विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय : सरकारी उदासीनता से मामला अधर में लटका

कुमार कृष्णन
Sat, 16 Mar, 2019 13:00 PM IST

अगस्त 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब यह घोषणा की, तो उस समय राज्य सरकार ने स्थानीय लोगों से जमीन देने की अपील कर डाली. केंद्र सरकार ने बजट में 500 करोड़ रुपये का प्रावधान भी कर दिया. लेकिन, राज्य सरकार चार साल बीत जाने के बावजूद जमीन उपलब्ध नहीं करा सकी.

बरौनी-बेगूसराय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 33 हजार करोड़ रुपये की विभिन्न योजनाओं का शिलान्यास-उद्घाटन करके बिहार को मेट्रो ट्रेन से लेकर सुपर स्पेशियलिटी सेंटर तक की सौगात तो दे दी, लेकिन विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय का मुद्दा एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया. सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे विक्रमशिला महाविहार का ऐतिहासिक एवं गौरवशाली अतीत पुनर्जीवित करने के लिए चार साल पहले ऐसे ही चुनावी माहौल में प्रधानमंत्री मोदी ने विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने की न सिर्फ घोषणा की थी, बल्कि स्वीकृति पत्र जारी होने के साथ-साथ भूमि अधिग्रहण सरीखे प्रारंभिक कार्यों के लिए धनराशि भी आवंटित हो गई थी. लेकिन, प्रशासन के लचर रवैये के चलते विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिलान्यास का सुनहरा मौका हाथ से निकल गया. गौरतलब है कि प्रशासन ने पिछले साल अगस्त में ही कहलगांव स्थित विक्रमशिला महाविहार के पास केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 200-200 एकड़ जमीन के तीन प्रस्ताव अपर सचिव-शिक्षा विभाग को भेज दिए थे. साथ ही जमीन के अधिग्रहण के लिए 233.74 करोड़ रुपये का इस्टीमेट भी भेजा गया था. केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए पहले 500 एकड़ जमीन का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन एक जगह उतनी जमीन मिलने में दिक्कत आने पर दोबारा 200-200 एकड़ जमीन के तीन प्रस्ताव मांगे गए. अगस्त 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब यह घोषणा की, तो उस समय राज्य सरकार ने आनन-फानन स्थानीय लोगों से जमीन देने की अपील कर डाली. केंद्र सरकार ने विश्वविद्यालय के लिए अगले बजट में 500 करोड़ रुपये का प्रावधान भी कर दिया. लेकिन, राज्य सरकार चार साल बीत जाने के बावजूद जमीन उपलब्ध नहीं करा सकी.

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखने और गौतम बुद्ध द्वारा निकट ही बुद्धासन के परिदर्शन के बावजूद विक्रमशिला को अभी तक बौद्ध सर्किट में शामिल नहीं किया गया. जबकि केंद्रीय पर्यटन विभाग ने सितंबर 2012 में विक्रमशिला को बौद्ध सर्किट में शामिल करने की घोषणा कर दी थी. प्राचीन बौद्ध विहारों में विक्रमशिला महाविहार का स्थान प्रमुख है. इसके संस्थापक पालवंशी राजा धर्मपाल थे. इतिहासकार लामा तारा नाथ के अनुसार, इस महाविहार की स्थापना 769809 ई. के बीच हु्ई थी. पाल वंश के अन्य राजाओं के सहयोग से यह राजकीय विश्वविद्यालय हो गया. दसवीं सदी में यह भारत का सबसे प्रमुख शिक्षा केंद्र बन गया और बारहवीं सदी के अंत तक बरकरार रहा. लेकिन तेरहवीं सदी शुरू होते ही इस महाविहार का पतन हो गया और धीरेधीरे यह खंडहर में तब्दील हो गया. आज तो केवल जमीन ही बची है. लामा तार नाथ (16वीं सदी) ने अपनी पुस्तक भारत में बौद्ध धर्म का इतिहासमें लिखा, श्री विक्रमशिला महाविहार उत्तरी मगध में गंगा के किनारे एक छोटी सी पहाड़ी पर अवस्थित था. सतीश चंद्र विद्याभूषण ने इसका स्थान सुल्तान गंज बताया. उनके मत का समर्थन किया राहुल सांकृत्यायन ने. लेकिन अंग्रेज पर्यटक फ्रांसिस बुकानन ने 1811 में अपने परिभ्रमण वृतांत में बताया, भागलपुर में कहलगांव से लगभग 11 किलोमीटर दूर पत्थर घट्टा के आसपास छोटेबड़े टीले हैं, जो किसी राजमहल के ध्वंसावशेष हो सकते हैं. 1930 में सीईडब्ल्यू ओल्डहम ने बुकानन की डायरीसंपादित करते हुए अपनी प्रस्तावना में लिखा, बुकानन ने पत्थर घट्टा के समीप किसी राजमहल के ध्वंसावशेष होने की जो संभावना व्यक्त की है, संभवत: यहीं विक्रमशिला बौद्ध महाविहार हो. कासड़ी निवासी एलके मिश्र, कहलगांव निवासी नित्यानंद चौधरी एवं भागलपुर के पंडित निशिकांत मिश्र ने इतिहासकारों और पुरातत्व वेत्ताओं का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया.

