नहीं रहे आखिरी कलाम के सर्जक दूधनाथ सिंह

ओपिनियन पोस्ट
Thu, 08 Mar, 2018 17:48 PM IST

उमेश सिंह

बलिया के सोबंथा गांव में पैदा हुए। इलाहाबाद में रच-बस गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शिक्षक थे हमारे गुरु जी। महाप्राण निराला, महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत के प्रिय थे। चोटी के चिंतक और लेखक थे। जितने सरल-सहज थे, उतने ही निडर अवधूत भी थे। उनकी छाया में सृजनधर्मियों की नई पीढ़ी तैयार हुई, नई जमात खड़ी हुई। उन्होंने समाज के विश्वविद्यालय से तीन चौथाई सदी का अनुभव लिया। उस अनुभूति को कलम की सियाही के जरिये साहित्य सृजन में समर्पित कर दिया। आधी सदी तक लेखन धर्म में निमग्न रहे। वे हर शब्द, हर क्षण, हर भाव-भंगिमा में रचनात्मकता से ओर-पोर भरे रहते थे। उनके रोम-रोम में रचनात्मकता समाई हुई थी। चुंबकीय व्यक्तित्व था उनका। वह अंधियारे पर रोशनी डालते थे तो वहां घुप्प अंधेरा भी गायब हो जाता था। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचना हर विधा में सक्रिय थे। साहित्य के आकाश में जिस प्रयाग की जमीन से उड़े थे, वहीं से आखिरी कलाम के सर्जक ने अंतिम विदाई ले ली। उनका एक वाक्य बरबस याद आ रहा है- हमें इस बात का डर नहीं है कि लोग बिखर जाएंगे, डर यह है कि लोग नितांत गलत कामों के लिए कितने बर्बर ढंग से संगठित हो जाएगे। इस कविता से उन्हें याद करते हैं- कानों में बजता हुआ चुंबन हूं/उंगलियों की आंच हूं…
बलिया की माटी ने कई विभूतियों को जना। उनमें एक विभूति दूधनाथ सिंह भी थे, जिनका जन्म 17 अक्टूबर 1936 को सोबन्था गांव में हुआ था। वहां से ज्ञान की नगरी प्रयाग आए तो फिर यहीं के होकर रह गए। दूधनाथ सिंह साठोत्तरी कहानी के नायकों में शामिल थे। उन्होंने नई कहानी आंदोलन को चुनौती देकर साठोत्तरी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। हिंदी के चार यार चर्चित रहे हैं जिनमें रवींद्र कालिया, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह और ज्ञानरंजन हैं। ‘गालिब छूटी शराब’ जैसा आत्मकथात्मक उपन्यास लिखने वाले रवींद्र कालिया ने कुछ बरस पहले विदाई ले ली और इसके बाद दूधनाथ सिंह। चार यार में अब दो ही बचे हैं- काशीनाथ सिंह और ज्ञानरंजन। इलाहावाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व दूधनाथ सिंह के शिष्य कमल कृष्ण राय ने कहा कि अभी हम अपने गुरु और दुर्लभ व्यक्ति दूधनाथ जी को घाट पर छोड़कर चले आए हैं। अब वे वहां से नहीं लौटेंगे। उनकी अस्थियां गंगा जी ने अपनी गोद में ले लिया है और मध्यम-मध्यम दूर लेकर जा रही हैं। बहुतों को पढ़ाया। कहीं कविता पढ़ी। कहीं कहानी पाठ किया। कभी छात्र संघ पर भाषण दिया। इलाहाबाद ने अपने अगुवा को हीरों की तरह विदा किया। दूधनाथ सिंह लोगों के विचार और कर्म में जिंदा रहेंगे।
वह अपनी कलम के जरिये साहित्य के हर विधा में गहरी दखल रखते थे। इलाहावाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शिक्षक नियुक्त हुए और वहीं से सेवानिवृत्त हो गए। लेखन की शुरुआत वर्ष 1959 में धर्मयुग में प्रकाशित कहानी ‘तुमने तो कुछ नहीं कहा’ से हुई। कमोबेश इसी समय ‘लहर’ में प्रकाशित ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ से वे बेहद चर्चित हो गए। ‘रीछ’ और ‘रक्तपात जैसी कहानियों ने उन्हें विशेष पहचान दी। महज 32 वर्ष की उम्र में ‘निराला: आत्महंता आस्था’ लिखी जिसे हिंदी जगत में निराला जी पर अत्यंत प्रमाणिक पुस्तक माना जाता है। उनके संस्मरण ‘लौट आ, ओ धार!’ को भी खासी लोकप्रियता मिली। ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’, ‘काशी नरेश से पूछो’ तथा ‘माई का शोकगीत’ भी चर्चित रहा। तीन कविता संग्रह ‘एक और आदमी है’, ‘अगली शताब्दी के नाम’ और ‘युवा खुशबू’ में उनके कवित्व की गमक है। 6 दिसंबर 1992 को आधार बना ‘आखिरी कलाम’ उपन्यास लिखा। इस उपन्यास की पाठकों में ऐसी मांग रही कि एक वर्ष के भीतर ही तीन संस्करण निकालना पड़ा। राजकमल प्रकाशन ने 60 वर्ष में 60 महत्वपूर्ण पुस्तकों की सूची तैयार की तो उसमें आखिरी कलाम को भी स्थान मिला। दो वर्ष पहले आखिरी कलाम लिखने के 22 वर्ष बाद फैजाबाद-अयोध्या आए और उन स्थानों पर गए और उन लोगों से मिले, जिन्होंने आखिरी कलाम के सृजन में सहयोग दिया था। काकोरी कांड के नायक अशफाक उल्लाह खां की स्मृति में दिए जाने वाले माटी रतन सम्मान से वे अलंकृत हुए। पौराणिक आख्यान पर आधारित नाटक ‘यमगाथा’ इतनी चर्चित हुई कि वह सात भाषाओं में प्रकाशित हुई। उन्हें ‘भारत-भारती’ और मैथिली शरण गुप्त सम्मान भी मिला था।
दूधनाथ सिंह की कविता की कुछ पंक्तियां याद आ रही है। ‘कानों में बजता हुआ चुंबन हूं/उंगलियों की आंच हूं…। ‘मैने पत्थरों में खिंचा/ सन्नाटा देखा/ जिसे संस्कृति कहते हैं…। ‘मैने एक आंख वाला/ इतिहास देखा है/ जिसे फिलहाल सत्य कहते हैं…। सत्यान्वेषी चला गया। काल के क्रूर पंजों ने हमसे छीन लिया लेकिन वे अपनी रचनाओं से हमेशा जिंदा रहेंगे। हमेशा हमारे आस-पास ही रहेंगे। 

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