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शरीफ और पाक सेना की कश्मीर नीति एक

आज पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते जिस जगह पर आ गए हैं उसे देखकर कोई साफ तस्वीर नहीं उभरती कि यह रास्ता आगे किधर जाएगा।

आज पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते जिस जगह पर आ गए हैं उसे देखकर कोई साफ तस्वीर नहीं उभरती कि यह रास्ता आगे किधर जाएगा। अजय विद्युत ने पाकिस्तान के संबंध में मोदी सरकार के रुख और तमाम दूसरी बातों पर पूर्व राजनयिक और पाकिस्तान मामलों के जानकार विवेक काटजू से बातचीत की, जिसके कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं।

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मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति में कहां गड़बड़ हो रही है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारे सभी पड़ोसी देशों से मैत्रीपूर्ण संबंध चाहते हैं। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वह भारत के विकास को पड़ोसी देशों के विकास के साथ जोड़ना चाहते हैं। तो इस तरह से उनकी दृष्टि इस पूरे क्षेत्र या कहें कि खासतौर से दक्षेस (सार्क) क्षेत्र पर है। इसमें पाकिस्तान भी शामिल है। इसी कारण उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित किया था। और उस समय ऐसा लगता था कि बहैसियत पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी दोनों देशों के रिश्तों में सुधार और सहयोग के एक नए युग का आरंभ करना चाहते हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि पाकिस्तान की भारत नीति पाकिस्तान सेना के हाथ में है। पाकिस्तानी सेना की दृष्टि हमेशा से भारत के प्रति नकारात्मक और द्वेष से भरी रही है। पिछले कोई दो सालों में यह साफ हो गया है कि पाकिस्तानी सेना को भारत से सहयोग में कोई रुचि नहीं है। उसका लगातार प्रयत्न रहा है कि वह भारत के अंदरूनी मामलों में खासतौर से जम्मू कश्मीर में गड़बड़ी फैलाती रहे।

पाकिस्तानी सेना की इस बात में कोई रुचि नहीं है कि पाक और भारत के बीच एक अच्छे पड़ोसी जैसे संबंध बन पाएं। वे सहयोग नहीं बल्कि भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं। वो दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि भारत जम्मू कश्मीर में स्टेट टेररिज्म फैला रहा है और पड़ोसी देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। कुछ महीने पहले दिसंबर 2015 में मोदी सरकार ने महसूस किया कि पाकिस्तानी सरकार और सेना दोनों भारत के साथ सहयोग करना चाहते हैं। इसकी वजह यह थी कि एक रिटायर्ड पाकिस्तानी जनरल नासिर जंजुआ को पाकिस्तान का राष्ट्रीय  सुरक्षा सलाहकार बनाया गया। तो इस घटना से यह मान लेना गलत था कि अब पाकिस्तानी सेना और नवाज शरीफ एक ही ट्रैक पर हैं। फिर भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की उनके पाकिस्तानी समकक्ष के साथ बैंकाक में बैठक हुई। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान यात्रा पर गर्इं जिसमें घोषणा की गई कि दोनों देशों के बीच समग्र बातचीत शुरू की जाएगी। 25 दिसम्बर 2015 को अचानक ही विदेश यात्रा पूरी कर लौट रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रास्ते में पाकिस्तान में रुके और नवाज शरीफ के साथ लाहौर गए। लेकिन उसके बाद ऐसी घटना हो जाती है जो बताती है कि भारत का ऐसा मान लेना कि पाक प्रधानमंत्री और सेना दोनों भारत के साथ सहयोग करने की इच्छा रखते हैं, गलत था। मोदी-नवाज की पाकिस्तान में गर्मजोशीभरी मुलाकात को एक हफ्ता भी नहीं बीतता कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकवादी हमला हो जाता है। वह पाकिस्तान से आए जैश ए मोहम्मद के आतंकवादियों ने किया। इसे लेकर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया भी बहुत स्पष्ट नहीं रही। भारत ने जांच के लिए पाकिस्तान की ज्वाइंट इंवेस्टीगेशन टीम को आने की अनुमति दी। लेकिन अब यह साफ हो गया है कि पाकिस्तानी जांचकर्ताओं ने उन सूचनाओं पर कोई विचार नहीं किया जो भारत ने उन्हें दी थीं। वे सूचनाएं और साक्ष्य इस बात का साफ इशारा करते हैं कि यह हमला पाकिस्तान से कराया गया। वे मार्च में यहां आए थे। पांच महीने हो गए। अब तक उनको कुछ कार्रवाई तो करनी चाहिए थी। दरअसल भारत की पाकिस्तान नीति हमेशा पाकिस्तान की जमीनी हकीकतों, उसकी नीतियों की वास्तविकता, वहां की राजनीति और सेना के साथ उसके संबंधों की वास्तविकता पर आधारित होनी चाहिए। केवल उम्मीद और उत्साह पर नहीं।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह का दक्षेस गृह मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने पाकिस्तान जाना कूटनीतिक दृष्टि से सही था या गलत?

