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खट्टर कुर्सी भले बचा लें पर रसूख तो गया

मलिक असगर हाशमी

पंचकूला की सीबीआई अदालत का फैसला क्या आएगा इसका अंदाजा सभी को था पर कोई बोल नहीं रहा था। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को भी पता था कि उसे उसके अपराध की देर से ही सही सजा मिलने जा रही है। पता तो उसके समर्थकों को भी था कि अदालत क्या फैसला सुनाने वाली है। इसलिए जो लाखों लोग पंचकूला, सिरसा और पंजाब व हरियाणा के विभिन्न शहरों में राम रहीम के समर्थन में जुटे उनमें से कोई मिठाई लेकर नहीं आया कि वह बरी हो जाएगा तो बांटेंगे। सब लाठी डंडे, पेट्रोल और न जाने क्या-क्या लेकर आए। पर मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने राज्य के हाईकोर्ट के निर्देशों पर अमल की बजाय बलात्कारी राम रहीम के आश्वासन पर भरोसा करना बेहतर समझा। उसने प्रशासन से कहा कि सिरसा से उसके साथ केवल दो गाड़ियां चलेंगी पर चलीं सौ से ज्यादा। उसने सरकार को आश्वासन दिया था कि उसकी अपील पर उसके समर्थक शांतिपूर्वक वापस चले जाएंगे। उसने अपील तो की पर कोई गया नहीं। नतीजा यह हुआ कि तैंतीस लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा।

राम रहीम की शांति की अपील एक धोखा थी। समर्थकों को तो छोड़िए उसकी सुरक्षा में लगे पुलिस के नौ कमांडो कानून और प्रशासन की बजाय उस बलात्कारी के साथ हो गए। सीबीआई अदालत ने जब उसे दोषी घोषित कर दिया तो इन सुरक्षा कर्मियों ने पुलिस की हिरासत से उसे छुड़ाने की कोशिश की। इन सबको गिरफ्तार करके पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया। यह पहली बार हुआ कि एक छोटे से इलाके में एक घंटे से भी कम समय में पुलिस गोली से अट्ठाइस लोग मारे गए।

फैसला आने से मात्र दो दिन पहले डेरा सच्चा सौदा की ओर से मीडिया को भेजी गई प्रेस रिलीज में बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा की अगुवाई में पिछले एक दशक में समाज सेवा के क्षेत्र में किए गए कार्य गिनाए गए थे। यह भी बताने का प्रयास किया गया था कि डेरा से संबंध रखने वाले कितने सज्जन, समाजहितैषी, संवेदनशील और असहायों की मदद करने वाले होते हैं। नेत्रदान, रक्तदान और स्वच्छता के मामले में हमेशा आगे रहते हैं। मगर 25 अगस्त को ढाई बजे पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत द्वारा गुरमीत राम रहीम को साध्वी यौन उत्पीड़न मामले में दोषी करार देने के साथ ही जैसे डेरा के सारे ‘देवा’ शैतान बन गए। उन्होंने दो घंटे में ही हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों को हिंसा की आग में झोंक दिया। गाजियाबाद के लोनी में आगजनी की गई और दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर रीवा एक्सप्रेस की दो बोगियां जला दी गर्इं। हिंसा का तांडव मचाते हुए दो सौ से अधिक छोटे बड़े वाहन फूंके गए। सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया। दो रेलवे स्टेशनों में आग लगाई गई और पुलिस फायरिंग में पंचकूला में 28 लोगों की जान चली गई। इस घटना में लगभगग तीन सौ लोग घायल हुए हैं जिनमें साठ के करीब पुलिस जवान हैं। सिरसा में उपद्रवियों को नियंत्रित करने के क्रम में तीन लोग पुलिस फायरिंग में मारे गए। सिरसा में एक मिल्क प्लांट फूंक दिया गया। इसी तरह जारवल व लोहारू में बिजली घरों को निशाना बनाया गया। गुलाना में तीन पेट्रोल पंप जला डाले गए। शाहाबाद के नलवी में दूरभाष केंद्र और कलायत के सरकारी दफ्तरों को जलाने की कोशिश की गई। बढ़ती हिंसा को देखते हुए विभिन्न रूटों पर छह सौ ट्रेनें और हरियाणा रोडवेज की सेवाएं रद्द करनी पड़ीं। इन वारदात के दौरान मनोहरलाल सरकार की सुरक्षा-व्यवस्था की धज्जियां उड़ती रहीं और चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री टीवी के लिए शांति की अपील की रिकॉर्डिंग कराने में व्यस्त रहे। मंत्रिमंडल के बाकी सदस्य तो जैसे पटल से ही गायब थे। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने इस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि जैसे राजनीतिक लाभ के लिए पंचकूला को हिंसक भीड़ के हवाले कर दिया गया हो। हिंसा के अगले दिन सेना, अर्धसैनिक बल और हरियाणा पुलिस ने अवश्य कई एहतियाती कदम उठाए। डेरा मुख्यालय सहित कुरुक्षेत्र, कैथल आदि के डेरा सील किए गए और तलाशी अभियान चलाया गया। इतना कुछ होने के बावजूद हरियाणा के डीजीपी बीएस संधू मानने को तैयार नहीं कि इस मामले में पुलिस प्रशासन से कोई चूक हुई है। उनका कहना है कि उनकी प्राथमिकता गुरमीत राम रहीम को अदालत तक पहुंचाने की थी जिसमें वे सफल रहे। प्रदेशभर में हुई इस हिंसा को उन्होंने यह कहकर खारिज कर दिया कि इस घटना में आम आदमी को कोई नुक्सान नहीं पहुंचा है।
सीबीआई कोर्ट का फैसला आने से पहले जब भी विभिन्न माध्यमों से डेरा सच्चा सौदा समर्थकों के हिंसा फैलाने की आशंका जताई गई, सरकार की ओर से एक ही जवाब मिला, ‘डेरा के लोग शांतिप्रिय हैं और हिंसा में विश्वास नहीं रखते।’ शिक्षा मंत्री रामविलास शर्मा ने तमाम आशंकाओं को झुठलाते हुए इसे कोरा गप करार दिया। पर फैसला आने के बाद जब हिंसा भड़की तो उन्हें एक बार फिर मीडिया के सामने आना पड़ा और डेरा वालों से अपनी परंपरा के अनुरूप शांति कायम करने में सरकार की मदद करने की अपील करनी पड़ी।

