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बलूचिस्तान मामला- यह प्रधानमंत्री का समझदारी भरा बयान है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई लक्ष्मण रेखा नहीं लांघी है। भारत एक जिम्मेदार देश है। जहां लोकतंत्र के खिलाफ बात होगी, जहां बड़े स्तर पर मानवाधिकारों का हनन होगा, जहां धर्मनिरपेक्षता के विरोध में बात होगी, वहां एक जिम्मेदार देश होने के नाते हमें कुछ बोलना पड़ेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बलूचिस्तान का जिक्र क्या किया हंगामा ही कट गया। मोदी के भाषण में बलूचिस्तान के जिक्र को कुछ लोगों ने कश्मीर पर पाकिस्तान की दखलंदाजी की प्रतिक्रिया कहा तो कुछ ने कहा कि भारत अपनी रीति नीति के हिसाब से बात करता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज के प्रोफेसर संजय कुमार भारद्वाज पड़ोसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और चीन की विदेश नीति के जानकार हैं। उनसे इस मामले पर संध्या द्विवेदी ने विस्तृत बातचीत की :

बलूचिस्तान की बात कर नरेंद्र मोदी ने लक्ष्मण रेखा लांघी है क्या? इतना हंगामा क्यों?
मैं नहीं मानता कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई लक्ष्मण रेखा लांघी है। भारत एक जिम्मेदार देश है। जहां लोकतंत्र के खिलाफ बात होगी, जहां बड़े स्तर पर मानवाधिकारों का हनन होगा, जहां धर्मनिरपेक्षता के विरोध में बात होगी, वहां एक जिम्मेदार देश होने के नाते हमें कुछ बोलना पड़ेगा। पाकिस्तान को चाहिए कि वह अपने देश के भीतर उठ रही आवाजों पर ध्यान दे। दमन की नीति को छोड़ एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह व्यवहार करे।

भारत के लिए बलूचिस्तान के क्या मायने हैं?
विभाजन से पहले बलूचिस्तान हमारा हिस्सा था। इस नाते मायने तो रखता ही है। विभाजन के बाद भी बलूचिस्तान पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहता था। वह एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पहचान चाहता था। उन्होंने अपनी आजादी की घोषणा भी कर दी थी लेकिन पाकिस्तान ने वहां सेना भेजकर उसे अपने कब्जे में कर लिया। बलूचिस्तान का नेतृत्व हमेशा से लोकतंत्र पर भरोसा करता रहा है। उनके सिद्धांत पाकिस्तान निर्माण के आधार के साथ मेल नहीं खाते थे। आजादी के बाद से ही बलूचिस्तान का पाकिस्तान से तीन-चार मुद्दों पर मतभेद रहा है। पहली बात बलूचिस्तान लोकतंत्र का समर्थक है जबकि पाकिस्तानी हुक्मरान कभी भी लोकतंत्र को स्थापित कर ही नहीं पाए। दूसरी बात पाकिस्तान में व्यापक या संयुक्त राष्ट्रवाद को कभी कोई जगह नहीं मिली। बलूच, सिंधी, ग्रामीण, दूसरी जनजातियां, बंगाली उनकी अपनी भाषा है, अपनी स्वायत्तता है, उन्हें कभी जगह ही नहीं दी गई। पाकिस्तान उन्हें पहचान देने के पक्ष में कभी नहीं रहा। तीसरी बात इतनी विविधता होते हुए भी पाकिस्तान ने इस्लामिक सिद्धांतों को लागू कर दिया। अलग-अलग भाषाएं होने के बावजूद राष्ट्रीय भाषा उर्दू बना दी। पाकिस्तान के इस रवैये से वहां के राज्य नाखुश हैं। सबसे बुरी स्थिति तब हुई जब पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान के नागरिक मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू किया। 1953 से शुरू हुआ यह सिलसिला बद से बदतर स्थिति की तरफ जाता रहा। बलूचिस्तान में लोकतंत्र के लिए, धर्मनिरपेक्षता के लिए, स्वयत्तता के लिए आवाज उठती रही है। 2005 में बलूच नेता बुगती की हत्या कर दी गई। हाल ही में एक एडवोकेट की हत्या, आर्मी वहां किस तरह से दमन कर रही है बीच बीच में इसकी खबरें आती रहती हैं। बलूचिस्तान में बड़े स्तर पर मानवाधिकार उल्लंघन होने और वहां के लोगों की मांग को अनसुना किए जाने के बाद भी एक बड़ा आंदोलन नहीं बन पाया। इसकी वजह पाकिस्तान सरकार और वहां की आर्मी द्वारा बलूचों, वहां की दूसरी जनजातियों, कलातों के बीच फूट डालने का लगातार होने वाला प्रयास है।

