देश की दिशा तय करेगा लोकसभा चुनाव 2019

डॉ. मनीष कुमार
Sat, 16 Mar, 2019 11:17 AM IST

चुनाव आयोग ने 2019 के लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी है. यह आजाद भारत का सबसे निर्णायक और कठिन चुनाव है. इस चुनाव के नतीजे भारत का भविष्य तय करेंगे. इस बात का फैसला होगा कि भारत हिंदुत्व की विचारधारा पर आगे चलेगा या फिर 2014-19 का कालखंड महज एक अल्पकालीन पथभ्रष्टता थी. विपक्ष को लगता है कि संघ परिवार और भाजपा, हिंदुत्व का ऐसा एजेंडा चला रहे हैं, जिससे देश को काफी नुकसान पहुंच सकता है. सामाजिक एवं धार्मिक समरसता बिखर सकती है, देश टूट सकता है. ऐसे में, विपक्ष की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. यह विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह 2019 के चुनाव को वैचारिक लड़ाई का रूप दे. लेकिन, विपक्ष इस परीक्षा में अब तक असफल रहा है. कांग्रेस समेत विभिन्न विपक्षी दल जन सरोकार के मुद्दे नहीं उठा रहे हैं. अभी तक विपक्ष ने इस मुद्दे को प्रमुखता नहीं दी है कि किस तरह नोटबंदी और जीएसटी की वजह से मझोले और छोटे व्यवसायियों की कमर टूट गई. किस तरह मोदी सरकार आने के बाद देश में रियल एस्टेट के साथ अनऑर्गनाईजसेक्टर का बेड़ा गर्क हो गया, जिससे करोड़ों लोग सडक़ पर आ गए. यही नहीं, किसानों, मजदूरों, अल्पसंख्यकों एवं शोषित समाज की समस्याओं को विपक्ष मुद्दा बनाने में असफल रहा है. विडंबना यह है कि विपक्ष वे मुद्दे उठा रहा है, जिनका आम जिंदगी से कोई रिश्ता नहीं है. वह बिना सुबूत और दलील के मोदी सरकार को ऐसे मुद्दों पर घेरना चाहता है, जो आम जनता की समझ से बाहर हैं. कांग्रेस ने जस्टिस लोया, भीमा-कोरेगांव हिंसा में शामिल नक्सली नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कांफ्रेंस और राफेल जैसे मुद्दों के जरिये सरकार को घेरने की कोशिश की. उक्त मुद्दे प्रबुद्ध वर्ग में चर्चा का विषय तो जरूर बने, लेकिन जनता का साथ विपक्ष को नहीं मिल सका.

जिस परिदृश्य में लोकसभा चुनाव हो रहा है, वह भारतीय जनता पार्टी के मनमुताबिक और प्रधानमंत्री मोदी के लिए फायदेमंद है. यह चुनाव पुलवामा हमले के बाद भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव के बीच हो रहा है. यह चुनाव वायुसेना द्वारा पाकिस्तान में घुसकर बालाकोट में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की पृष्ठभूमि में हो रहा है. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्हें अपने कार्यकाल का लेखा-जोखा देना था. उन्हें काले धन पर किए गए अपने वादे के बारे में बताना था. नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान या फायदा हुआ, यह जनता को बताना था. मोदी सरकार युवाओं को रोजगार देने में क्यों बुरी तरह विफल रही, इस पर प्रधानमंत्री की जवाबदेही बनती थी. किसानों की आत्महत्या पिछले पांच सालों में क्यों नहीं रुकी, इसका जवाब देना था. लेकिन, अब न तो उनसे कोई ये सवाल कर रहा है और न इन मुद्दों पर बहस हो रही है. मीडिया भी भारत-पाकिस्तान के बीच उपजे तनाव को भुनाने में लगा है. प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनाव प्रचार आसान हो गया है. वह पहले अपनी सरकार की कुछ योजनाओं के बारे में अच्छी-अच्छी बातें करते हैं और फिर उनका भाषण सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर केंद्रित हो जाता है. वह बालाकोट एयर स्ट्राइक और विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई का चुनावी इस्तेमाल करने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहे हैं. वहीं विपक्ष खासकर, कांग्रेस एयर स्ट्राइक का सुबूत मांग कर इस मुद्दे को जिंदा रखने और हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. इसलिए इस चुनाव का मुख्य मुद्दा राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा बनकर रह गया है.