उनका दौरा बिल्कुल सही था क्योंकि वह जा रहे थे सार्क होम मिनिस्टर्स की मीटिंग के लिए। भारत सरकार ने तय किया कि उनका पाकिस्तान दौरा केवल सार्क मीटिंग तक ही सीमित रहे। यह भी तय हुआ कि राजनाथ सिंह पाकिस्तान के गृह मंत्री निसार अली खान से कोई भी द्विपक्षीय वार्ता नहीं करेंगे। बल्कि मेरा अपना तो यह भी मानना है कि अगर राजनाथ जी वहां अपने समकक्ष पाक गृहमंत्री के साथ कोई बातचीत भी करते तो उसमें भी किसी को कोई आपत्ति नहीं होती बशर्ते वह पाकिस्तान को साफ संदेश देते कि कश्मीर भारत का एक राज्य है और किसी भी देश को उसमें हस्तक्षेप करने की अनुमति भारत कभी नहीं देगा। और अभी तक जो भी हस्तक्षेप हुआ है उसकी जड़ों को बाहर निकाल फेंकेगा।

अब दूसरी बात पर आता हूं। वहां सार्क गृहमंत्रियों के सम्मेलन में हमारे गृहमंत्री ने जो वक्तव्य दिया उसमें भी भारत के पक्ष को पूरी स्पष्टता और दृढ़ता से रखा है। एक तो आतंकवादी अच्छे और बुरे नहीं सिर्फ आतंकवादी होते हैं और उनको स्वतंत्रता सेनानी के रूप में महिमामंडित करना कदापि सही नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान की तरफ साफ इशारा करते हुए यह एक साफ और कड़ा संदेश था। और भी अच्छी बात यह कि भारत के गृहमंत्री ने इसे एक बहुत ही सटीक समय और अवसर पर दिया। अलबत्ता पाकिस्तान ने गृहमंत्री के साथ प्रोटोकॉल के खिलाफ जो रवैया अपनाया वह बहुत ही गलत था। सामान्य शिष्टाचार के लिहाज से भी उसे अनुचित ही कहा जाएगा। भारत लौटकर राजनाथ सिंह ने संसद में जो बयान दिया वह बेहद संतुलित और अच्छा माना जाना चाहिए। उन्होंने भारत सरकार की नीति को स्पष्ट किया। यह बड़प्पन भी दिखाया कि पाक के इस व्यवहार से उन्हें व्यक्तिगत रूप से कोई चोट नहीं लगी है। भारत के सम्मान की रक्षा वह हमेशा करेंगे जैसी कि उन्होंने अपने पाकिस्तान दौरे के दौरान की। फिर उन्होंने यह भी कहा कि यह ऐसा पड़ोसी है जो मानता ही नहीं है। यह भारत की हमेशा से विडम्बना रही है जिसे उन्होंने व्यक्त किया। लेकिन अब एक विडम्बना को व्यक्त करना ही काफी नहीं है इसका कुछ समाधान भी ढूंढना पड़ेगा और ‘प्रॉमिनेंट’ समाधान ढूंढना पड़ेगा। भाई अगर कोई ऐसा पड़ोसी है तो उसको मनवाना भी तो पड़ता है। ऐसा तो हमेशा नहीं चल सकता कि वह हमें चोट पर चोट देता जाए और हम हर बार चोट खाते जाएं, सहते जाएं।

पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के रवैये में एकदम परिवर्तन आया है। वे कट्टरपंथियों की भाषा बोलने लगे हैं। तो यह पाकिस्तान की जनता की राय का दबाव है या फिर सेना का?

नवाज शरीफ की भारत नीति के दो अलग अंग हैं। एक तरफ तो वह भारत से सहयोग चाहता है, खासतौर से आर्थिक सहयोग। पाकिस्तान अच्छी तरह से जानता है कि जब तक भारत का सहयोग नहीं होगा उसकी आर्थिक व्यवस्था स्थिर और प्रोग्रेसिव नहीं रह सकती। लेकिन उसकी नीति का दूसरा पहलू है जम्मू कश्मीर। और जहां तक जम्मू कश्मीर का मामला है तो उसमें नवाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना में कोई अंतर नहीं है। दोनों की नीतियां मिलती हैं, उनमें अनुरूपता है। तो हमें इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए जैसा रुख उन्होंने आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद और कश्मीर में बने हालात को देखते हुए दिखाया। उन्होंने यह सब न तो पाकिस्तान की सेना के दबाव में किया और न ही पाकिस्तानी जनता व वहां के कट्टरपंथी और आतंकवादी गुटों के दबाव में। यह उन्होंने स्वयं ही किया और जम्मू कश्मीर के मामलों में उनका रवैया हमेशा से ही काफी सख्त रहा है।

क्या आपको भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत फिर से शुरू होने की कोई संभावना नजर आती है?

