सुमो की ‘लालू-लीला’

ओपिनियन पोस्ट
Tue, 11 Dec, 2018 15:06 PM IST

प्रियदर्शी रंजन

बिहार भाजपा के अघोषित आलाकमान और उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने अपने प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर ‘लालू-लीला’ नामक एक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में लालू के भ्रष्टाचार का 198 पृष्ठों में सिलसिलेवार उल्लेख है। पुस्तक में बताया गया है कि एक परिवार ने रंक से राजा तक का सफर किस तरह तय किया। लालू एवं उनके परिजनों के घोटालों की पड़ताल करती यह पुस्तक लालू की काली एवं सफेद राजनीति का पक्ष उजागर करती है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के अनुसार, यह किताब नहीं बल्कि दस्तावेजी सबूत है जो साबित करती है कि लालू यादव ने गरीबों के उत्थान के नाम पर कैसे बिहार को लूटा है। सुशील मोदी ने लिखा है कि लालू यादव ने दान, वसीयत, लीज और पावर आॅफ एटॉर्नी के मार्फत अकूत संपत्ति अर्जित की है। बावजूद इसके पुस्तक के महत्व और प्रकाशन के समय पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि इसमें ऐसी कोई नई बात नहीं है जो लालू यादव और उनके परिजनों के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में सामने न आई हो। अगर यह कहें कि उनके भ्रष्टाचार के कारनामों को सुशील मोदी ने दस्तावेजी शक्ल दी है तो गलत नहीं होगा।

यह पुस्तक ऐसे समय में आई है जब लालू यादव चारा घोटाले में सजा काट रहे हैं और सक्रिय राजनीति से अलग-थलग हैं। बीमार होने की वजह से उनका इलाज चल रहा है। सजायाफ्ता होने की वजह से उनके चुनाव लड़ने पर रोक तो पहले ही लग चुकी है। कोर्ट ने उनके किसी राजनीतिक बैठक में भाग लेने या बयान देने पर भी रोक लगा रखी है। इसके बाद भी राजनीति में उनकी प्रासंगिकता बनी हुई है। सुशील मोदी की किताब इसे और पुख्ता करती है। राजनीतिक जानकारों के साथ-साथ भाजपा के भीतरखाने भी इस पुस्तक को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मत है कि इस पुस्तक में भले ही लालू के भ्रष्टाचार पर वार है मगर इससे लालू के राजनीतिक कद पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भ्रष्टाचार के सारे आरोप पहले के ही हैं। इन आरोपों के बाद भी वे अब तक प्रासंगिक बने हुए हैं। कोर्ट के आदेश की वजह से वे भले ही सियासी नेपथ्य में चले गए लेकिन सुशील मोदी की ‘लालू-लीला’ ने उनके कद को और बड़ा होने का मौका दे दिया है।
राजनतिक जानकार देवांशु शेखर मिश्रा कहते हैं, ‘लालू-लीला असल में लालू को प्रदेश की राजनीति में जिंदा रखने की कवायद है। लालू की वजह से नीतीश कुमार, सुशील मोदी और उनके जैसे अन्य नेताओं की राजनीतिक दुकान चलती है। ये चाहे विरोध का हो या समर्थन का। नीतीश और मोदी की जोड़ी को लालू की नाकामयाबियों की वजह से ही वर्ष 2005 में सत्ता पाने का मौका मिला था। 2010 के चुनाव में भी लालू का भय दिखा कर इस जोेड़ी ने सफलता दोहराई। जब 2015 में नीतीश भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़े तो लालू के समर्थन से ही सत्ता हासिल कर पाए। मतलब साफ है कि पिछले तीन दशक से लालू की वजह से ही बिहार में सत्ता तय होती है। ऐसे में अगर आगे लालू ही राजनीति के केंद्र में बने रहते हैं तो ही नीतीश और मोदी जैसों की राजनीति जिंदा रह पाएगी। तेजस्वी यादव के उभार की वजह से नीतीश और मोदी को नई चुनौती मिल रही है। जदयू ने इसकी काट के लिए रणनीतिकार प्रशांत किशोर को राजनीतिक अखाड़े में लाने का फैसला किया। प्रशांत किशोर का काम तेजस्वी की काट खोजना है। भाजपा में भी तेजस्वी को चुनौती देने के लिए नई उम्र के नेताओं को आगे करने की वकालत हो रही है। अगर ऐसा होता है तो सुशील मोदी जैसे नेताओं को प्रदेश की राजनीति से संन्यास लेना पड़ेगा या पिछली पंक्ति में बैठना होगा। यही वजह है कि मोदी जैसे नेता कतई नहीं चाहेंगे कि लालू राजनीति से पूरी तरह ओझल हो जाएं।’
वहीं राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर कलानाथ चौधरी के मुताबिक, ‘जयप्रकाश आंदोलन से निकले नेताओं के बीच अंदरखाने यह समझौता है कि सत्ता किसी भी हाल में जेपी के चेलों के बीच ही रहनी चाहिए। यही वो बड़ा कारण है जिसकी वजह से बिहार में राजनीति की नई पौध नहीं आ सकी। मोदी नहीं चाहेंगे कि लालू या नीतीश राजनीति से दूर हो जाएं। इनके होने की वजह से मोदी की अहमियत बनी रहेगी। जब महागठबंधन से अलग होकर नीतीश कुमार दोबारा एनडीए के साथ गए तो भाजपा में उन्होंने अपने साथी के तौर पर सुशील मोदी के नाम पर ही मुहर लगाई। जबकि विधानसभा चुनाव में एनडीए की करारी हार से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मोदी से काफी नाराज था। पार्टी ने उन्हें कमोबेश किनारे करने का जुगाड़ लगा दिया था। शीर्ष नेतृत्व नहीं चाहता था कि नीतीश कुमार की सरकार में मोदी फिर से उप मुख्यमंत्री बनें लेकिन नीतीश ने अपनी पसंद भाजपा पर थोप दी।’ सुशील मोदी की किताब पर सवाल खड़ा करते हुए चौधरी कहते हैं कि तमाम बुराइयों के बावजूद मोदी बेबाकी से स्वीकार करते हैं कि लालू यादव जैसा ताकतवर नेता देश में 20वीं शताब्दी में पैदा नहीं हुआ।

