न्यूज फ्लैश

हमारे अहसास ही हमारी असली पहचान

हम खामियों का जिक्र करें क्योंकि सुधार के लिए कमियां जानना जरूरी है। सबसे बड़ी कमी यह है कि एक कमेटी बनेगी जो तय करेगी कि ट्रांसजेंडर का दावा करने वाला व्यक्ति ट्रांसजेंडर है या नहीं। इसमें मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता होंगे। यानी फिर वही सवालों और जांच का सिलसिला शुरू होगा जिससे अकसर ट्रांसजेंडर्स, लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल को गुजरना पड़ता है।

नाज फाउंडेशन में ट्रांसजेंडर मुद्दों पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता किरण ने ट्रांसजेंडर्स के लिए पेश हुए विधेयक को लेकर ओपिनियन पोस्ट से बातचीत की।

लोकसभा में पेश ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन एंड राइट) विधेयक, 2016 से आपको कितनी उम्मीद है, क्या वाकई अब ट्रांसजेंडर्स समुदाय के अच्छे दिन आएंगे?
इसमें कई अच्छाइयां हैं मगर पहले हम खामियों का जिक्र करें क्योंकि सुधार के लिए कमियां जानना जरूरी है। सबसे बड़ी कमी यह है कि एक कमेटी बनेगी जो तय करेगी कि ट्रांसजेंडर का दावा करने वाला व्यक्ति ट्रांसजेंडर है या नहीं। इसमें मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता होंगे। यानी फिर वही सवालों और जांच का सिलसिला शुरू होगा जिससे अकसर ट्रांसजेंडर्स, लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल को गुजरना पड़ता है। जबकि अगर कोई कह रहा है कि वह जन्मजात जेंडर से अलग अहसास रखता है तो उसके अहसास को तवज्जो देनी चाहिए। दिक्कत यह है कि लाखों में एक व्यक्ति जन्म से ट्रांसजेंडर होता है। ज्यादातर तो अहसास के आधार पर खुद को अपने जन्मजात जेंडर से अलग महसूस करते हैं। उन्हें तो आप फिर उन्हीं सवालों और जांच के दायरे में धकेल देंगे जिनसे वह जूझते आ रहे हैं।

विधेयक में ट्रांसजेंडर्स के लिए दी गई परिभाषा को स्पष्ट करने की जरूरत है। ट्रांसजेंडर्स को एक खांचे में बंद नहीं कर सकते हैं। कोई जन्मजात पुरुष है मगर वह औरतों के अहसास के साथ खुद को सहज महसूस करता है तो वह औरत ही हुआ न। कोई औरत जो पुरुष जैसा महसूस करती है वह अपनी पहचान पुरुष ही चाहती है। हां जो औरत और पुरुष दोनों से अलग अपने आपको महसूस करते हैं तो वह उस पहचान के साथ रह सकते हैं। विधेयक में ट्रांसजेंडर की परिभाषा लंबे समय से समाज में चली आ रही सोच को ही दर्शाती है। वह भी ट्रांसजेंडर को पुराने फ्रेमवर्क से अलग नहीं कर पाए।

दूसरी बड़ी कमी यह है कि इसमें यूनिवर्सिटी स्तर पर शिक्षा में आरक्षण देने की बात कही गई है। लेकिन स्कूल स्तर पर प्रयास किए बिना हम कैसे यूनिवर्सिटी स्तर पर शिक्षा का सपना पूरा कर पाएंगे। ज्यादातर तो स्कूल में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसके लिए जरूरी है कि टीचर्स को जेंडर समझ की ट्रेनिंग दी जाए। मां-बाप की काउंसलिंग हो। स्कूल में कुछ ऐसे कार्यक्रम किए जाएं जिनसे दूसरे बच्चों में भी जेंडर को लेकर समझ बने। घर में जन्मजात जेंडर के साथ जीने का दबाव और स्कूल में टीचर्स और बच्चों के द्वारा होने वाले भेदभाव व हिंसा के चलते ट्रांसजेंडर बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कम से कम एक कदम हम आगे तो बढ़े। सरकार को सुध तो आई कि हम भी उनकी जनता हैं। विधेयक में सबसे अच्छा प्रावधान यह है कि अस्पतालों में ट्रांसजेंडर्स के चेकअप के लिए अलग केबिन होगा, उन्हें यूनिवर्सिटी स्तर पर आरक्षण मिलेगा।

