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यूपी : मुसलिम वोटर का फंडा तो सीधा है यार!

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हलचलों और उनके लिए भूमिका बनाने वाले सामाजशास्त्रीय प्रभावों की जमीन का चार दशकों से अध्ययन करते आए राजनीतिक विश्लेषकों रतन मणि लाल, दिलीप अवस्थी और ज्ञानेन्द्र शर्मा से ओपिनियन पोस्ट से बातचीत

अजय विद्युत

उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि मुसलमान मतदाताओं का रुख सपा-कांग्रेस गठबंधन और दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी दोनों ही के लिए प्राणवायु है। इस चुनाव में मुसलमान वोटरों की पौ बारह है। इस बार उन्हें जितनी अहमियत दी जा रही है उतनी पहले कभी नहीं दी गई। सपा ने वादों की झड़ी लगा दी है तो बसपा ने बम्पर मात्रा में मुसलिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।

सपा को कुछ मुसलिम वोट मिलेंगे, पर कांग्रेस को नहीं

रतन मणि लाल

रतन मणि लाल

चालीस वर्षोँ से मीडिया में सक्रिय और लखनऊ में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ व ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक रहे स्तंभकार रतन मणि लाल बताते हैं, ‘मुस्लिम वोट बैंक की बात करें तो अगर अगर सपा और कांग्रेस के नाम पर खिंच कर आता है तो वह आ जाएगा। हालांकि इसकी संभावना अभी कम है।’ ऐसा क्यों? यह पूछने पर वह जवाब देते हैं, ‘क्योंकि ऐसा माहौल बन गया है कि मुस्लिम बसपा के साथ हैं। तो उनका एक बहुत छोटा हिस्सा ही सपा के साथ बना है और बना रहेगा। और वह कांग्रेस की तरफ भी नहीं जाएगा।

सपा-कांग्रेस गठबंधन उन्हें सूट करेगा

दिलीप अवस्थी

दिलीप अवस्थी

उत्तर प्रदेश में मुसलमान वोटरों को समाजवादी पार्टी का समर्थक माना जाता रहा है। उसके कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से क्या उनके रुख में कुछ बदलाव हो सकता है? इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया, जी न्यूज और दैनिक जागरण में बड़े पदों पर रहे और अड़तीस वर्षोँ से प्रदेश के राजनीतिक तापमान के साक्षी रहे दिलीप अवस्थी बताते हैं, ‘सपा-कांग्रेस अलायंस की बात करें तो सपा के लिए यह एक साइकोलॉजिकल बूस्ट हो सकता है कि एक नेशनल पार्टी उनके साथ है। हालांकि बड़ा नाम होने के बावजूद कांग्रेस की हैसियत कुछ नहीं है। तो खुद को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाने के लिए कांग्रेस का साथ सपा को मनोवैज्ञानिक रूप से बल दे सकता है।’

क्या मुसलिम वोट बैंक गठबंधन के साथ रहेगा? इस पर अवस्थी कहते हैं, ‘सपा का जो मुसलिम वोट बैंक है उसे भी कुछ कुछ आश्वासन मिलता है कि कांग्रेस भी मुसलिम समर्थक है और सपा भी। तो यह गठबंधन मुसलिम समाज को सूट कर सकता है। मुसलमानों को मायावती के साथ समस्या यह है कि उनको जरा सा भी मौका मिलेगा तो वह बीजेपी से मिल जाएंगी। ऐसा तीन बार हो ही चुका है इसलिए चौथी बार भी हो सकता है। मुसलिम के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण चुनाव इसलिए भी है कि दिल्ली में मोदी को तो जैसे तैसे स्वीकार कर लिया लेकिन यूपी में तो मोदी उन्हें किसी कीमत मंजूर नहीं है। ऐसे में वे नहीं चाहेंगे कि उनका वोट बेकार जाए। हालांकि अहमद बुखारी ने मायावती के लिए अपील की है लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है कि उनकी अपील का मुसलमानों पर उल्टा असर होता है। मुसलिम को यह भरोसा दिलाना कि बसपा आगे बीजेपी से नहीं मिलेगी बहुत कठिन है। मायावती अकेले दम पर यूपी में सरकार बना लेंगी इसके तो दूर दूर तक कोई लक्षण नहीं हैं।’

जो भाजपा को हराए वे उनके साथ

ज्ञानेन्द्र शर्मा

ज्ञानेन्द्र शर्मा

उत्तर प्रदेश में तो पिछले कई चुनावों से मुसलिम वोटरों का फंडा सीधा है- भाजपा हराओ। जिसमें उन्हें यह भरोसा दिखता है वे उसका साथ देते हैं। इस बार वे किसमें यह दम देख रहे हैं? उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त और चालीस से ज्यादा वर्षोँ से पत्रकारिता में सक्रिय ज्ञानेन्द्र शर्मा का मानना है, ‘यूपी में मुसलमान पूरी तरह सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ हैं। मुसलमानों का एक बड़ा तबका पहले से चाहता था कि सपा और कांग्रेस साथ आएं ताकि भाजपा के खिलाफ लड़ाई मजबूती से लड़ी जा सके।’ बसपा को समर्थन की अपीलों के बारे में वह कहते हैं, ‘अब शाही इमाम जैसे लोग और कुछ मुस्लिम संगठन चाहे कुछ भी कह लें, उनकी कोई सुनता तो है नहीं। मुसलमान कभी बसपा के साथ नहीं जाने वाले।’ शर्मा साफ कहते हैं, ‘मुसलिम वोटर का एक ही सूत्र है- भाजपा हराओ। इसीलिए मुसलिम वोटर टैक्टिकल वोटिंग करता है। जो भी भाजपा को हराने में उसे सक्षम दिखता है वो उनका फेवरेट होता है। उसको वोट दे आता है। तो बसपा के मुकाबले सपा-कांग्रेस गठबंधन मुसलिमों का ज्यादा फेवरेट है।’

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