वीरप्पन के बाद भी बचे हैं कई ‘वीरप्पन’

ओपिनियन पोस्ट
Fri, 18 Sep, 2015 14:46 PM IST

मनोरमा/ बेंगलुरू

इसी साल अप्रैल के आखिर में आन्ध्र प्रदेश के सेशाचलम की पहाड़ियों में रेड सेंडर्स एंटी स्मगलिंग टास्क फोर्स और आन्ध्र प्रदेश पुलिस ने एक संयुक्त अभियान में  चंदन के 20 तथाकथित तस्करों को मुठभेड़ में मार गिराया। इस घटना ने एक ओर आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु के बीच राजनीतिक तल्खी के हालात पैदा किए तो दूसरी ओर पूरे देश का ध्यान चंदन की तस्करी के मामलों की गंभीरता की ओर भी खींचा। हकीकत यह है कि सिर्फ आन्ध्र नहीं बल्कि कर्नाटक खासतौर पर उसकी राजधानी बंगलुरूमें पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे से आए दिन चंदन के पेड़ चोरी हो जाते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता।

हर जगह चोरी

पहले एक वीरप्पन का खौफ था जो जंगलों में रहता था। कर्नाटक में अब दर्जनों वीरप्प्न हैं जो रात के अंधेरे में बीच शहर में कहीं से भी चंदन के पेड़ चुरा ले जाते हैं। पुलिस स्टेशन का अहाता, सरकारी संस्थान या फिर  विधानसभा और उच्च न्यायालय परिसर जैसे अति सुरक्षित इलाके, चंदन के पेड़ कहीं सुरक्षित नहीं। बंगलूरू में मार्च की शुरुआत में नेशनल लॉ स्कूल आफ इंडिया और परमाणु उर्जा विभाग परिसर से तीन दिन के भीतर 30 पेड़ काट डाले गए। हालांकि तस्कर तीस में से एक ही पेड़ को ले जाने में सफल हो पाए। फिर मार्च के आखिरी हफ्ते में इंस्टीट्यूट ऑफ वुड साइंसेज एंड टेकनॉलाजी के अहाते से चंदन का एक पेड़ चोरी चला गया, जबकि उस समय अहाते में छह सुरक्षाकर्मी तैनात थे। इससे पहले 2011 में भी यहां से चंदन के पांच पेड़ चोरी कर लिए गए थे। 2011 में ही भारतीय खेल प्राधिकरण के परिसर के पास से 25 चंदन के पेड़ चुरा लिए गए थे। जबकि इंस्टीट्यूट ऑफ वुड साइंसेज एंड टेकनॉलाजी, अरण्य भवन और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस उच्च सुरक्षा जोन में स्थित है और यहां पेड़ों से जुड़े अनुसंधान  होते हैं। पिछले चार-पांच सालों में बेंगलुरू के सार्वजनिक स्थलों पर मौजूद चंदन के लगभग सभी पुराने पेड़ चोरी हो चुके हैं।

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तस्करों को जैसे ही किसी 12 से 15 साल पुराने पेड़ का पता चलता है तो उसे चोरी होते देर नहीं लगती। 2011 में ही विधानसभा और हाईकोर्ट के सामने कब्बन पार्क से सार्वजनिक स्थल पर मौजूद शहर के इकलौते पुराने पेड़ को भी काट लिया गया, जबकि वहां एक सशस्त्र सुरक्षाकर्मी हमेशा तैनात रहता था। एक दशक पहले तक बंगलुरू में 97 बड़़े और पुराने चंदन के पेड़ हुआ करते थे जिसमें 21 कब्बन पार्क में थे। इसी तरह़ सीवी रमण नगर इलाके के एक घर के अहाते से बंदूक दिखाकर दो पेड़ काट लिए गए। दरअसल, कर्नाटक के कुल भूभाग का 20 फीसदी जंगल है, जिसमें 10 फीसदी से ज्यादा चंदन के वन हुआ करते थे जो अब घटकर 5 प्रतिशत से भी कम रह गए हैं। हालांकि राज्य के वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक के कुल 36,999 वर्ग किलोमीटर में फैले जंगलों में चंदन के वन का विस्तार 5000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में है। हकीकत यह है कि बेंगलुरु क्या, पूरे कर्नाटक में प्राकृतिक चंदन का कोई पुराना या परिपक्व पेड़ नहीं बचा है।

तीन मिनट में पेड़ धाराशायी

बहरहाल, वीरप्पन को खत्म हुए दस साल से ज्यादा हो चुके हैं लेकिल बेंगलुरू के ये नए वीरप्पन आधुनिक मशीनों और ट्रक के साथ आते हैं और चंदन के पेड़ को महज तीन मिनट में काट लेते हैं। फिर आधे-एक घंटे से भी कम समय में उसके छोटे टुकड़े कर ट्रक में लाद नौ दो ग्यारह हो जाते हैं या 1100 एकड़ में फैले बेंगलुरू विश्वविद्यालय जैसा विशाल परिसर होने पर पेड़ों को काटने के बाद वहीं सूखने छोड़ देते हैं। कभी-कभी उन्हें आधा काटकर छोड़ दिया जाता है, ताकि बाद में वो सूखकर खुद गिर जाएं। फिर कैंपस में लकड़ी चुनने वालों की मदद से वे उन्हें बाहर निकलवा लेते हैं। तस्करी अक्सर रात, खासकर बारिश वाली रात में की जाती है ताकि काटने की आवाज दब जाए और कोई बाहर देखने निकले नहीं। स्थानीय अपराधियों या आसपास के लोगों को साथ मिला लेने से काटने के बाद पेड़ को आसपास छिपाने का विकल्प होता है। फिर पुलिस में निचले स्तर पर सेटिंग के कारण बगैर चेकिंग के माल बंगलुरू से बाहर निकल जाता है। वैसे बहुत अरसा बाद इस साल जून में पुलिस को एक बड़ी सफलता मिली जब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस परिसर और सैंकी लेक के नजदीक से चंदन के पेड़ चुराने वाले तस्कर इमदादुल्ला को गिरफ्तार किया गया और उसके पास से बीस लाख की कीमत की चंदन की लकड़ियां बरामद की गर्इं।

