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यह कैसा समाज है !

प्रदीप सिंह/प्रधान संपादक/ओपिनियन पोस्ट

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को बलात्कार के आरोप में सजा हो गई। पैसा, सत्ता, लाखों अनुयायियों की फौज और राजनीतिक रसूखवालों से करीबी भी उन्हें कानून के फंदे से बचा नहीं सकी। इस फैसले से एक बार फिर साबित होता है कि अपने देश की न्याय व्यवस्था में देर है अंधेर नहीं। पिछले कुछ सालों में अदालतों, जांच एजेंसियों और कभी कभी सरकारों (अनिच्छा से ही सही) ने यह साबित किया है कि रसूख वालों के खिलाफ कार्रवाई में उनके हाथ पांव नहीं फूलते। यह देश की न्यायिक व्यवस्था में भरोसा जगाने वाली घटना है। पर इस सबका सबसे ज्यादा श्रेय उन युवतियों को जाता है जिन्होंने इस कथित भगवान से लड़ने का साहस दिखाया और विपरीत परिस्थितियों में भी झुकी नहीं। यहां पत्रकार राम चंदर छत्रपति को भी याद करना मौजूं होगा, जिन्होंने इस कुकृत्य के रहस्योद्घाटन की खबर की कीमत अपनी जान से चुकाई। वरना इस बलात्कारी का कारोबार यों ही चलता रहता। यह घटना इस बात को एक बार फिर रेखांकित करती है कि राजनीतिक दल वोट के लिए किसी से भी समर्थन ले सकते हैं। राम रहीम अलग अलग समय पर अलग अलग राजनीतिक दलों को समर्थन देता रहा है। या यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि पार्टियां समर्थन के लिए उसके दरवाजे पर नतमस्तक मुद्रा में पेश होती रही हैं। राम रहीम ऐसा अकेला नहीं है। उसके ऐसे दो साथी आसाराम और रामपाल पहले से ही जेल में हैं। इन सबको यह मुगालता था कि उनके चेले और चुनाव में उनका समर्थन मांगने वाले उसे बचा लेंगे। ऐसे ढोंगी बाबा धर्म की आड़ में अपराध और सेक्स का कारोबार चलाते हैं। लेकिन इनकी असली ढाल सत्तारूढ़ दल के नेता ही बनते हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस पार्टी की सरकार है। क्योंकि वोट तो सबको चाहिए। हरियाणा और पंजाब के सभी दलों के नेता चुनाव से पहले राम रहीम के यहां मत्था टेकने पहुंचते हैं। उसके बाद वह अपने समर्थकों के नाम किसी एक पार्टी के समर्थन में अपील जारी करता है।

पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका, सरकार और राजनीतिक दलों की भूमिका को थोड़ी देर के लिए नजरअंदाज कर दें तो भी स्थिति बड़ी भयावह नजर आती है। जरा सोचिए कि हमने किस तरह के समाज का निर्माण किया है। जहां नाबालिग लड़कियों से बलात्कार करने वाले को अदालत सजा सुनाती है तो उसके विरोध में हजारों हजार लोग मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे लोगों में पढ़े लिखे अनपढ़, बूढ़े, जवान और महिलाएं सब शामिल हैं। इन लोगों की नजर में एक बलात्कारी के प्रति ऐसा समर्पण का भाव क्यों है। राम रहीम इस मामले में अकेला नहीं है। आसाराम और रामपाल के समर्थकों का खूनी खेल हम देख चुके हैं। हमें आत्ममंथन करने की जरूरत है कि जब दुनिया विज्ञान को अधिकाधिक अपना रही है तो ऐसे में हमारी युवा पीढ़ी भी इन कुकर्मी बाबाओं के प्रभाव में क्यों आ रही है। ये सब हथियार बंद अपराधी गिरोहों से किसी मामले में कम नहीं हैं। राजनीतिक दल तो इनके पास वोट के लिए जाते हैं। आम आदमी किसलिए जाता है। उससे भी बड़ी बात यह कि इनके अपराध उजागर होने और अदालत से सजा मिलने के बाद भी लोगों की आंख क्यों नहीं खुलती। सोशल मीडिया पर किसी ने ठीक ही कहा कि बलात्कारी पकड़ा न जाए तो लोग मोमबत्तियां जलाते हैं और पकड़ लिया जाय तो शहर। ऐसे लोगों के मन में आखिर क्या चलता है? उन्हें पता है कि अदालत के फैसले के बाद राम रहीम को कोई बचा नहीं सकता। फिर हिंसा के जरिये वे क्या कहना चाहते हैं, क्या बदलना चाहते हैं और किसे संदेश देना चाहते हैं?

सवाल तो राजनीतिक दलों से भी होना चाहिए। जो भी चुनावी राजनीति में है उसके लिए हर वोट अहम होता है। समर्थन के लिए राजनीतिक दल और उसके प्रतिनिधि सबके पास जायं इसमें भी कोई हर्ज नहीं है। पर वोट के लिए क्या अपराधियों, व्यभिचारियों का रक्षा कवच बनना जरूरी है। आखिर आसाराम और रामपाल के जेल जाने के बाद उन दोनों ने किस पार्टी या उम्मीदवार को हरा दिया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने राम रहीम के समर्थन के चक्कर में उसके समर्थकों से नरमी बरती। उसके समर्थकों को पंचकुला में लाखों की संख्या में इकट्ठा होने दिया। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट को कहना पड़ा कि वोट के चक्कर में खट्टर सरकार ने पंचकुला को जलने दिया। राम रहीम की पंचकुला की सीबीआई अदालत में पेशी से उसे दोषी करार दिए जाने के बाद तक सरकार की ओर से जो चूक हुई उसके लिए सरकार के अलावा किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी और 31 लोगों की जान गई। भाजपा हाईकमान के रुख से लगता है कि मुख्यमंत्री खट्टर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। पार्टी का फैसला जो भी हो आम लोगों की नजर में खट्टर सरकार एक कमजोर और अक्षम सरकार है। यह पहला मौका नहीं है जब सरकार इस तरह के संकट से निपटने में नाकाम रही है। राजनीति में लोकधारणा सबसे अहम होती है। इस समय लोक मानस मुख्यमंत्री खट्टर के खिलाफ है।

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ओपिनियन पोस्ट एक राष्ट्रीय पत्रिका है जिसका उद्देश्य सही और सबकी खबर देना है। राजनीति घटनाओं की विश्वसनीय कवरेज हमारी विशेषज्ञता है। हमारी कोशिश लोगों तक पहुंचने और उन्हें खबरें पहुंचाने की है। इसीलिए हमारा प्रयास जमीन से जुड़ी पत्रकारिता करना है। जीवंत और भरोसमंद रिपोर्टिंग हमारी विशेषता है।
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