सियासी गुत्थियों में उलझी कांग्रेस

पटना में रैली करने के पीछे कांग्रेस के दो खास मकसद थे. पहला यह कि पार्टी के  जमीनी नेता-कार्यकर्ता संगठन को मजबूत बनाने के लिए आगे आएं. दूसरा यह कि राज्य में मौजूदा सहयोगी दल उसकी बढ़ती ताकत को नजरअंदाज न करें और सीटों के बंटवारे में स्थिति सम्मानजनक रहे. लेकिन, रणनीतिक खामियों के चलते कांग्रेस के उक्त दोनों मकसद पूरे नहीं हो सके.

congress in biharबीती तीन फरवरी को कांग्रेस ने 28 सालों के बाद पटना के गांधी मैदान में अपने बलबूते जन-आकांक्षा रैली कर ही ली. पार्टी प्रमुख राहुल गांधी इस मौके पर खूब बोले और उन्होंने जमकर तालियां बटोरीं. लाख दावों के बावजूद भीड़ के लिहाज से यह रैली औसत रही और इस पर बाहुबली विधायक अनंत सिंह का प्रभाव साफ देखा गया. लेकिन, जैसी उम्मीद थी कि इस रैली के माध्यम से कांग्रेस के सामने खड़े कई सियासी सवालों के जवाब पार्टी को मिल जाएंगे, वह नहीं हो सका. उल्टे कुछ सवालों की गुत्थियां इतनी ज्यादा उलझ गईं कि उन्हें सुलझाने में अब कांग्रेस को आने वाले दिनों में कुछ ज्यादा ही पसीना बहाना होगा.

दरअसल, कांग्रेस ने जब यह रैली करने का मन बनाया, तो दो-तीन बातें उसके जेहन में थीं. तीन दशकों से राजद के सहारे चल रही पार्टी को अपने पैरों पर खड़ा करना पहला मकसद था. कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को यह महसूस कराना था कि अब हम अपने बलबूते भी गांधी मैदान भर सकते हैं. आने वाला कल कांग्रेसियों का है और कांग्रेसी विचारधारा को मानने वाले सभी लोगों को अब आक्रामक तरीके से पार्टी के झंडे को आगे लेकर चलना है. दूसरा मकसद राजद एवं अन्य सहयोगी दलों को यह दिखाना था कि कांग्रेस अब पहले जैसी कमजोर दिखने वाली पार्टी नहीं रही. तीन राज्यों में कांग्रेस ने भाजपा को हरा दिया है और अब दूसरे राज्यों में भी ऐसा ही होगा. इसलिए बिहार में जब सीटों का बंटवारा हो, तो कांग्रेस को उसकी हैसियत और ताकत के आधार पर सीटें मिलें, न कि पहले की किसी अवधारणा के आधार पर. रैली के माध्यम से कांग्रेस चाहती थी कि वह बिहार के लिए अपनी राजनीतिक लाइन भी साफ कर दे, ताकि दूसरे दल किसी तरह के भ्रम में न रहें. लेकिन, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ने प्लान तो अच्छा बनाया, पर रैली खत्म होते-होते वह अपने लक्ष्यों से भटक गई या फिर कहिए कि रैली से निकलने वाले राजनीतिक संदेशों को उसने खुद उलझा कर रख दिया.

बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल, अभियान समिति के प्रमुख सांसद अखिलेश सिंह एवं बिहार कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा की तिकड़ी ने बहुत ईमानदारी से रैली को सफल बनाने का प्रयास किया, वे दिन-रात मेहनत कर हर स्तर पर लोगों को जोडऩे में लगे रहे. लेकिन, कुछ रणनीतिक चूकों से उन्हें मनमाफिक फल नहीं मिल पाया. कांग्रेस ने तय किया था कि पार्टी के सभी 27 विधायक चार-चार हजार लोगों के साथ रैली में आएंगे, लेकिन दो-तीन विधायकों को छोड़ दें, तो कोई और विधायक इस टॉस्क को पूरा नहीं कर पाया. विधायक खुद को यह नहीं समझा पाए कि आखिर इतने लोगों को ले जाकर वे किसे मजबूत करेंगे और इससे उन्हें क्या फायदा होगा. कुछ विधायकों का कहना था कि चुनाव लोकसभा का होने वाला है, हम अपना पसीना अभी क्यों बहाएं. जिन्हें दिल्ली जाना है, वे आगे आएं. दूसरी चूक यह हुई कि बाहुबली विधायक अनंत सिंह रैली में भीड़ जुटाने के अभियान से जुड़ गए. अनंत सिंह के समर्थक काफी संख्या में रैली में थे, इसमें कोई शक नहीं है, पर अनंत सिंह की आक्रामकता ने दूसरे भीड़ जुटाऊ कांग्रेसियों को शिथिल कर दिया. उन्हें लगा कि अब अनंत सिंह सब कर ही देंगे, तो वे क्यों बिना वजह अपना कुर्ता गंदा करें. यही वजह रही कि कांग्रेस का आम कार्यकर्ता इस रैली में बहुत उत्साह से नहीं जुड़ सका, जो कि इस रैली का मुख्य लक्ष्य था. रैली से पहले कहा जा रहा था कि अगर गांधी मैदान में तीन फरवरी को ठीकठाक लोग आ गए, तो फिर तेजस्वी यादव को कांग्रेस के दावे को हल्के में लेने में दिक्कत होगी.

