चीन में शी जिनपिंग युग- वैश्विक राजनीति में पैर जमाने की कोशिश

आनंद प्रधान

अब इसमें किसी को शक नहीं रह जाना चाहिए कि चीन की राजनीति में आधिकारिक तौर पर शी जिनपिंग युग की शुरुआत हो गई है। अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में संपन्न हुई चीन की सत्तासीन कम्युनिस्ट पार्टी के 19वें अधिवेशन ने भी इस पर मुहर लगा दी है। हर पांच साल पर होने वाले पार्टी अधिवेशन का राजनीतिक संदेश बिलकुल साफ है। इस अधिवेशन ने मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग को चीन के आधुनिक इतिहास में 58 वर्षों के कम्युनिस्ट शासन के दो सबसे बड़े नेताओं- माओ-त्से तुंग और देंग सियाओ-पिंग की कतार में जगह दे दी है। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि अधिवेशन में देश भर से जुटे 2300 प्रतिनिधियों ने पार्टी के संविधान में संशोधन करते हुए पथ प्रदर्शक सिद्धांत के बतौर ‘एक नए युग के लिए चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद हेतु शी जिनपिंग विचार’ को शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

यह न सिर्फ राष्ट्रपति शी जिनपिंग के राजनीतिक कद और दर्जे में बढ़ोत्तरी का प्रमाण है बल्कि इससे यह भी साफ हो गया है कि चीन में उनके नेतृत्व को कोई चुनौती नहीं रह गई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि अगले पांच सालों तक ही नहीं बल्कि उसके बाद भी चीन में सत्ता की कमान शी के पास ही रहेगी। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि कम्युनिस्ट पार्टी के अधिवेशन के बाद पार्टी के सर्वोच्च और सबसे ताकतवर राजनीतिक निकाय- पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी में चुने गए नेताओं में जाहिर तौर पर ऐसा कोई नहीं है जो 2022 में उनका उत्तराधिकारी बन सकता हो या जिसे उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा हो। इन नेताओं की उम्र उनके साथ नहीं है क्योंकि वे सभी 62 से 67 साल की उम्र के हैं और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में एक अघोषित नियम यह है कि नेताओं को 68 साल की उम्र में रिटायर कर दिया जाता है।

इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2022 के बाद भी चीन के सुप्रीम नेता बने रहेंगे। यह मामूली घटना नहीं होगी क्योंकि चीन में कम्युनिस्ट शासन के इतिहास में माओ त्से तुंग और कुछ हद तक देंग सियाओ-पिंग के बाद वे पहले नेता होंगे जो पार्टी महासचिव और राष्ट्रपति के बतौर पांच-पांच साल के दो कार्यकाल के बाद भी महासचिव और राष्ट्रपति बने रह सकते हैं। असल में, चीन में माओ त्से तुंग के लम्बे और एकछत्र कार्यकाल और उस दौरान सत्ता के केंद्रीकरण के कारण पार्टी और सरकार में निहित स्वार्थी गुटों और दूसरी कई और नकारात्मक प्रवृत्तियों के पैदा होने के अप्रिय अनुभवों से सबक लेते हुए देंग सियाओ-पिंग के दौर से कम्युनिस्ट पार्टी में यह अघोषित सहमति सी बन गई कि पार्टी और सरकार चलाने के लिए ‘सामूहिक नेतृत्व’ और ‘आम सहमति’ को बढ़ावा दिया जाए और साथ ही, सामान्य परिस्थितियों में महासचिव और राष्ट्रपति को दो कार्यकाल यानी 10 साल से अधिक सरकार का नेतृत्व करने का मौका न दिया जाए।

इसी आधार पर देंग सियाओ-पिंग के कार्यकाल के बाद 1989 से पहले 10 सालों तक जियांग जमिन और फिर हू जिन-ताओ ने पार्टी और सरकार का नेतृत्व किया। इसी सहमति के तहत 2012 में पार्टी के 18वें अधिवेशन (कांग्रेस) में शी जिनपिंग ने पार्टी के महासचिव, राष्ट्रपति और चीनी सेना- पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) प्रमुख के रूप में ही सत्ता की बागडोर संभाली थी। इसमें किसी को शक नहीं था कि वे 2022 तक सत्ता में बने रहेंगे। पिछले पांच वर्षों में पार्टी और सत्ता पर उनकी लगातार मजबूत होती पकड़ से यह साफ हो गया था कि शी के नेतृत्व को कोई चुनौती नहीं है। लेकिन दुनिया भर की निगाहें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं कांग्रेस की ओर इसलिए लगी हुई थीं कि शी के राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन होंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि 19वीं कांग्रेस के बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पिछले चार दशकों में पार्टी के अन्दर पार्टी और सरकार चलाने को लेकर बनी आम सहमति से अलग रास्ते पर बढ़ चली है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के हाथों में जिस तरह से सत्ता का केंद्रीकरण हुआ है और उनकी ‘लार्जर दैन लाइफ’ छवि गढ़ी जा रही है, उससे साफ है कि एक बार फिर एक नेता के इर्द-गिर्द सत्ता के केंद्रीकरण के साथ-साथ व्यक्ति पूजा की खतरनाक और अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। हालांकि इसके लिए अकेले शी जिम्मेदार नहीं हैं। इसकी सबसे अधिक जवाबदेही खुद कम्युनिस्ट पार्टी और उसके आला नेतृत्व की है जिसने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं जिसका लाभ शी को मिला है।