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बेंगलुरू दक्षिण-पूर्व पुलिस उपायुक्त रोहिणी काटोच सेपट कहती हैं कि चंदन के पेड़ों की तस्करी पुराने और स्थानीय गैग द्वारा की जाती है।  जहां से चोरी की जाती है, वहां अक्सर उनकी पहले से पैठ होती है। पिछले साल मल्लेश्वरम में पुलिस ने मौका-ए-वारदात पर चंदन के दो तस्करों को मार गिराया था। रोहिणी कहती हैं उनके अधिकार क्षेत्र में अब सार्वजनिक स्थल पर  चंदन का कोई पेड़ नहीं बचा है। कुछ सरकारी संस्थानों के परिसर में गिनती के पेड़ हैं और सात-आठ पेड़ निजी संपत्ति हैं। इनकी सुरक्षा का इंतजाम लोग और संस्थान अपने स्तर पर करते हैं। पुलिस किसी की व्यक्तिगत संपत्ति की सुरक्षा मांगने पर ही कर सकती है। फिर भी ये सभी पुलिस की निगरानी और पेट्रोलिंग के दायरे में हैं। पिछले साल अगस्त में ही मंगलोर पोर्ट पर बंगलुरू की एक कंपनी के माल में से लगभग सात करोड़ मूल्य की लाल चंदन की लकड़ियां जब्त की गई थीं। कर्नाटक पुलिस की ओर से एनएच 4 पर खास निगरानी रखी जाती है। यह सड़क महाराष्ट्र से शुरू होकर कर्नाटक, आन्ध्र होते हुए तमिलनाडु में चेन्नई तक जाती है।

चंदन की लकड़ियों, खासतौर पर लाल चंदन की लकड़ियों को इसी सड़क के मार्फत मंगलोर या पश्चिमी तट पर स्थित बेलेकरी, होन्नावर, भटकल या कुंडापूरा जैसे किसी पोर्ट से अवैध रूप से विदेशों में भेज दिया जाता है। राज्य के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक बी जे होस्मेट कहते हैं, वीरप्पन के समय में वो जिस इलाके में होता था, वहां छोड़कर  बाकी इलाकों में कम वारदातें होती थीं। अब पूरे राज्य में कई छोटे-छोटे तस्कर हैं जो कहीं भी कभी भी मौका देखकर तस्करी करते हैं। इनमें पेशेवर के साथ ग्रामीण बेरोजगार युवक भी शामिल हो जाते हैं। अब तो कोई विशेष टास्क फोर्स भी नहीं है।

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कर्नाटक के लिए महत्वपूर्ण क्यों चंदन

चंदन कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान और राजकीय वृ़क्ष है। लाखों लोगों की रोजी-रोटी, इससे जुड़े कारोबार से चलती है। अगरबत्ती, साबुन, टेल्कम पाउडर, परफ्यूम और दवाइयों के अलावा चंदन की लकड़ी की कलाकृतियां बनाने का काम भी यहां बड़े पैमाने पर होता है। देश का 70 प्रतिशत चंदन कर्नाटक ही मुहैया कराता रहा है। लेकिन तस्करी से आपूर्ति धीरे-धीरे कम होती गयी। इसकी बड़ी वजह 1792 में टीपू सुल्तान के द्वारा चंदन को शाही पेड़ का दर्जा दे दिया जाना था, जिसके कारण लोग चंदन के पेड़ अपने घरों या खेतों में नहीं लगा सकते थे। कर्नाटक सरकार ने बाद में भी चंदन को सरकारी नियंत्रण में रखा जिसका नतीजा यह हुआ कि 1960 तक 4000 टन सालाना चंदन उत्पादन कर दुनिया में पहले स्थान पर रहने वाला भारत अब महज 400 टन चंदन उत्पादित कर पाता है। कर्नाटक सरकार ने 2009 में चंदन को राज्य के नियंत्रण से मुक्त कर दिया। अब यहां कोई भी चंदन उगा सकता है और अपने पेड़ काट भी सकता है।

दरअसल, एक टन भारतीय चंदन की लकड़ी की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 45 लाख रुपये से भी ज्यादा है। एक लीटर चंदन के तेल की कीमत सवा लाख से उपर है और एक एकड़ में चंदन लगाने पर 12 से 15 साल में बीस लाख खर्च कर ढाई करोड़ से ऊपर मुनाफा कमाया जा सकता है। यही वजह है कि निजी क्षेत्र की कई कंपनियां चंदन के प्लानटेशन में उतर चुकी हैं।

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