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छत्तीसगढ़- कैसे उठेगा हाथी

प्रदेश में बसपा को पांच-छह फीसदी वोट मिलते रहे हैं। चुनावी समर में उसके होने से कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवार हार जाते हैं। इस बार पार्टी ने ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की रणनीति बनाई है।

रमेश कुमार ‘रिपु’

छत्तीसगढ़ में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि अगले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस से गठबंधन होने की स्थिति में मनचाही सीट मांग सके। जैसा कि पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत कहते हैं कि बसपा को अधिकतम पांच सीट दे सकते हैं इससे ज्यादा नहीं। लेकिन बसपा पांच सीट से संतुष्ट हो जाएगी ऐसा लगता नहीं। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष ओपी बाजपेयी कहते हैं कि इस बार हमारी कोशिश है कि प्रदेश में बहुमत तो नहीं लेकिन इतनी सीट आ जाए कि हमारे बगैर किसी की भी सरकार न बन सके। मगर पिछले तीन चुनाव के परिणामों से ऐसा नहीं लगता कि बसपा का जनाधार बढ़ा है। वर्ष 2003 में दो सीट, वर्ष 2008 में दो सीट और वर्ष 2013 के चुनाव में बसपा एक सीट जीती थी। विधानसभा में बसपा अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही है लेकिन प्रदेश में हाथी सुस्त ही रहा। उसकी स्थिति अभी भी जस की तस है। मगर ओपी बाजपेयी इससे सहमत नहीं हैं। उनका दावा है कि यदि कांग्रेस से गठबंधन नहीं होता है तो पार्टी 90 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेगी। 35 विधानसभा सीटों पर पार्टी ने इस बार काम किया है। ओबीसी वोटर बसपा से छिटकता रहा है लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। वहीं बसपा के एक नेता का कहना है कि इस बार हमें 15 सीटें मिलेंगी।

बसपा की रणनीति
मध्य प्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ में भी बसपा का संगठन उतना मजबूत नहीं है। संगठन में जान डालने के लिए पार्टी सुप्रीमो मायावती ने पुराने नेताओं को वापस लाने समेत कई उपाय किए हैं। चूंकि उत्तर प्रदेश में अभी चुनाव नहीं है इसलिए छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पार्टी ने कई पदाधिकारी और पूर्व मंत्रियों से लेकर पूर्व सांसदों की फौज लगा दी है। मायावती इस बार छत्तीसगढ़ में नए तरीके से चुनाव लड़ना चाहती हैं इसलिए आधा दर्जन प्रभारी नियुक्त किए गए हैं। इनमें डॉ. अशोक सिद्धार्थ, लालजी वर्मा, भीम राजभर, एमएल भारती, अंबिका चौधरी और अजय साहू शामिल हैं। सभी संभाग के अलग-अलग जोन प्रभारी हैं जो ग्राउंड रिपोर्ट तैयार कर चुनाव किस तरह लड़ना है, इसकी रूपरेखा तय करेंगे। वोट प्रतिशत बढ़ाने के साथ ही सीटें भी बढ़ें, ऐसी रणनीति बनाई जा रही है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब प्रदेश प्रभारियों का व्यापक सियासी कार्यक्रम बनाया गया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. अशोक सिद्धार्थ संभाग स्तर की समीक्षा बैठक का काम कर रहे हैं। इससे पहले हुई पार्टी की समीक्षा बैठक में सभी 90 विधानसभा सीटों पर बूथ स्तर पर एजेंट बनाने का निर्देश दिया गया था।

