विकास बनाम भ्रष्टाचार

ओपिनियन पोस्ट
Tue, 22 May, 2018 16:25 PM IST

अभिषेक रंजन सिंह

पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा अमूमन विकास को ही प्रमुख मुद्दा बना कर लड़ती रही है। लेकिन कर्नाटक विधानसभा चुनाव में रुख बदला हुआ है और भाजपा सिद्धारमैया सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रही है। इसकी वजह शायद यही है कि भाजपा भी समझती है कि विकास कार्यों को लेकर कांग्रेस सरकार को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। इसलिए उसने भ्रष्टाचार को अहम मुद्दा बनाया है। वैसे कर्नाटक में इस बार मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्युलर) अपने प्रभाव वाले इलाके दक्षिण कर्नाटक में मुकाबले को त्रिकोणीय बनाए हुए है। जेडीएस ने इस बार बसपा से गठबंधन कर रखा है मगर भाजपा के साथ मिलकर वह पहले भी राज्य में सरकार बना चुकी है। इसलिए कयास लगाए जा रहे हैं कि खंडित जनादेश मिलने की स्थिति में जेडीएस फिर से भाजपा के साथ जा सकती है। मगर यहां की जमीनी हकीकत स्पष्ट बहुमत वाली सरकार की तरफ इशारा कर रही है।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इस बार दो सीटों चामुंडेश्वरी और बादामा से चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि उनके बेटे वरुणा सीट से। आम लोगों में यह चर्चा का विषय है कि विकास के मुद्दे पर चुनाव मैदान में उतरी कांग्रेस को लिंगायत कार्ड क्यों खेलना पड़ा। लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने का फैसला कर सिद्धारमैया ने भाजपा के परंपरागत वोटों को साधने की कोशिश की है। कांग्रेस का यह दांव भाजपा के लिए किसी झटके से कम नहीं है। मगर चुनाव करीब आते-आते इस कार्ड का असर कम होने लगा है क्योंकि ज्यादातर लिंगायतों को इसमें इरादे कम और राजनीति अधिक नजर आ रही है। बेंगलुरु के वरिष्ठ पत्रकार नारायणकर कहते हैं, ‘चुनाव से ठीक पहले लिंगायतों पर मेहरबान होने से इस समुदाय में कांग्रेस सरकार के प्रति शक पैदा हुआ। मुख्यमंत्री के इस फैसले का लिंगायतों के वीरशैव पंथ ने खुलकर विरोध किया। वीरशैवों ने इसे कांग्रेस का विभाजनकारी फैसला बताया। हालांकि इसी समुदाय के दूसरे धड़ों ने इसका समर्थन किया है लेकिन तमाम तर्क-वितर्क के बाद भी लिंगायत बीएस येदियुरप्पा के साथ हैं। लिंगायत भाजपा के साथ रहें, इसलिए पार्टी ने सर्वाधिक टिकट इसी समुदाय के लोगों को दिया है।’ कांग्रेस के लिंगायत कार्ड से यहां की दूसरी प्रभावी जाति वोक्कालिंगा भी नाराज है। इस जाति के पंच पीठ सरकार के इस फैसले के खिलाफ हैं। बेल्लारी निवासी पी. सदाशिव वीरशैव पंथ के अनुयायी हैं। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को लिंगायतों के प्रति कुछ करना था तो उनकी शिक्षा और रोजगार के लिए कोई नीति बनाते।