क्या धारा 377 के साथ इस विधेयक में कहीं उलझाव है?
सीधा उलझाव है। 377 में समान जेंडर की शादी को अपराध माना गया है। दूसरी तरफ जब ट्रांसजेंडर जन्मजात जेंडर से अलग अपनी पहचान के साथ समाज में जी रहा है, वह अगर अपने जन्मजात जेंडर वाले व्यक्ति से शादी करेगा तो क्या उसे मान्यता मिलेगी? इस पर एक लंबी बहस करने की जरूरत है।

क्या आपको लगता है कि ट्रांसजेंडर को विधेयक में जो अधिकार मिले हैं, वह जमीनी स्तर पर लागू हो पाएंगे?
हर क्षेत्र में ट्रांसजेंडर का प्रतिनिधित्व बढ़े ताकि उनके बारे में जो गलतफहमियां लोगों में है वह दूर हो। लोग उनके साथ सहज महसूस करें। उनके साथ रहना सीखें। जिनको मौका मिला या जिन्होंने संघर्ष किया वह आज बहुत आगे हैं। ट्रांसजेंडर्स सब कुछ कर सकते हैं। बस उन्हें बराबरी का दर्जा देने की जरूरत है। समाज के स्थापित जेंडर्स के साथ उनकी दूरी खत्म करने के प्रयास करने जरूरी हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अभी तय किया है कि वह ट्रांसजेंडर्स को मेंटल डिसआर्डर की श्रेणी से हटा देगा। इससे कोई फायदा होगा?
देखिए, मुझे तो पता है कि जेंडर ट्रांसजेंडर्स को पहले ही मेंटल डिसआर्डर की श्रेणी से हटा दिया गया है। हो सकता है वह किसी और जगह से हटाया गया हो लेकिन मुझे लगता है कि यह कदम देरी से उठाया गया। यह तो बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। जब ट्रांसजेंडर्स के ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जो अलग अलग क्षेत्रों में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं तो फिर यह मेंटल डिसआर्डर कैसे हुआ? लेकिन चलो जब सकारात्मक कदम उठे तभी ठीक।

नाज फाउंडेशन में कई लोग काउंसलिंग के लिए आते हैं। किस तरह की समस्याओं का वे सबसे ज्यादा जिक्र करते हैं?
सबसे ज्यादा शादी का दबाव होता है। यह दबाव होता है जन्मजात जेंडर के मुताबिक शादी करने का। इसके अलावा पहनावा-ओढ़ावा, समाज में रहने का ढंग समेत कई दबाव होते हैं। कई ऐसे किशोर आते हैं जो अपनी यौनिकता अपने घर वालों के सामने जाहिर करने से घबराते हैं। हैरानी वाली बात यह है कि ऐसे बहुत बच्चे हमारे पास आते हैं जिनके मां-बाप डॉक्टर-इंजीनियर जैसे पेशों से जुड़े हैं। ये लोग अपने बच्चों पर हिंसा करते हैं, उनके अहसासों को दबाते हैं। एक केस हमारे पास आया था जिसमें एक ट्रांसजेंडर बच्चे को असमान्य मानकर मां-बाप डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने उसे इलेक्ट्रिक शॉक दिए। ऐसे न जाने कितने केस हैं जिसमें ट्रीटमेंट के नाम पर अजीबो गरीब सवाल डॉक्टर पूछते हैं।

