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भाजपा ईवीएम से जीती बैलेट में हारी

लोकसभा, विधानसभा और अब स्थानीय निकाय चुनावों में भी समाजवादी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, आखिर कहां चूक हुई?
लोकसभा और विधानसभा चुनावों से इसकी तुलना सही नहीं है। निकाय चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा जिस तरह अपनी जीत का जश्न मना रही है उससे जाहिर होता है जैसे भाजपा ने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो। जबकि सच्चाई इसके उलट है। हकीकत तो यह है कि भाजपा के कई दिग्गज नेता खासकर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अपने क्षेत्र की सीटें बचाने में नाकाम रहे। यह सही है कि महापौर के सोलह में से चौदह पदों पर भाजपा उम्मीदवारों की जीत हुई लेकिन नगर पंचायतों और नगर पालिका परिषदों में भाजपा का प्रदर्शन काफी खराब रहा। नगर पंचायत अध्यक्ष के 438 सीटों में भाजपा को सिर्फ 100 सीटें मिलीं। इसी तरह नगर पालिका परिषद के 198 अध्यक्ष पदों में भाजपा को सिर्फ 68 सीटें मिलीं। नगर पंचायत सदस्यों की कुल 5,390 सीटों में भाजपा सिर्फ 662 सीटों पर जीत पाई। वहीं नगर पालिका परिषद के सदस्यों की कुल 5,261 सीटों में भाजपा ने सिर्फ 914 सीटें जीतीं। दस महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा को 43 फीसद वोट मिले थे वह इन चुनावों में 30 फीसद से भी कम हो गए। दरअसल, भाजपा की जीत सिर्फ उन्हीं चुनावों में हुई है जहां ईवीएम का प्रयोग हुआ।

क्या आपको नहीं लगता कि ईवीएम पर दोष मढ़ने की बजाय सपा भी भाजपा की तरह चुनाव प्रचार करती तो शायद नतीजे आपके पक्ष में आते?
आज तक हमने या आपने नहीं देखा होगा कि स्थानीय निकायों के चुनाव में किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री जनसंपर्क, चुनावी रैलियां और रोड शो करे। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके लिए भी प्रचार किया। सरकारी कामकाज को छोड़ वे चुनावी रैलियां करते रहे। प्रदेश में इससे भी पहले स्थानीय स्तर के चुनाव हुए हैं लेकिन किसी मुख्यमंत्री ने निकाय चुनाव के लिए प्रचार नहीं किया। इसके बावजूद भाजपा सिर्फ मेयर पदों पर मिली कामयाबी का डंका पीट रही है। नगर पंचायत और नगर पालिका परिषद में मिली करारी हार के बारे में कुछ नहीं कह रही। ईवीएम पर सवाल सिर्फ समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि कई राजनीतिक दल उठा रहे हैं।

मेरठ और अलीगढ़ में बसपा के महापौर उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। क्या आपको नहीं लगता कि शहरों में भाजपा के बाद बसपा इस चुनाव में मतदाताओं की पसंद बनी? मुस्लिम मतदाताओं ने भी सपा का साथ छोड़ दिया?
आपके सवाल से तो जाहिर होता है कि आप भाजपा के पक्ष में प्रश्न पूछ रहे हैं। भाजपा के नेता और प्रवक्ता भी ऐसी ही दलीलें देते हैं। समाजवादी पार्टी न तो जाति और धर्म की राजनीति करती है और न ही इस आधार पर कोई भेदभाव। स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों के आधार पर कोई धारणा बनाना उचित नहीं है। इस बार निकाय चुनाव में भाजपा के खिलाफ अगर कोई बसपा उम्मीदवार मजबूत था तो मुसलमानों ने भाजपा को हराने के लिए बसपा का साथ दिया। इसका मतलब यह नहीं है कि मुसलमान सपा से दूर हो रहे हैं। सपा के साथ समाज के सभी वर्ग जुड़े हैं। लोगों के मन में नफरत और अविश्वास पैदा करने का काम भाजपा करती है। मैं पुन: दोहराना चाहूंगा कि स्थानीय निकाय चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ फेल हुए हैं। सिर्फ मेयर की अधिक सीटें जीतने का ढोल बजा रही है भाजपा।

विधानसभा चुनाव में आपका कांग्रेस से गठबंधन था लेकिन निकाय चुनाव में दोनों पार्टियां अकेले लड़ीं। क्या ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता मुमकिन है?
लोकसभा चुनाव होने में अभी काफी समय है इसलिए इस पर अभी कोई टिप्पणी करना मैं उचित नहीं मानता। स्थानीय निकायों और संसदीय चुनावों के मुद्दे और परिस्थिति अलग-अलग होते हैं।

क्या आपको नहीं लगता कि सपा की आपसी व पारिवारिक कलह भी इस चुनाव में हार की वजह बनी?
इस सवाल का कोई मतलब नहीं है और न ही इस बारे में कोई टिप्पणी की जा सकती है।

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