सशर्त गठबंधन
मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को वोटरों तक पहुंचने के लिए चुनावी तैयारियों पर ज्यादा फोकस करने को कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि पार्टी को सभी 90 सीटों पर तैयारी करनी है। सूत्रों का कहना है कि 25 अगस्त के बाद प्रत्याशियों के पैनलों की सूची लेकर प्रभारी सुप्रीमो के पास जाएंगे। इसके बाद सभी प्रभारियों की बसपा सुप्रीमो के साथ बैठक प्रस्तावित है जिसमें बताया जाएगा कि हाथी को किस तरह उठाया जा सकता है। प्रदेश में कांग्रेस या फिर भाजपा से कोई भी बड़ा नेता बसपा में जाने को तैयार नहीं है। इस वजह से पार्टी का कद भी बड़ा नहीं हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी में कांग्रेस से गए लोग वापस कांग्रेस में आने लगे हंै। जाहिर है कि बसपा दूसरी पार्टी के नेताओं पर डोरे नहीं डाल रही है। लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि जोगी से गठबंधन होता तो बसपा के हाथी की करवट बदल सकती थी। जोगी को भी लाभ होता। बहरहाल, गठबंधन के संबंध में पार्टी के नेता कुछ भी बोलने से बच रहे हंै। प्रभारियों का कहना है कि गठबंधन पर कोई ग्राउंड रिपोर्ट तैयार नहीं की जा रही है। अलबत्ता संगठन स्तर पर तैयारी 90 विधानसभा सीटों की है। बूथ लेवल पर एजेंट तैयार कर जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूती देने का एजेंडा है। कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेकर उसे अमल में लाया जाएगा। मायावती ने कांग्रेस से हाथ मिलाने से पहले ही अपनी शर्तें रख दी है कि सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही गठबंधन होगा। गठबंधन किसी एक राज्य में नहीं बल्कि सभी चुनावी राज्यों में होगा।

बदला सियासी समीकरण
बसपा के प्रदेश प्रभारी और राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ ने ओपिनियन पोस्ट से कहा, ‘बीते चुनावों में बसपा के वोट प्रतिशत में कमी आई थी। लेकिन इस बार रमन सरकार के 15 साल के खिलाफ जो वोट पड़ेंगे वह बसपा के पक्ष में पड़ेंगे। बसपा का राजनीतिक समीकरण बदल गया है। इस बार बसपा की सीट बढ़ेगी, इसलिए कि लोगों में बसपा के प्रति रुझान बढ़ा है। इस बार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट पर भी जीतेंगे और सवर्ण व ओबीसी समुदाय से भी हमारे विधायक चुनकर आएंगे। गठबंधन का फैसला पार्टी प्रमुख मायावती करेंगी बावजूद इसके कार्यकर्ताओं से सभी सीटों का आकलन करेंगी।’
बसपा की प्रदेशस्तरीय पदाधिकारियों की बैठक में अशोक सिद्धार्थ ने कहा कि पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने बहुजन समाज को वोट की ताकत का अहसास कराया। मजबूत नहीं मजबूर सरकार चाहिए, अल्पमत की सरकारें बनी हैं। आज कांशीराम का युग है। पार्टी के कार्यकर्ता इस बात को समझें। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में सीटों की स्थिति का आकलन कर पूरी रिपोर्ट पार्टी सुप्रीमो मायावती को देंगे। उसके बाद ही किसी गठबंधन पर विचार होगा। कांग्रेस के साथ या अजीत जोगी की पार्टी के साथ गठबंधन का फैसला मायावती ही करेंगी। अभी गठबंधन पर फैसला नहीं हुआ है। अजीत जोगी की नई पार्टी से बसपा को कोई नुकसान नहीं होगा। सूत्रों का कहना है कि बसपा छत्तीसगढ़ में इस बार 15 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके लिए वह इस बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा सवर्णों को भी टिकट देने पर विचार कर रही है।