आप खुद भी ट्रांसजेंडर हैं। आपको किन समस्याओं से जूझना पड़ा?
मैंने कभी महसूस ही नहीं किया कि मैं लड़का हूं। बस जन्मजात पहचान जरूर अलग थी। मेरे घर, समाज ने मुझे जन्मजात पहचान के आधार पर कुबूला था मगर मैं खुद को उस पहचान के साथ कुबूल नहीं थी। लड़कियों जैसा दिखना, उनके जैसा पहनना, उनकी तरह सजना सब मेरे शौक थे। लेकिन मेरे अहसास से बेखबर मेरे मां-बाप को डर था तो समाज का। ऐसा नहीं था कि उन्हें समझ नहीं आता था मगर वे अड़े थे मुझे झुठलाने में। मेरा भाई मेरा मजाक उड़ाता था। मेरा एक भाई और तीन बहनें हैं। मेरे पिता सरकारी कर्मचारी थे। मां-बाप के लिए मैं चिंता का सबब थी तो भाई-बहनों के लिए अजीब थी। वह मुझसे अच्छा बरताव नहीं करते थे। मैं लगातार खुद को पुरुष के शरीर में कैद महसूस करती घुट रही थी। मेरे इस अहसास के चलते मुझे कई बार पीटा गया। मैं जैसे-जैसे बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे यह अहसास भी बढ़ रहा था। किशोरावस्था में जैसे एक विपरीत लिंग की तरफ आकर्षण होता है वैसा आकर्षण मुझे भी हुआ। मेरे भीतर तो अहसास लड़की के ही थे। किशोरावस्था में मुझे भी प्रेम हुआ, एक लड़के से। मैं चिट्ठियां लिखती, वह भी चिट्ठी लिखता लेकिन एक दिन मेरी मां के हाथ वह चिट्ठियां लग गई फिर तो खूब पिटाई हुई। मेरा उससे बात करना कम हो गया। मुझ पर दबाव था कि मैं लड़कों के साथ रहूं, उनके जैसा खेलूं, पहनूं। मैंने बारहवीं तक घर में रहकर पढ़ाई की। लेकिन 18 साल की उम्र में घर छोड़ दिया। अपनी एक सहेली के पास चली गई। मैंने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन दिया। वहां से मुझे फोन आता और मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता लेकिन जैसे ही वे मेरा पहनावा-ओढ़ावा देखते, फौरन रिजेक्ट कर देते। थक-हार कर मैं पैंट शर्ट पहन कर इंटरव्यू देने गई। मुझे एक नौकरी मिल गई, रिसेप्शनिस्ट की। मैंने बहुत अच्छा काम किया। मगर कुछ दिन बाद मुझे यह कहते हुए निकाल दिया गया कि स्टाफ के दूसरे लोग मेरे बारे में अजीब अजीब बातें करते हैं। उन्हें मैं सामान्य नहीं लगती। मेरे हाव-भाव उन्हें ठीक नहीं लगते। मेरे काम पर भारी पड़ी मेरी अहसास जनित पहचान।

ऐसा ही मेरे साथ स्कूल में भी हुआ था। मैं पढ़ना चाहती थी। पढ़ने में खूब अच्छी थी लेकिन टीचर्स का रवैया और साथ के बच्चों के रवैये ने मुझे स्कूल छोड़ने पर मजूबर कर दिया। वह तो न जाने कहां से मैं यहां पहुंच गई और अब लगता है कि मैं सफलता की तरफ बढ़ रही हूं। मैं जल्द ही एक फिल्म में दिखूंगी। हालांकि रोल छोटा है। मैं उसमें ट्रांसजेंडर ही हूं। श्रीदेवी के साथ काम कर रही हूं। उस फिल्म का नाम है मॉम। मैं श्रीदेवी की स्टाफ बनी हूं। इस फिल्म में एक और हैं जो ट्रांसजेंडर हैं। वह भी स्टाफ मेंबर हैं। इससे पहले एक अंतरराष्ट्रीय मैग्जीन लॉ आॅफिसियल में मेरी फोटो के साथ मेरा इंटरव्यू भी छपा। मैंने इस मैग्जीन के लिए मॉडलिंग भी की। मैं चाहती हूं कि कुछ और फिल्मों में काम करूं, मॉडलिंग का मौका मिला तो वह भी करूंगी।

The following two tabs change content below.
ओपिनियन पोस्ट

ओपिनियन पोस्ट

ओपिनियन पोस्ट एक राष्ट्रीय पत्रिका है जिसका उद्देश्य सही और सबकी खबर देना है। राजनीति घटनाओं की विश्वसनीय कवरेज हमारी विशेषज्ञता है। हमारी कोशिश लोगों तक पहुंचने और उन्हें खबरें पहुंचाने की है। इसीलिए हमारा प्रयास जमीन से जुड़ी पत्रकारिता करना है। जीवंत और भरोसमंद रिपोर्टिंग हमारी विशेषता है।
ओपिनियन पोस्ट
About ओपिनियन पोस्ट (4594 Articles)
ओपिनियन पोस्ट एक राष्ट्रीय पत्रिका है जिसका उद्देश्य सही और सबकी खबर देना है। राजनीति घटनाओं की विश्वसनीय कवरेज हमारी विशेषज्ञता है। हमारी कोशिश लोगों तक पहुंचने और उन्हें खबरें पहुंचाने की है। इसीलिए हमारा प्रयास जमीन से जुड़ी पत्रकारिता करना है। जीवंत और भरोसमंद रिपोर्टिंग हमारी विशेषता है।

Leave a comment

Your email address will not be published.


*