चीन की राजनीति में शी जिनपिंग के इस जबरदस्त उभार के पीछे कई कारण हैं जिनमें सबसे प्रमुख हैं- पूर्व राष्ट्रपतियों जियांग जमिन और हू जिंताओ के कार्यकाल के दो-ढाई दशकों में कम्युनिस्ट पार्टी में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी और उसके खिलाफ आमलोगों में बढ़ता गुस्सा, तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद देश में बढ़ती गैर बराबरी, स्थानीय स्तर के प्रशासन में भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता और काहिली और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में क्षरण आदि। हालांकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेतृत्व को 1989 में तियेनमन स्क्वेयर पर हुए बड़े विद्रोह जैसी चुनौती तो नहीं मिली है लेकिन शिन जिनपिंग के सत्ता में आने से पहले के कुछ सालों में चीन में स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार, निकम्मेपन, असंवेदनशीलता और नौकरशाहीकरण के खिलाफ असंतोष बढ़ा है और विरोध प्रदर्शनों की संख्या में अच्छी-खासी बढ़ोत्तरी हुई है।

यह वही दौर था जब दुनिया भर में अधिनायकवादी सत्ताओं के खिलाफ अरब क्रांति और यूक्रेन में गुलाबी क्रांति जैसे विद्रोहों की हवा बह रही थी। चीनी नेतृत्व को भी सोवियत संघ के पतन और तियेनमन स्कवायर का भूत सता रहा था। उस समय चीन के राष्ट्रपति और पार्टी महासचिव हू जिंताओ को एक ढीले-ढाले, अपने में सीमित और लिबरल नेता के रूप में देखा जाता था। ऐसे समय में शी जिनपिंग ने मौके का फायदा उठाया। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार अभियान शुरू किया जिसमें पार्टी के अन्दर ‘बाघ’ (टाइगर) से लेकर ‘मक्खियों’ (फ्लाइज) यानी सर्वोच्च से लेकर स्थानीय स्तर के नेताओं और प्रशासकों को निशाना बनाया गया। इस अभियान के सबसे चर्चित शिकार बने पार्टी में शी के बराबर कद और कहीं ज्यादा चमत्कारी नेता के रूप में उभर रहे बो जिलाई जिन्हें 2012 में भ्रष्टाचार और एक अंग्रेज व्यापारी/बिचौलिया की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया और आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई।

शी की अगुवाई और उनके करीबी वांग शिशान के नेतृत्व में चले पार्टी में सफाई और इस भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के कारण शी जिनपिंग के नेतृत्व को न सिर्फ जनसमर्थन मिला बल्कि उसकी राजनीतिक वैधानिकता में भी इजाफा हुआ। उनके कई ताकतवर प्रतिद्वंद्वी इस अभियान की भेंट चढ़ गए। इसके अलावा शी ने शासन और राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टी की सर्वोच्चता को भी स्थापित करने की कोशिश की जिसके कारण पार्टी की निचली कतारों से समर्थन मिला है। शी ने चीनी राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करके खुद को पार्टी ही नहीं बल्कि पूरे देश के नेता के रूप पेश करने की कोशिश की। उन्होंने चीन की वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरने की महत्वाकांक्षा को एक मुखर आवाज देने की कोशिश की है जिसे शी और चीनी शासक वर्ग ‘चीनी स्वप्न’ के रूप में पेश करते हैं।

पार्टी की 19वीं कांग्रेस से यह तय हो गया है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और अमेरिका के बाद वैश्विक आर्थिक वृद्धि के सबसे ताकतवर इंजन की तरह देखी जाने वाले चीन की राजनीति एक नए दौर में पहुंच गई है जिसके गहरे निहितार्थ हैं। सवाल यह है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ताकत और प्रभाव में हुई इस अभूतपूर्व वृद्धि के खुद चीन, एशियाई और वैश्विक राजनीति के लिए क्या मायने हैं? इसका भारत-चीन संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?