national allainceरैली में जितनी भीड़ आई, उससे तेजस्वी यादव ने राहत की सांस ली और कांग्रेस का दांव उल्टा पड़ गया. ज्यादा पाने का मकसद था, लेकिन अब पहले वाली संख्या भी मुश्किल में है. गौरतलब है कि कांग्रेस को १० सीटें देने पर महा-गठबंधन में बात लगभग बन गई थी, वहीं कांग्रेसी रैली में धूम मचाकर 15 सीटों का दावा ठोंकने वाले थे. लेकिन, अब लगता है कि कहीं यह संख्या आठ पर आकर न अटक जाए. इन आठ सीटों में सासाराम, औरंगाबाद, समस्तीपुर,  किशनगंज, कटिहार, झंझारपुर, शिवहर और वाल्मीकि नगर शामिल हैं. कांग्रेस का जोर इन सीटों के अलावा सुपौल, पटना साहिब, पूर्णिया, दरभंगा और मुंगेर पर है. लेकिन, जानकार बताते हैं कि सीटिंग होने के बावजूद सुपौल की सीट राजद कांग्रेस को नहीं देना चाह रहा है. मुंगेर में अनंत सिंह के नाम पर दिक्कत है, तो दरभंगा में मुकेश सहनी ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया है. शिवहर के लिए लवली आनंद को राजपूत होने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है, क्योंकि महा-गठबंधन में पहले से ही कई राजपूत नेताओं के टिकट पक्के हो चुके हैं. इसलिए सीटों को लेकर जो पहेली पहले थी, वह अब भी बरकरार है.

दो टूक कहिए, तो रैली इस पहेली को सुलझाने में विफल रही. उम्मीद की जा रही थी कि राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के साथ-साथ नीतीश कुमार को भी अपने निशाने पर लेंगे, लेकिन ऐसा हुुआ नहीं. राहुल ने मोदी को बहुत बुरा-भला कहा, लेकिन अपने पूरे भाषण में उन्होंने केवल एक बार नीतीश का नाम लिया और उनके खिलाफ कोई गंभीर आरोप नहीं लगाए. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि राहुल गांधी ने लगता है, अपने विकल्प खुले रखे हैं. अपने भाषण में उन्होंने कहा भी कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी फ्रंटफुट पर खेलेगी. लेकिन, लगे हाथ उन्होंने यह कहकर सियासी गुत्थी और उलझा दी कि लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में हमारे अभी के सभी सहयोगी साथ-साथ होंगे. अगर दूसरी बात सही मानी जाए, तो राहुल को नीतीश कुमार के खिलाफ आक्रामक तरीके से हमला करना चाहिए था, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. दरअसल, कांग्रेस के सामने असली दिक्कत अब आने वाली है. जिन बड़े नेताओं को वह टिकट देने के वादे के साथ पार्टी में ला रही है, उनकी ख्वाहिश अगर पूरी नहीं हुई, तो कांग्रेस की छीछालेदर तय है. एनडीए से नाराज बड़े नेताओं के लिए कांग्रेस एक सही मंच है, क्योंकि दूसरे दलों में गुंजाइश ही नहीं है. राजद, रालोसपा और हम में जगह नहीं है, ले-देकर कांग्रेस बची है, जहां उम्मीद का दीया जल रहा है. लेकिन, जिस दिन यह दीया बुझ जाएगा, उस दिन की रात पार्टी के लिए काफी डरावनी होगी. तेजस्वी यादव उन क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं, जहां के दावे कांग्रेस कर रही है.

मतलब साफ है कि तेजस्वी अपनी ताकत दिखाकर कांग्रेस को दूसरे तरीके से समझाना चाह रहे हैं. अब यह कांग्रेस पर निर्भर है कि वह तेजस्वी के इशारे समझ पा रही है या नहीं. रैली तय करने से लेकर उसके खत्म होने तक कांग्रेस ने बहुत सारी रणनीतिक भूलों को अंजाम दिया है और तेजस्वी के आक्रामक तेवरों से लगता है कि कांग्रेस को अपनी गलतियों का खामियाजा भुगतना होगा. अब तय है कि कांग्रेस को महा-गठबंधन में राजद की शर्तों पर रहना होगा. राजद कांग्रेस को सीट देगी, तो प्रत्याशी का नाम भी पूछेगी. कांग्रेस को यह सब बताना होगा, क्योंकि मौजूदा सियासी हालात में उसके पास और कोई विकल्प नहीं है. हां, अगर उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी वह अकेले चुनाव लडऩे का ऐलान कर दे, तो फिर बात अलग है.

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