बहुत से फिर वही काम कर रहे हैं। इसीलिए कहा जाता है कि कुपात्र पर कभी दया नहीं करना चाहिए। घाटी में सेना की कार्रवाई इस समय बड़े निर्णायक दौर में है। उच्च खुफिया सूत्रों का कहना है कि कुछ महीने इसी तीव्रता से आॅपरेशन चलता रहा तो घाटी को आतंकवादियों से मुक्त कराया जा सकता है।
चेन्नई के युवक की पत्थर लगने से मौत के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि वे शर्मिंदा हैं। घाटी में यह पहली बार हुआ कि स्कूली बच्चों की बस पर हमला हुआ। यह भी पहली ही बार हुआ कि सैलानियों पर हमला हुआ। महबूबा को पता है कि पर्यटन कश्मीर के लोगों की आय का मुख्य साधन है। वहां पर्यटकों का आना बंद हो गया तो लोगों के सामने भुखमरी की हालत आ जाएगी। अब यह पता नहीं कि मुख्यमंत्री ने ऐसी प्रतिक्रिया वाकई दुखी होकर दी या फिर स्थानीय लोगों के गुस्से से बचने के लिए। सूबे में पीडीपी-भाजपा की सरकार सहमति से ज्यादा असहमति के रास्ते पर चलती नजर आती है। रमजान के बाद राज्य में अमरनाथ यात्रा शुरू होने वाली है। साल 2017 के अनुभव को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकार दोनों के लिए इस बार चुनौती बड़ी होगी।
अब केंद्र के सामने दुविधा यह है कि वह मुख्यमंत्री की सलाह मानकर संघर्ष विराम का फैसला ले या सैन्य बलों की कार्रवाई को जारी रहने दे। जोखिम दोनों में है। संघर्ष विराम के दौरान कोई बड़ा आतंकी हमला होता है तो सरकार को मजबूरन संघर्ष विराम को रोकना पड़ेगा। या इस वक्फे का फायदा उठाकर आतंकवादी फिर से एकजुट हो जाते हैं तो भी तोहमत सरकार पर ही आएगी। समस्या यह है कि दूसरी ओर से इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि यदि संघर्ष विराम हुआ तो वे इस दौरान किसी वारदात को अंजाम नहीं देंगे। फिर केंद्र सरकार के सामने सेना और सुरक्षा बलों के मनोबल पर क्या असर पड़ेगा। केंद्र सरकार यह तो कतई नहीं चाहेगी कि सेना का मनोबल टूटे। केंद्र जो भी फैसला करे वह सेना के मनोबल और कश्मीर के व्यापक हित में होना चाहिए। 

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