READ  2019 के जंग की रणनीति

ऐसे में खतरा इस बात का बढ़ गया है कि यह लोकसभा चुनाव अब तक का सबसे अमर्यादित चुनाव हो सकता है. अनुमान यह है कि 2019 के चुनाव के दौरान भाषा की गरिमा टूटेगी, जनता से जुड़े मुद्दे नदारद रहेंगे, राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने वाला कोई नेता नहीं होगा, विचारधारा का सिर्फ दिखावा किया जाएगा, जाति-धर्म और पाकिस्तान के नाम पर लोगों को भडक़ाया जाएगा. लेकिन, दुर्भाग्य इस बात का है कि प्रधानमंत्री पद के दूसरे उम्मीदवार राहुल गांधी जिस तरह व्यवहार कर रहे हैं, उससे जाहिर होता है कि एक राजनीतिज्ञ के तौर पर वह अभी भी अपरिपक्व हैं. सोशल मीडिया में उनके नाम से जारी किया जा रहा ट्वीट पढक़र ऐसा लगता है कि राहुल गांधी देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं, बल्कि किसी कॉलेज के छात्र नेता हों. कई महापुरुषों ने कांग्रेस अध्यक्ष के पद की गरिमा बढ़ाई है. राहुल के परदादा पंडित नेहरू एक महान राजनीतिज्ञ थे. उनकी दादी एक निपुण प्रधानमंत्री थीं. उनके पिता राजीव गांधी भी कुछ ही वक्त में परिपक्व नेता बन गए थे. लेकिन, 15 सालों से सक्रिय राजनीति में रहने के बावजूद राहुल ने आज तक एक भी ऐसा भाषण नहीं दिया, जिसके आधार पर लोगों में यह आत्मविश्वास कायम हो सके कि वह देश को नेतृत्व दे सकेंगे. इतना ही नहीं, राफेल डील पर बोलते समय वह इसे कभी एक लाख तीस हजार करोड़ का घोटाला बता देते हैं, तो कभी साठ हजार करोड़ का. कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष से कम से कम यह उम्मीद तो लगाई ही जा सकती है कि वह पुख्ता सुबूतों के साथ आरोप लगाएं और भाषा की गरिमा का ख्याल रखें.

READ  निगाहें मोदी पर, निशाने पर कांग्रेस-वाम मोर्चा

चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी है. मतदान 11 अप्रैल को शुरू होकर 19 मई को खत्म होगा. नतीजे 23 मई को आएंगे. पिछले कुछ चुनावों से आयोग पर काफी दबाव रहा. यह आरोप भी लगा कि आयोग जिन ईवीएम का इस्तेमाल कर रहा है, उनके साथ छेड़छाड़ करके किसी पार्टी विशेष को फायदा पहुंचाया जा सकता है. इसलिए इस बार चुनाव आयोग ने काफी बारीकी से तैयारी की है. इस चुनाव में सात चरणों में मतदान होंगे. पहले चरण का चुनाव 11 अप्रैल, दूसरे चरण का चुनाव 18 अप्रैल, तीसरे चरण का चुनाव 23 अप्रैल, चौथे चरण का चुनाव 29 अप्रैल, पांचवें चरण का चुनाव 6 मई, छठवें चरण का चुनाव 12 मई और सातवें चरण का चुनाव 19 मई को होगा. पहले चरण में 91, दूसरे चरण में 97, तीसरे चरण में 115, चौथे चरण में 71, पांचवें चरण में 51, छठवें और सातवें चरण में 59-59 सीटों पर चुनाव होंगे. हालांकि, इस बार का प्लान थोड़ा अटपटा जरूर है, लेकिन अच्छी बात यह है कि सभी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट मशीनें होंगी. इससे मतदाताओं को यह पता चल सकेगा कि उनकी ओर से दिया गया वोट सही उम्मीदवार को ही पड़ा है या नहीं. यही नहीं, ईवीएम की भी कई स्तरीय सुरक्षा होगी. हर उम्मीदवार को फॉर्म 26 भरना होगा. देश भर में कुल 10 लाख मतदान केंद्रों पर मतदान कराया जाएगा. 2014 में यह संख्या नौ लाख के करीब थी. सभी मतदान केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे भी लगे होंगे. पूरी चुनावी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी होगी. ये सारे इंतजाम इसलिए किए गए हैं, क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से विपक्ष ईवीएम पर सवाल उठाता रहा है. नोट करने वाली बात यह है कि 11 अप्रैल से शुरू हो रहे लोकसभा चुनाव के साथ-साथ चार राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होंगे. इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और ओडिशा शामिल हैं. इस बार चुनाव आयोग मुस्तैद है, ताकि चुनाव नतीजे आने के बाद चुनाव प्रक्रिया पर कोई सवाल न उठा सके.

READ  300 पार मोदी सरकार : ओपिनियन पोल

चुनाव के नतीजे क्या होंगे, यह तो 23 मई को पता चलेगा, लेकिन ओपिनियन पोस्ट ने एक देशव्यापी सर्वे किया है. सर्वे का मकसद यह पता लगाना था कि पाकिस्तान पर हवाई हमले का असर प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता पर कितना हुआ है और इसका चुनावी नतीजे में कितना दखल होगा. ओपिनियन पोस्ट के सर्वे में कुछ चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं. पुलवामा हमले और पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद भारतीय जनता पार्टी को कम से कम 70 सीटों का फायदा पहुंचा है. मतलब साफ है कि एक तरफ भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा को मुख्य मुद्दा बनाएगी और जनता से जुड़े सवाल इस चुनाव से गायब हो जाएंगे.

×