मठों का असर
पंजाब और हरियाणा के डेरों की तरह कर्नाटक में भी अलग-अलग जातियों एवं संप्रदायों के सैकड़ों मठ हैं। इनमें लिंगायतों के मठों की संख्या सबसे अधिक है। बेंगलुरु के पत्रकार एस रविराज बताते हैं, ‘कर्नाटक में लिंगायतों के 450 छोटे-बड़े मठ हैं। वोक्कालिंगा के मठों की संख्या करीब सौ है। कुरबा समुदाय के भी 70 मठ हैं। इन मठों का कर्नाटक की सियासत में अच्छा प्रभाव है। नतीजतन चुनावों के वक्त तमाम सियासी पार्टियां मठों का आशीर्वाद पाना चाहती हैं।’ कर्नाटक में नाथ संप्रदाय के भी कुछ मठ हैं। इसकी अहमियत समझते हुए भाजपा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी चुनाव प्रचार में उतारा है। त्रिपुरा में भाजपा इस फॉर्मूले का सफल इस्तेमाल कर चुकी है। कर्नाटक के दलितों में मदीगा और चालावाडी उसकी उप जातियां हैं। राज्य के कई विधानसभा क्षेत्रों में इनकी निर्णायक भूमिका है। मदीगा जाति की शिकायत है कि उन्हें आरक्षण का सही लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए उन्होंने अपने समाज के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग की है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उनकी मांग को पूरा करने का भरोसा दिलाया है।
अमित शाह अपने चुनावी दौरे में लिंगायत समेत कई समुदायों के मठों में मत्था टेक चुके हैं। इसी कड़ी में उन्होंने तुमकुर जिला स्थित सिद्धगंगा मठ में महंत शिवकुमार स्वामी से आशीर्वाद लिया तो चित्रदुर्ग में दलितों के एक बड़े मठ में मादारा चेन्नैयाह से मुलाकात की। मध्य कर्नाटक के कई जिलों में दलितों के इस मठ का काफी प्रभाव है। स्थानीय समाजशास्त्री एम शेषाद्रि बताते हैं, ‘कर्नाटक के दलितों में मदीगा के अलावा कई उप जातियां हैं जिनकी शैक्षणिक व सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं है। करीब सात विधानसभा क्षेत्रों में मदीगाओं की संख्या अधिक है। इसलिए अमित शाह का इस मठ में आना मदीगा मतदाताओं को लुभा सकता है।’

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किस तरफ जाएंगे दलित, आदिवासी व मुसलिम
कर्नाटक की कुल 224 विधानसभा सीटों में 36 अनुसूचित जाति और 15 अनुसूचित जनजाति के लिए लिए आरक्षित हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में दलितों और आदिवासियों का ज्यादातर वोट कांग्रेस को मिला था। अनुसूचित जातियों की आरक्षित सीटों में कांग्रेस को 17, जेडीएस को 10 और भाजपा को महज छह सीटें मिली थीं। जबकि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों में कांग्रेस को नौ और जेडीएस व भाजपा को एक-एक सीट मिली थी। देशभर में दलित उत्पीड़न की हालिया चर्चित घटनाओं का असर कर्नाटक में भी देखा जा रहा है। इसे लेकर कांग्रेस और जेडीएस भाजपा पर हमलावर हैं। वहीं भाजपा इसके बचाव में सदाशिव आयोग की सिफारिशों को लागू करने को लेकर सिद्धारमैया सरकार पर दबाव बना रही है ताकि दलितों का समर्थन मिल सके। भाजपा के प्रदेश महामंत्री रवि कुमार ने ओपिनियन पोस्ट को बताया, ‘सदाशिव आयोग ने आरक्षण के वर्गीकरण को लेकर सुझाव दिए हैं लेकिन सिद्धारमैया सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद इसे प्राथमिकता से लागू किया जाएगा।’ इस मुद्दे पर जेडीएस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. कृष्णा कहते हैं, ‘भाजपा शासित राज्यों में दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। भाजपा दलितों और पिछड़ों को मिलने वाले आरक्षण को खत्म करना चाहती है। वहीं कांग्रेस दलितों के प्रति झूठी हमदर्दी जताती है।’ कर्नाटक में जेडीएस और बसपा के बीच चुनावी समझौता हुआ है। इसके तहत बसपा बीस सीटों पर चुनाव लड़ रही है। जेडीएस को उम्मीद है कि बसपा का साथ उसके लिए फायदेमंद होगा।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बी. शिवराम का मानना है कि दलितों और मुसलिमों का साथ जेडीएस को नहीं मिलेगा। प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब सोलह फीसदी है। सूबे में अगली सरकार किसकी बनेगी यह मुसलिम मतदाताओं पर निर्भर करता है। पिछले चुनाव में मुसलमानों का एकमुश्त वोट कांग्रेस को मिला था। इस बार भी मामला कुछ ऐसा ही दिखाई पड़ रहा है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने जेडीएस को समर्थन देने का ऐलान किया है लेकिन क्या वाकई कर्नाटक के मुसलमान जेडीएस की तरफ झुकेंगे। मैसूर महानगर कांग्रेस के सचिव सैय्यद दाऊद इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनके मुताबिक, ‘ओवैसी मुसलमानों के ठेकेदार नहीं हैं। अगर उनकी बातों का असर होता तो आंध्र प्रदेश में उनकी पार्टी के दो-चार सांसद होते। विकास के मामले में कांग्रेस का मुकाबला भाजपा नहीं कर सकती।’ इस बार कई ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां कांग्रेस और जेडीएस के उम्मीदवार मुसलिम हैं। तो क्या इस वजह से मुसलमानों के वोट बंटेंगे, मोहम्मद सादिक का इस पर कुछ अलग ही कहना है। उनके मुताबिक, ‘ऐसी सीटों पर जहां कांग्रेस का उम्मीदवार मजबूत होगा मुसलमान उसे वोट देंगे और जहां जेडीएस उम्मीदवार मजबूत होगा मुसलमान उसे वोट करेंगे।’ यानी कुल जमा मामला यह है कि मुसलमान उसे वोट करेंगे जो भाजपा को शिकस्त दे सके। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्व मंत्री कागोडू थिमप्पा का कहना है कि कांग्रेस फिर से सरकार बनाने जा रही है। जेडीएस और भाजपा में अंदरूनी समझौता है। धर्म की राजनीति में माहिर भाजपा का सिक्का कर्नाटक में नहीं चल पा रहा है। मोदी और योगी की रैली सिर्फ औपचारिकता है। कर्नाटक की जनता में उनमें कोई दिलचस्पी नहीं है।