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पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग की ओर से डॉ. बीपी सिन्हा के नेतृत्व में अंतिचक टीले का उत्खनन 196061 में शुरू हुआ, जो दस सालों तक चला. केंद्रीय पुरातत्व विभाग के तत्वावधान में 1971 में विक्रमशिला परियोजना शुरू हुई, जिसके तहत डॉ. बीएस वर्मा के नेेतृत्व में 1982 तक उत्खनन कार्य चला. उत्खनन में जो मिला महाविहार बताता है कि यह स्थल शिक्षा एवं संस्कृति का महान केंद्र रहा होगा. चारों ओर मजबूत दीवारों से घिरे इस महाविहार में एक विशाल मंदिर था. 107 अन्य मंदिर थे. सम्राट ने स्वयं 108 अध्यापकों एवं सात व्यवस्थापकों की नियुक्ति वैतनिक रूप से की थी. यहां कुल 648 अध्यापक थे, जो शास्त्रों और वेदों के प्रकांड पंडित थे. प्रधान सभा में आठ हजार लोग एक साथ बैठ सकते थे. बड़ी संख्या में देशी-विदेशी छात्र यहां पढऩे आते थे. यहां विस्तृत एवं संपन्न पुस्तकालय भी था, जिसमें बौद्ध धर्म, संस्कृति एवं तंत्र विद्या से संबंधित ग्रंथों की संख्या सर्वाधिक थी. विक्रमशिला का महत्व नालंदा से अधिक था. तारा नाथ ने महाविहार के छह द्वारों की चर्चा की है. नालंदा में मात्र एक प्रवेश द्वार था. इन छह द्वारों पर द्वार पंडितप्रतिष्ठित थे, जो ज्ञान-विज्ञान की छह विभिन्न शाखाओं के निष्णात विद्वान थे.

उत्खनन में जो भव्य संघाराम मिला है, वह वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है. यहां 500 फीट का प्रमुख द्वार है और संघाराम तक जाने के लिए छोटीबड़ी अनेक सीढिय़ां हैं. परिसर में पत्थर का एक भूमिगत बड़ा नाला है, जो बीचबीच में कहीं टेढ़ा होकर बहता है. इससे जाहिर है कि योजनाबद्ध तरीके से निर्मित महाविहार में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था थी. यह महाविहार बौद्ध धर्म की महायान शाखा का एक प्रमुख केंद्र था. नालंदा एवं विक्रमशिला, दोनों ही जगह महायान से मंत्रयान एवं तंत्रयान का प्रादुर्भाव हुआ, लेकिन विक्रमशिला महाविहार तंत्रयान एवं मंत्रयान का विशेष केंद्र बन गया. यहां बड़ेबड़े धर्माचार्य अपने शिष्यों के साथ रहते थे, जिनमें आचार्य दीपांकर श्रीज्ञान का नाम अग्रणी है. वह यहां के प्रधानाचार्य थे. उनकी ख्याति विदेशों तक थी. तिब्बत के राजा ने उन्हें अपने यहां बुलाने के लिए सौ सेवकों का प्रतिनिधि मंडल भेजा था, जो आमंंत्रण और पर्याप्त स्वर्ण राशि लेकर आया था. लेकिन, आचार्य ने उसे स्वीकार नहीं किया और जाने से इंकार कर दिया. कुछ समय बाद तिब्बत के राजा ने पुन: आचार्य दीपांकर श्रीज्ञान को मर्मस्पर्शी पत्र भेजा, जिससे उनका हृदय पिघल गया और उन्होंने तिब्बत जाने का फैसला कर लिया. तेरह साल तक उन्होंने तिब्बत में रहकर बौद्ध धर्म, दर्शन एवं संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया. पंडित राहुल सांकृत्यायन दावा करते रहे कि आचार्य श्रीज्ञान का जन्म स्थान विक्रम शिला के निकट सिहोर राज्य में हुआ था. यह विक्रमशिला से लेकर भागलपुर तक फैला हुआ है. कुछ विद्वान उनका जन्म स्थान बांग्लादेश में ढाका के निकट विक्रामानी पुर बताते रहे. बौद्ध धर्म का परिमार्जनपुनरुत्थान करने वाले भारत के अंतिम आचार्य दीपांकर श्रीज्ञान पर राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर शोध, अध्ययन प्रकाशित किए जा रहे हैं, लेकिन राज्य के शोध संस्थान एवं विश्वविद्यालय उदासीन हैं.

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किसने क्या कहा

विक्रमशिला का उत्खनन मेरे लिए यादगार अनुभव है. विक्रमशिला के मुख्य स्तूप की खुदाई के बाद मैंने उसके निकट जंगलिया टीले की खुदाई शुरू की थी, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक पद पर प्रोन्नत होने के चलते मुझे दिल्ली जाना पड़ा. जंगलिया टीले में विक्रमशिला के कई राज छिपे हैं. इसकी खुदाई शीघ्र शुरू होनी चाहिए.

– डॉ. बीएस वर्मा, पूर्व निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं विक्रमशिला बौद्ध महाविहार के उत्खननकर्ता.

खुदाई के बाद विक्रमशिला के पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण एवं संवर्धन के महती कार्य में मैं शरीक था. विक्रमशिला हमारी महत्वपूर्ण विरासत है. इसे सहेज कर रखना सभी का दायित्व है.

– पद्मश्री डॉ मोहम्मद केके, पूर्व निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण.

विक्रमशिला और उसके आचार्य दीपांकर के लिए राहुल जी आजीवन कार्यरत रहे. उन्होंने तिब्बत की दुर्गम यात्राएं कीं, पर लोग न तो पंडित राहुल सांकृत्यायन को सम्यक रूप से याद रख पाए और न आचार्य दीपांकर को.

– श्रीमती जया पड़हाक, पंडित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री.

विक्रमशिला के पुरातात्विक अवशेषों को देखकर आह्लादित हूं. गंगा तट पर मनोरम प्राकृतिक दृश्यों के बीच इस प्राचीन बौद्ध विहार का सम्यक विकास न होना अफसोसनाक है.

– डॉ. अनंत आशुतोष द्विवेदी, उपनिदेशक, बिहार विरासत विकास समिति.

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