मुझे उम्मीद है कि जब तक पाकिस्तान आतंक के मामले में उचित कदम नहीं उठाएगा, जम्मू कश्मीर में हस्तक्षेप का अंत नहीं करेगा, भारत को समग्र द्विपक्षीय वार्ता नहीं शुरू करनी चाहिए। लेकिन जो भारत पाकिस्तान के कॉन्टेक्ट्स हैं और दो पड़ोसी देशों के लिए आवश्यक होते हैं, हमारी कोशिश होनी चाहिए कि वे चलते रहें। जैसे सीमा पर सिक्यूरिटी रहे, लाइन आॅफ कंट्रोल पर सुरक्षा रहे, फिर हमारे डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल आॅफ मिलिट्री आॅपरेशंस) और उनके डीजीएमओ के जो कॉन्टेक्ट्स हैं, हमारे बीएसएफ और पाकिस्तानी रेंजर्स के कॉन्टेक्ट्स हैं, हमारे और उनके हाईकमीशन के जो कॉन्टेक्ट्स हैं। इसके अलावा कुछ मानवीय दृष्टिकोण के मामले होते हैं जैसे कैदियों का मामला, मछुआरों का मामला तो ये कॉन्टेक्ट्स बने रहने चाहिए। तो बातचीत तो कई तरह की हो सकती है न। अब जब हम कहते हैं कि बातचीत होगी या नहीं तो उसका आशय समग्र बातचीत से ही होता है। वरना हमारा हाईकमिश्नर वहां है, उनका यहां है तो बातचीत तो चलती है। लेकिन सवाल यह है कि बातचीत का स्वरूप क्या होगा? किन विषयों पर बातचीत होगी? तो मेरा कहना है कि सुरक्षा के लिए बातचीत होती रहे लेकिन जो कांप्रहेंसिव बाइलेटरल डायलॉग होता है, वह नहीं चाहिए।

तो क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान कश्मीर में अवांछित गतिविधियों पर रोक लगाएगा और अपने कदम वापस खींचेगा?

इतनी आसानी से वह ऐसा नहीं करेगा। हमें सब्र रखना होगा।

आपके अनुसार मोदी सरकार को पाकिस्तान के साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए?

मोदी सरकार को पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश देने की आवश्यकता है कि भारत उससे अच्छे रिश्ते चाहता है, सहयोग भी चाहता है, लेकिन भारत अपने सामरिक हितों की पूर्णरूप से रक्षा करेगा। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को लेकर जो लचीला रुख अब तक अपनाया हुआ था, उसकी अब कोई आवश्यकता नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनय के जो सिद्धांत हैं, उन्हीं के आधार पर मोदीजी को आगे बढ़ना चाहिए। इन सिद्धांतों में पहला यह है कि कोई भी देश दूसरे देश में अपने अलगाववादी तत्वों को संबंध रखने की इजाजत नहीं देगा। मेरा इशारा साफ है।

भारत में ऐसे लोग भी हैं जो हर हाल में दोनों देशों के बीच बातचीत का समर्थन करते हैं? उनके रवैये में आपको कोई बदलाव नजर आ रहा है?

मुझे कतई नहीं लगता कि ऐसे लोगों के रवैये में कोई बदलाव आएगा क्योंकि वो एक काल्पनिक दुनिया में रहते हैं, जो सामरिक और राजनय की चुनौतियों की वास्तविकता से बहुत दूर है। जिन्होंने वास्तविकताओं को लगातार नजरअंदाज किया है वे आज भी नजरअंदाज करते रहें। वो चाहते हैं कि आप मीठी मीठी बातें करते एक दूसरे को फुसलाते रहें। ऐसा कब तक चलेगा भाई? उदाहरण के तौर पर पाकिस्तान की सेना यह खुलेआम ऐलान करती है कि भारत उसका ‘प्रॉमिनेंट’ शत्रु है। लेकिन वे लोग तो इसको भी नजरअंदाज करते हैं। तो ऐसे तत्वों के बारे में और क्या कहा जाए। यह तो ऐसा ही है जैसे एक आदमी कह रहा है कि मैं आपका शत्रु हूं। मेरे पास अगर बल्लम हो तो आपको भोंक दूंगा। और आप उससे कहें कि ‘नहीं मैं तुम्हारा शत्रु नहीं हूं, तुम मेरे शत्रु नहीं हो।’ अगर वाणी और व्यवहार देखकर भी आपने आंखें मूंद रखी हों तो यही कहेंगे न कि आप ख्याली दुनिया में रह रहे हैं।

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