डेरा वालों का समाज सेवा को लेकर जैसा रिकार्ड रहा है, उससे कम से कम कानून की धज्जियां उड़ाने मेंं वे पीछे नहीं रहे हैं। ऐसा नहीं होता तो आज डेरा सच्चा सौदा के मुखिया रोहतक के सोनारिया जेल में नहीं होते। कोर्ट का फैसला आते ही उन्हें एयर फोर्स के हेलीकॉप्टर से एयरलिफ्ट कर सोनारियां पहुंचा दिया गया। अलग बात है कि जेल में गुरमीत राम रहीम को सुविधा देने, हेलीकॉप्टर से जेल भेजते समय एक अटेंडेंट देने और इस बलात्कारी का बैग उठाकर चलने के कारण राज्य के उप महाधिवक्ता को बर्खास्त करना पड़ा।

डेरा प्रवक्ता दिलावल इंसा के मुताबिक, ‘उनके साथ भी वही कुछ हो रहा है जैसा अतीत में अन्य गुरुओं के साथ हुआ है।’ यानी इतना कुछ होने के बावजूद डेरा वाले कतई मानने को तैयार नहीं कि उनके ‘पिताजी’ दोषी हैं और उनकी ओर से हिंसा फैलाई गई है।

फैसले के दिन गुरमीत राम रहीम के सिरसा के अपने विशाल डेरा परिसर से दो सौ गाड़ियों के काफिले के साथ निकलते ही आभास हो गया था कि आज का दिन प्रदेश सरकार पर भारी पड़ने वाला है। जैसे-जैसे यह काफिला पंचकूला की ओर बढ़ता गया गाड़ियों की संख्या बढ़ती गई। जहां से गाड़ियां गुजरीं, अपने ‘पिताजी’ को देखकर उनके समर्थक उग्र होते गए। फैसला आने के बाद फिर जो हुआ उसे लेकर देश भर की नजर हरियाणा पर टिकी हुई हैं। अनुमान है कि शुक्रवार की हिंसा में करीब एक हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। प्रदेश सरकार इसका अंतिम आकलन करने मेंं जुटी है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने ऐलान किया है कि जिनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचा है, उसकी भरपाई प्रदेश सरकार करेगी। इसके लिए लोगों से प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए आगे आने की अपील की गई है। इसके अलावा पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट ने डेरा की तमाम संपत्तियों की सूची बनाने की हिदायत दी है ताकि उसकी नीलामी से मिलने वाले धन से क्षतिपूर्ति की जा सके। पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने साध्वी यौन उत्पीड़न मामले में गुरमीत राम रहीम को धारा 376 और 506 के तहत दोषी करार दिया है।

इस मामले में अब तक प्रदेश सरकार का जैसा ढुलमुल रवैया रहा है, उसे लेकर हरियाणा की जनता चिंतित है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है, ‘मनोहरलाल सरकार के अधिकारियों में निर्णय लेने की क्षमता नहीं है।’ जाट आंदोलन की जांच के लिए बनी प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट में भी इस ओर इशारा किया गया था। अधिकारियों की अक्षमता के कारण ही डेढ़ वर्ष पहले जाट आंदोलन हिंसक हो गया था जिसमें अरबों की संपत्ति का नुकसान हुआ और लगभग इकतीस लोग मारे गए थे। पुरानी घटना से यदि सरकार सबक लेती और प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट के सुझाए बिंदुओं पर अमल किया गया होता तो निश्चित ही यह नौबत नहीं आती। उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे और पुलिस सुधार को लेकर कई महत्वपूर्ण कार्य कर चुके प्रकाश सिंह का कहना है, ‘हरियाणा पुलिस के जवान इतने मजबूत हैं कि वे अफगानिस्तान में भी आतंकियों के समक्ष अपना दम दिखा सकते हैं, बस कमी है तो आधुनिक प्रशिक्षण की। इसके अभाव में आपात स्थिति में वे बिखर जाते हैं।’ इस घटना में भी यही सब देखने को मिला। हिंसा के दौरान स्थिति यह रही कि केंद्र से भेजी गई सेना पंचकुला और सिरसा में आर्डर का इंतजार करती रही और बलवाई हिंसा और आगजनी करते रहे। केंद्र से भेजे गए अर्धसैनिक बलों को भी ऐसी जगह लगाया गया, जहां अधिक गड़बड़ी नहीं थी। पंचकूला में एक ही जगह सौ से अधिक वाहन फूंके गए और मीडिया की ओबी वैन और मीडियाकर्मियों को नुकसान पहुंचाया गया, पर वहां अर्धसैनिक बलों का अभाव दिखा।