गोंगपा से दूर रहेगी कांग्रेस
दरअसल, कांग्रेस ने पहले गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) से हाथ मिलाने की पहल की थी। 17 मई को कोटमी में आयोजित कांग्रेस के आदिवासी सम्मेलन में गोंगपा के अध्यक्ष मरकाम शामिल हुए थे। इसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस की आदिवासी रैली में भी मरकाम को बुलाया गया था। चूंकि कर्नाटक चुनाव के बाद समीकरण बदला है इसलिए पार्टी चाहती है कि उसी रणनीति पर आगे बढ़ा जाए। इसलिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फायदे की सोच रहे हैं। बसपा से गठबंधन के पीछे मूल वजह यह है कि गोंगपा आज तक एक भी सीट नहीं जीती है जबकि बसपा लगातार विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही। राहुल गांधी गोंगपा से गठबंधन इसलिए नहीं करना चाहते कि इससे वे दूसरे राज्य में बसपा से मिलने वाले लाभ से वंचित हो जाएंगे। दूसरी बात यह है कि गोंगपा के अध्यक्ष मरकाम पानीतानाखार से ही चुनाव लड़ने के लिए अड़े हैं जबकि पिछले तीन चुनावों से उन्हें कांग्रेस के रामदयाल उइके हराते आ रहे हैं। दूसरा कांग्रेस आदिवासी सीटों पर खुद ही मजबूत होने का दावा कर रही है। अभी आदिवासियों के लिए प्रदेश में सुरक्षित 29 सीटों में से 18 पर कांग्रेस और 11 पर भाजपा का कब्जा है।

सीटों पर पेंच फंसा
राजनीतिक नजरिये से देखा जाए तो गोंगपा का 14 सीटों वाले सरगुजा संभाग में बसपा से ज्यादा प्रभाव है। वहीं 24 सीट वाले बिलासपुर संभाग में बसपा कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में है। रायपुर संभाग की पांच, दुर्ग और बस्तर संभाग की एक-एक सीट पर भी बसपा का अच्छा प्रभाव है। ऐसे में गोंगपा से बसपा का फैलाव अधिक है। वर्ष 2003 में प्रदेश में हुए पहले विधानसभा चुनाव में बसपा के 54 प्रत्याशी चुनावी समर में थे और पार्टी को 4,29,334 वोट मिले थे। वर्ष 2008 में बसपा को 6,56,221 और वर्ष 2013 में 5,58,424 वोट मिले थे। इन दोनों चुनावों में पार्टी ने सभी 90 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। प्रदेश की छह ऐसी सीटें हैं जिन पर बसपा कभी न कभी चुनाव जीत चुकी है। कुछ सीटों पर तो वो दूसरे नंबर पर भी रही है। इसलिए सीटों के तालमेल पर ही पेंच फंसा है। जहां तक गोंगपा की बात है तो 2013 के चुनाव में गोंगपा ने 55 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसे एक लाख 99 हजार 853 वोट मिले थे। जाहिर है कि 35 अन्य सीटों पर गोंगपा की जमीन तैयार नहीं है। ऐसे में कांग्रेस को वोट का फायदा बसपा से ही मिलने की संभावना है।
बलौदाबाजार, मुंगेली, बिलासपुर और रायगढ़ जिले में पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा की वजह से कांग्रेस भाजपा से चुनाव हार गई थी। तख्तपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस का उम्मीदवार मात्र 600 वोटों से हार गया था। यहां बसपा को 28,947 वोट मिले थे। बेलतारा में बसपा को 11,182 वोट मिले थे जिससे कांग्रेस भाजपा से पांच हजार वोट से हार गई थी। मुंगेली में बसपा को 4,310 वोट मिले थे और कांग्रेस भाजपा से तीन हजार वोट से हार गई। शक्ति विधानसभा सीट पर बसपा 14,105 वोट लेकर आई जिससे भाजपा से कांग्रेस नौ हजार वोट से हार गई। इसी तरह विलयगढ़ सीट पर बसपा को 36,636 वोट पड़े जिससे कांग्रेस भाजपा से 13 हजार वोट से हार गई। पिछले चुनाव के इन्हीं परिणामों को देखते हुए राहुल गांधी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल से कहा है कि कोशिश यह करें कि किसी भी स्थिति में त्रिकोणीय मुकाबला न हो। लेकिन बसपा से तालमेल होने के बाद भी अजीत जोगी की पार्टी की वजह से यह स्थिति तो हर विधानसभा क्षेत्र में रहेगी ही। 

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