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तीन तलाक अध्यादेश को मंजूरी  

छह महीने में पास कराना होगा बिल, कांग्रेस बोली-ये वोट पॉलिटिक्स

ओपिनियन पोस्‍ट।

कैबिनेट की बैठक में बुधवार को तीन तलाक अध्यादेश को मंजूरी दे दी गई, लेकिन कांग्रेस ने इसे वोट पॉलिटिक्‍स करार दिया है। लोकसभा से पारित होने के बाद तीन तलाक विधेयक राज्यसभा में अटक गया था। केंद्र की मोदी सरकार ने इसे लागू कराने के लिए अध्यादेश का रास्ता अपनाया है।

अध्यादेश 6 महीने तक लागू रहेगा। उसके बाद विधेयक को विधिवत संसद से पास कराना होगा। सरकार के पास बिल को शीत सत्र तक पास कराने का वक्त है। इस बिल के तहत तुरंत तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को अपराध की श्रेणी में रखा गया।

अपनी पत्नी को एक बार में तीन तलाक बोलकर तलाक देने वाले मुस्लिम पुरुष को तीन साल की जेल की सजा हो सकती है। इस बिल में मुस्लिम महिला को भत्ते और बच्चों की परवरिश के लिए खर्च को लेकर भी प्रावधान है। इसके तहत मौखिक,  टेलिफोनिक या लिखित किसी भी रूप में एक बार में तीन तलाक को गैर-कानूनी करार दिया गया है।

पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक को गैर कानूनी और असंवैधानिक करार दिया था। तीन तलाक के संबंध में कई मुस्लिम महिलाओं ने याचिका लगाई थी कि उनके पतियों ने उन्हें स्काइप या वॉट्सऐप के जरिये तलाक दिया है और उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है।

कांग्रेस ने संसद में कहा था कि तीन तलाक बिल के कुछ प्रावधानों में बदलाव किया जाना चाहिए। मूल विधेयक को लोकसभा में पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है। यह राज्यसभा में लंबित है, जहां बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए के पास बहुमत नहीं है। इस बीच केंद्रीय कैबिनेट ने ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017’ में तीन संशोधनों को मंजूरी दी थी।

केंद्र सरकार के इस फैसले पर यूपी में शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने कहा कि महिलाओं की जीत हुई है। दरअसल, संविधान में अध्यादेश का रास्ता बताया गया है। किसी विधेयक को लागू करने कि लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

संविधान के आर्टिकल 123 के मुताबिक, जब संसद सत्र न चल रहा हो तो राष्ट्रपति केंद्र के आग्रह पर कोई अध्यादेश जारी कर सकते हैं। अध्यादेश सदन के अगले सत्र की समाप्ति के बाद छह हफ्तों तक जारी रह सकता है। जिस विधेयक पर अध्यादेश लाया जाता है,  उसे संसद में अगले सत्र में पारित कराना ही होता है। ऐसा न होने पर राष्ट्रपति इसे दोबारा भी जारी कर सकते हैं।

दरअसल, इस कदम के जरिये कैबिनेट ने उन चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया था जिसमें तीन तलाक की परंपरा को अवैध घोषित करने और पति को तीन साल तक की सजा देने वाले प्रस्तावित कानून के दुरुपयोग की बात कही जा रही थी।

प्रस्तावित कानून ‘गैरजमानती’ बना रहेगा लेकिन आरोपी जमानत मांगने के लिए सुनवाई से पहले भी मैजिस्ट्रेट से गुहार लगा सकता है। गैरजमानती कानून के तहत, जमानत पुलिस द्वारा थाने में ही नहीं दी जा सकती है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बताया था कि प्रावधान इसलिए जोड़ा गया है ताकि मजिस्ट्रेट ‘पत्नी को सुनने के बाद’ जमानत दे सकें।

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