भारत की रीति नीति देखें तो वह हमेशा से दुनियाभर में कहीं भी होने वाले लोकतांत्रिक आंदोलन का समर्थक रहा है। भारत हमेशा से संयुक्त राष्ट्रवाद की बात करता है। किसी भी तरह के मावाधिकारों के खिलाफ रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा बलूचिस्तान की बात करने पर मुझे कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती। हमने तो वहां के लोकतंत्र, स्वायत्तता, धर्मनिरपेक्षता, संयुक्त राष्ट्रवाद की मांग को समर्थन दिया है। वहां की जनता तो लगातार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच जाकर मदद मांग रही है। भारत पाकिस्तान के किसी भी क्षेत्र में जाकर दखल देने में कोई रुचि नहीं रखता मगर एक जिम्मेदार राष्ट्र होने के नाते यह निश्चित रूप से चाहेगा कि संयुक्त राष्ट्रवाद, स्वायत्तता, लोकतंत्र की मांग का समर्थन किया जाए। भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप तो पाकिस्तान करता रहा है। हमने कभी भी पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया।

कुछ लोग कह रहे हैं कि बलूचिस्तान का जिक्र कश्मीर पर पाकिस्तान द्वारा अख्तियार किए गए रवैये की प्रतिक्रिया है?
मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। बलूचिस्तान का इतिहास टूटे वादों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और प्रभावशाली पंजाबियों के दमनकारी शासन का प्रतीक रहा है। बलूचिस्तान ब्रिटश राज के तहत चार शाही सत्ताओं कलात, लासबेला, खारन और मकरान को मिलाकर बना था। यह क्षेत्र भारत या पाकिस्तान की बजाय अफगानिस्तान और ईरान से ज्यादा मिलता जुलता है। पिछले साल जिनेवा में बलूचिस्तान इन द शैडोज नाम से कांफ्रेस हुई थी। कांफ्रेंस के बाद तैयार रिपोर्ट में कहा गया था कि बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति बुरी है। नागरिकों को सुरक्षा देने और कानून का राज कायम रखने में पाकिस्तान की सरकार नाकाम साबित हुई। इससे यह साफ है कि भारत ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बुद्धिजीवी वर्ग भी बलूचिस्तान के साथ हो रही हिंसा के खिलाफ है।

लाल किले से दिया गया बयान केवल एक बयान था या इसके पीछे कोई रणनीति?
निश्चित तौर पर यह सोचा समझा बयान था। एक जिम्मेदार राष्ट्र का प्रधानमंत्री लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कोई हलका बयान तो नहीं देगा। यह जिम्मेदारी भरा और समझदारी भरा बयान था। भारत हमेशा से लोकतंत्र का समर्थक और मानवाधिकारों का रक्षक रहा है। म्यांमार में भी भारत लोकतांत्रिक आंदोलन का पक्षधर रहा। निश्चित रूप से भारत चाहता है कि पाकिस्तान मानवाधिकारों का उल्लंघन करना बंद करे, अपने आंतरिक मामलों को दमन से दबाए नहीं बल्कि सभी आवाजों को सुनकर उनका हल निकाले। हमारी धरती पर जबरदस्ती जो कब्जा किया है, उसे छोड़े।

क्या बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो सकता है? क्या भारत बलूचिस्तान को केवल नैतिक समर्थन ही देगा या जरूरत पड़ने पर बांग्लादेश की तरह दखल देगा।
बलूचिस्तान टूटने की स्थिति में है या नहीं यह अभी कहना ठीक नहीं है। हां, बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। पहली बार ऐसा हुआ है कि ट्राइबल ग्रुप्स और अतिवादी यानी तालिबानी एक साथ आ गए हैं। इन दोनों का दुश्मन एक ही है। दोनों पाकिस्तानी आर्मी के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। आगे क्या होगा इस पर अभी कुछ कहना ठीक नहीं है।

क्या पाकिस्तान टूटने की कगार पर है। अगर ऐसा हुआ तो क्या भारत उसका समर्थन करेगा?
देखिए, पाकिस्तान में सेना ही सारे फैसले करती और उसे सरकार के जरिये लागू करवाती है। वहां की हुकूमत को तो कोई हक ही नहीं है। पाकिस्तान तो एक राष्ट्र के भीतर चल रहे दूसरे राष्ट्र के तहत काम करने वाला देश है। रहा सवाल इस बात का कि अगर कोई प्रतिकूल स्थिति बनी तो हम बलूचिस्तान का समर्थन करेंगे कि नहीं तो देखते हैं कि क्या परिस्थिति बनती है? हो सकता है कि पाकिस्तान अपनी नीतियों में सुधार करे। भारत का कभी भी ऐसा मकसद नहीं रहा कि वह किसी देश को तोड़े। भारत हमेशा से अपनी रीति-नीति और सिद्धांतों के हिसाब से कदम उठाता है। हम कभी ऐसा नहीं कहते हैं कि हम पाक के किसी हिस्से को तोड़ेंगे। पाकिस्तान अगर इस्लामिक राष्ट्रवाद की बात करेगा, कठोर राष्ट्रवाद की बात करेगा तो निश्चित रूप से वहां स्थितियां खराब होती जाएंगी। हम समर्थन दे न दें अंतरराष्ट्रीय समुदाय समर्थन देगा। हम यह नहीं कहते कि अलगाववादियों को समर्थन देंगे। हम तो मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ बात करते हैं, हम तो लोकतंत्र की बात करते हैं। प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में कहीं भी पाकिस्तान को तोड़ने की बात नहीं की।

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