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पुस्तक में क्या है
सुशील मोदी की यह पांचवीं पुस्तक है। इससे पहले उन्होंने आपातकाल के दौरान जेल यातना के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक ‘बीच समर में’ तथा लालू यादव के चारा घोटाले पर लिखी पुस्तिका ‘चारा चोर, खजाना चोर’ खासी चर्चित रही है। ‘लालू-लीला’ में मोदी ने विस्तार से बताया है कि किस प्रकार लालू यादव ने अपने परिवार को अरबपति बनाने के लिए पद और रसूख का दुरुपयोग किया है। 15 साल तक बिहार की बागडोर अपने हाथ में रखकर और पांच साल तक रेल मंत्री की कुर्सी पर बैठकर लालू यादव ने अपने और परिवार के नाम पर कुल 141 बेशकीमती भूखंड, 30 फ्लैट एवं छह आलीशान बंगले बटोरे। लालू परिवार की भ्रष्टाचार जनित अकूत संपत्ति की पड़ताल सुशील मोदी ने बहुत ही गहन तरीके से की है। किताब बताती है कि पड़ताल की शुरुआत में मिट्टी घोटाला सामने आया। इसी मिट्टी घोटाले की कोख से रेलवे टेंडर घोटाले के जरिये पटना की बेशकीमती साढ़े तीन एकड़ जमीन पर बन रहे बिहार के सबसे बड़े मॉल का पर्दाफाश हुआ। उसके बाद फर्जी कंपनियां उजागर होती चली गर्इं। राजद सुप्रीमो ने विधायक, पार्षद, सांसद और मंत्री बनाने की एवज में रघुनाथ झा, कांति सिंह जैसे कई नेताओं से जमीन और मकान गिफ्ट में लिए। अनवर अहमद उर्फ शकबाब को विधान परिषद सदस्य बनाने के बदले उसके अवमी बैंक से करोड़ों रुपये लिए। इसी प्रकार कुमार राकेश रंजन और शमीम को विधान पार्षद बनाने की एवज में पत्नी राबड़ी देवी तथा दोनों बेटों के नाम पर जमीन लिए।

भ्रष्टाचार से कमाए कालेधन को सफेद करने के लिए बीपीएल श्रेणी के ललन चैधरी, रेलवे के खलासी हृदयानंद चौधरी और भूमिहीन प्रभुनाथ यादव, चंद्रकांता देवी, सुभाष चौधरी को नौकरी, ठेका और अन्य तरीके का लाभ दिलाने की एवज में उनसे करोड़ों रुपये की जमीन एवं मकान दान स्वरूप लिए। सुशील मोदी ने किताब में लिखा है कि अपने खास रिश्तेदारों को भी बेनामी संपत्ति हासिल करने का माध्यम बनाने में लालू यादव ने संकोच या शर्म नहीं किया। बड़े भाई मंगरू राय के समधियाने, अपनी ससुराल, बेटी की ससुराल के रिश्तेदारों के नाम से पहले अपनी काली कमाई से जमीन-मकान खरीदे और बाद में उन्हें राबड़ी देवी, तेज प्रताप यादव, तेजस्वी यादव और मीसा भारती के नाम गिफ्ट करवा दिया।

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अब आएगी ‘नीतीश-मोदी लीला’
लालू-लीला आने के बाद बिहार का सियासी तापमान बढ़ गया है। अब राजद भी सुशील मोदी को करारा जवाब देगी। वो भी किताब के जरिये। लालू के बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव ने ऐलान किया है कि वे नीतीश कुमार और सुशील मोदी पर किताब लिखेंगे जिसका नाम होगा ‘नीतीश-मोदी लीला’। उनकी किताब जल्द ही प्रकाशित होगी। किताब में क्या खास होगा यह अभी नहीं बताया जा रहा है।

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