एक बात तो साफ है कि शी के नेतृत्व में चीन ने देंग सियाओ-पिंग के कार्यकाल में बनी इस सहमति को भी किनारे कर दिया है जिसमें ‘चीन को वैश्विक मामलों में निरपेक्ष और अपने घरेलू हितों तक सीमित रहने’ पर जोर था। आज चीन न सिर्फ अपने आस-पड़ोस में बल्कि वैश्विक राजनीति में गहरी दिलचस्पी ले रहा है। असल में अमेरिका में ट्रंप के बौने नेतृत्व और यूरोप के बिखराव के कारण वैश्विक राजनीति में चीन के उभार के लिए सहज ही जगह बन गई है। आश्चर्य नहीं कि इस साल दावोस में वैश्विक पूंजी के सबसे बड़े सम्मेलन में सबके आकर्षण के केंद्र में शी जिनपिंग थे। चीन ने मौसम परिवर्तन पर पेरिस समझौते के पालन से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई घोषणाएं की हैं।

चीन की वैश्विक राजनीति में बढ़ती सक्रियता को हाल के वर्षों में राष्ट्रपति शी के नेतृत्व में दुनिया भर के देशों में बढ़ते चीनी निवेश और व्यापार के साथ-साथ राजनीतिक पैठ बनाने की कोशिशों में भी देखा जा सकता है। चीन ने अफ्रÞीकी देश-जिबूती में पहला सैन्य अड्डा बनाया है। इसके साथ ही हाल में ही जबरदस्त शोर-शराबे के साथ शुरू ‘बेल्ट एंड रोड’ पहलकदमी को भी देखा जा सकता है जिसमें चीन पुराने सिल्क रूट को बहाल करने के लिए एशिया और यूरोप के 60 देशों के बीच रोड-रेल नेटवर्क विकसित करने पर चार खरब डॉलर खर्च करने की तैयारी कर रहा है। वैश्विक राजनीति में चीन की इन पहलकदमियों को उसकी वैश्विक नेतृत्व की दावेदारी की महत्वाकांक्षाओं से जोड़कर देखा जा रहा है।

शी जिनपिंग की अगुवाई में चीन इस मौके का पूरा लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। शी की मौजूदा और भविष्य की राजनीति की झलक पार्टी के ताजा अधिवेशन में उनके साढ़े तीन घंटे के मैराथन उद्घाटन भाषण में भी मिलती है जिसमें उन्होंने चीन के ‘राष्ट्रीय कायाकल्प या पुनर्जागरण’ का आह्वान करते हुए 2020 तक देश से गरीबी का पूरी तरह उन्मूलन करने और 2040 तक देश को दुनिया में तकनीक और विज्ञान के क्षेत्र में ‘नवोन्मेष का केंद्र’ बनाने के लिए काम करने की अपील की। शी ने इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए चार बुनियादी उसूलों पर जोर दिया है: शासन में कम्युनिस्ट पार्टी की मजबूती और केंद्रीयता, सुधार, कानून आधारित शासन और पूरे देश में मध्यम स्तर की समृद्धि। शी ने वैश्विक और खासकर एशियाई राजनीति में चीन की बढ़ती भूमिका के मद्देनजर सेना के आधुनिकीकरण और उसे युद्ध लड़ने के लिए तैयार रहने के लिए भी कहा है।

साफ है कि शी जिनपिंग न सिर्फ घरेलू राजनीति में चीनी स्वप्न को बेचने में कामयाब दिख रहे हैं बल्कि इस सपने को कुछ हद तक दुनिया को भी बेचने में सफल दिख रहे हैं। हालांकि चीन के इस उभार और सक्रियता को लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह की शंकाएं, अपेक्षाएं और उम्मीदें हैं और यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीन वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार है। असल में चीन वैश्विक राजनीति में बहु-ध्रुवीयता का पक्षधर है और फिलहाल वह वैश्विक राजनीति में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा है। उसके उभार और सक्रियता ने एशिया में जापान, वियेतनाम, आस्ट्रेलिया और भारत को तथा वैश्विक स्तर पर अमेरिका और यूरोप को चौकन्ना कर दिया है जबकि अफ्रीका और लातिन अमेरिका के देशों में चीन की बढ़ती भूमिका और सक्रियता का स्वागत किया जा रहा है। रूस भी कुछ मामलों में चीन के साथ खड़ा दिख रहा है। हाल के डोकलाम विवाद से साफ है कि भारत और चीन के बीच आनेवाले दिनों में प्रतियोगिता बढ़ेगी क्योंकि चीन, भारत को अपने पड़ोस में एक उभरती हुई आर्थिक और सैनिक ताकत के रूप में देख रहा है जिसके पीछे खुले-छिपे अमेरिका, जापान और नाटो देश खड़े हैं। उसे लगता है कि अमेरिका, जापान और नाटो देश भारत के जरिये उसे घेरने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन चीन यह देखने को तैयार नहीं है कि खुद उसकी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएं उसके पड़ोसी देशों में कई तरह की शंकाएं पैदा कर रही हैं। वह जिस तरह से अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है और सिक्किम के विलय पर सवाल खड़े करता है, उससे भारत में भी उसके इरादों को लेकर गहरी शंकाएं हैं।

लेकिन इसके बावजूद दोनों देश जानते हैं कि उनके आर्थिक-व्यापारिक सम्बन्ध एक-दूसरे से इतने गहरे जुड़े हैं और दोनों देश इतनी बड़ी सैन्य ताकत हैं कि सीधा टकराव उनके हित में नहीं है। इसलिए दोनों देशों में गाहे-बगाहे टकराव के साथ मुख्य रूप से आर्थिक प्रतियोगिता और सहयोग के जारी रहने के आसार ज्यादा हैं।

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