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किसान आत्महत्या पर घिरी सरकार
राज्य में जारी किसानों की आत्महत्याओं को लेकर सिद्धारमैया सरकार सवालों के घेरे में है। भाजपा और जेडीएस दोनों के लिए यह बड़ा मुद्दा है। पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पांच वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात कही थी। किसानों की आमदनी दोगुनी तो नहीं हुई लेकिन खुदकुशी करने वाले किसानों की संख्या जरूर चार गुना बढ़ गई। कर्नाटक कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 2013 से 2017 के बीच 3,500 किसानों ने आत्महत्या की। किसान नेता के. राघवेंद्र बताते हैं, ‘विपक्षी दलों के दबाव और चुनाव करीब आने पर मुख्यमंत्री ने आत्महत्या करने वाले किसानों के आश्रितों को मिलने वाले मुआवजे को एक लाख से बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दिया। फिर भी मौत के आंकड़ों में कमी नहीं आई।’ भाजपा के प्रदेश महामंत्री रवि कुमार ओपिनियन पोस्ट से कहते हैं, ‘किसानों की आत्महत्या के लिए सिद्धारमैया सरकार दोषी है। कांग्रेस ने वादा किया था कि वह किसानों के आठ हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ करेगी लेकिन उसने इसे पूरा नहीं किया। राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद किसानों की बेहतरी उनकी सरकार का पहला लक्ष्य होगा।’
येदियुरप्पा भाजपा के लिए जरूरी या मजबूरी
यह अपने आप में विरोधाभासी है कि भाजपा भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर लड़ रही है और बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर रखा है, उन्हीं येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार के आरोप की वजह से मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। आगे चलकर भाजपा से उनकी तल्खी बढ़ी और कर्नाटक जनता पार्टी बनाकर वे 2013 के विधानसभा चुनाव में उतर गए। पिछले चुनाव में उन्हें ज्यादा फायदा तो नहीं हुआ लेकिन भाजपा का खेल खराब करने में वे सफल रहे। कुछ ऐसा ही किस्सा बी. श्रीरामुलु का है। दोनों फिर से भाजपा में लौट आए।
मुंबई कर्नाटक भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। सात जिलों वाले इस इलाके में विधानसभा की कुल 50 सीटें हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में येदियुरप्पा के भाजपा से अलग हो जाने से कांग्रेस यहां परचम फहराने में कामयाब रही और उसे 31 सीटें मिलीं। जबकि भाजपा को 13, जेडीएस और केजीपी को एक-एक और अन्य दलों को तीन सीटें मिलीं। इस इलाके में लिंगायतों और दलितों की संख्या अधिक है। इस बार भाजपा को यकीन है कि नतीजे पिछली बार से अलग होंगे क्योंकि येदियुरप्पा की वापसी का सीधा लाभ उसे मिलेगा। भाजपा अपना दूसरा मजबूत गढ़ तटीय कर्नाटक को मानती है। यहां विधानसभा की 19 सीटें हैं। इस इलाके को आरएसएस और भाजपा के हिंदुत्व की प्रयोगशाला भी कहा जाता है।
हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र में छह जिले हैं। 40 विधानसभा सीटों वाला यह इलाका कांग्रेस का गढ़ रहा है।पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस को 23, भाजपा को पांच, जेडीएस को पांच, केजीपी को तीन और अन्य को चार सीटें मिली थीं। मध्य कर्नाटक येदियुरप्पा का गृह क्षेत्र है। इस बार वे शिमोगा जिले के शिकारीपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं। इलाके में विधानसभा की कुल 28 सीटें हैं जिनमें लिंगायत समुदाय की बहुतायत है। पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस को 15, जेडीएस को छह, भाजपा को पांच और केजीपी और अन्य दलों को एक-एक सीटें मिलीं। इस बार यहां मुख्य लड़ाई कांग्रेस और भाजपा के बीच है।
राजनीतिक लिहाज से राज्य का एक अहम हिस्सा मैसूर कर्नाटक है। इसे दक्षिण कर्नाटक भी कहा जाता है। यहां विधानसभा की कुल 59 सीटें हैं। वोक्कालिंगा बहुल यह इलाका जेडीएस की मजबूत जमीन है। पूर्व प्रधानमंत्री व जेडीएस प्रमुख एचडी देवगौड़ा हासन जिले से ही हैं। पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस और जेडीएस के बीच लड़ाई थी। देवगौड़ा के पुत्र और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी भी मानते हैं कि इस बार भी लड़ाई इन्हीं दोनों दलों के बीच होना तय है। पिछली बार यहां भी कांग्रेस आगे रही थी और उसे 27 सीटें जबकि जेडीएस को 25, भाजपा को दो और अन्य दलों को पांच सीटें मिली थीं। लेकिन इस बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यहां खास जोर दे रहे हैं। वोक्कालिंगा बहुल इस इलाके में मुसलमानों की संख्या भी काफी है। मैसूर भाजपा के जिला महासचिव बालाकृष्णा बताते हैं, ‘इस बार हालात बदले हुए हैं। साथ ही मायावती और ओवैसी का जेडीएस को समर्थन करना भी भाजपा के लिए फायदेमंद है।’ एसडीपीआई यानी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार उतारे जाने से भी भाजपा खुश है। पार्टी को भरोसा है कि इससे मुसलमानों के वोटों में विभाजन होगा।
बेंगलुरु शहरी व ग्रामीण क्षेत्र में विधानसभा की 28 सीटें हैं। पिछले चुनाव में 13 सीटों के साथ कांग्रेस पहले स्थान पर रही थी जबकि भाजपा को 12 और जेडीएस को तीन सीटें हासिल हुर्इं थीं। आईटी सिटी होने की वजह से बेंगलुरु में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे दूसरे राज्यों के लोगों की संख्या अधिक है। यहां रहने वाले हिंदी भाषियों पर इस बार भाजपा की खास नजर है। इस बार भाजपा यहां अपनी सीधी लड़ाई कांग्रेस से मान रही है।

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चंद्रबाबू और केसीआर बढ़ा सकते हैं भाजपा की मुश्किलें
आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलने से नाराज मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से नाता तोड़ लिया है। भाजपा को सबक सिखाने के लिए नायडू कर्नाटक की राजनीति में दिलचस्पी ले रहे हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी इसी राह पर हैं। वे जेडीएस प्रमुख एचडी देवगौड़ा से भी मुलाकात कर चुके हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सीमाओं से लगी 40 विधानसभा सीटों में बड़ी संख्या इन दोनों राज्यों के लोगों की है। नायडू और केसीआर का बदला रुख भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं है। ’

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