हिंसा की आशंका को देखते हुए प्रदेशभर की पुलिस फोर्स पंचकूला में तैनात की गई थी, पर हिंसा शुरू होते ही हरियाणा पुलिस के जवान मोर्चा लेने की बजाय कुछ जगह भाग खड़े हुए। एक समय ऐसा आया कि पंचकूला की डीसी गौरी पराशर जोशी पुलिस जवानों के भाग जाने से अकेली पड़ गर्इं, जिसकी शिकायत उन्होंने डीजीपी से की है। इस प्रकरण को शुरू से हलके में लेने की गलती की गई। भाजपा प्रवक्ता जवाहर यादव कहते हैं, ‘पंचकूला हिमाचल, हरियाणा और पंजाब की सीमाओं से घिरा हुआ है। इसलिए निगरानी रखने में दिक्कत आई।’
दूसरी ओर हजारों की संख्या में डेरा समर्थक पंचकूला में इकट्ठे होते रहे, पर उन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया गया। इस प्रकरण के मद्देनजर प्रदेशभर में धारा 144 लगी हुई थी। फिर भी भीड़ दो दिनों से पंचकूला में इकट्ठी होती रही। हाई कोर्ट के प्रदेश सरकार को फटकार लगाने के बाद भी सजगता नहीं दिखाई गई। इसकी जगह मुख्यमंत्री का बयान आया कि स्थिति नियंत्रण में है। चिंता की कोई बात नहीं। गृहसचिव रामनिवास का कहना है, ‘पंचकूला आने वालों से लाठी और छतरियां तक ले ली गई थीं।’ यदि ऐसा था तो फैसला आने के बाद डेरा वालों के पास हथियार, पेट्रोल बम कहां से आए? इसका अर्थ है कि पंचकूला में ही कहीं असलहा इकट्ठे किए जाते रहे और पुलिस को कानोकान खबर नहीं हुई। घटना पर शुरू से नजर रखने वाले मीडियाकर्मियों को आशंका है कि बाबा के हर अनुयायी के पास एक थैला था। यदि उनकी तलाशी ली गई होती तो पुलिस प्रशासन के हाथ कुछ बड़ा लग सकता था। मगर पुलिस वाले उनकी जांच करने की बजाय केवल लाठी-डंडा बटोरने में लगे रहे। यहां तक कि पंचकूला के उस पार्क की चेकिंग भी नहीं की गई जहां हजारों डेरा वाले दो दिनों से डेरा जमाए हुए थे। फैसला आने के साथ ही बाबा के अनुयायी इस कदर उग्र हो गए कि उन्हें पीछे नहीं धकेला जाता तो वे कोर्ट परिसर में ही घुस जाते। पूरी घटना में बलवाई पुलिस वालों पर भारी पड़े।

इस मामले में सरकार के साथ खुफिया तंत्र भी नाकारा साबित हुआ है। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जब पंजाब स्थित डेरा के ‘नाम चर्चा घरों’ में हथियार इकट्ठा किए जाने की सूचना मिली तो खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों ने इसे बकवास बताया और जजमेंट आने पर कुछ डेरा समर्थकों के आत्महत्या करने की लीड दी गई। इसके आधार पर सुरक्षा व्यवस्था की गई। प्रयास था कि किसी भी शख्स को आत्मदाह करने नहीं दिया जाएगा। मगर हुआ उलटा। जान देने की बजाय वे जान लेने पर उतारू हो गए। ऐसी आग भड़काई गई कि पंजाब के बठिंडा, पटियाला, संगरूर, बरनाला, मानस, फिरोजपुर, राजकोट, मुक्तसर, मलोट, अबोहर और हरियाणा के पंचकूला, सिरसा और कैथल में कर्फ्यू लगाना पड़ गया। खुफिया विभाग ने आने वाले समय में डेरा अनुयायियों के पुलिस थानों पर हमला करने और पुलिसकर्मियों को बंधक बनाने की आशंका जताई है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह अपने प्रदेश को हिंसा से बचाने में सफल रहे। जबकि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल एक बार फिर इसमेंं फेल रहे। यह नाकामी उनके सियासी कॅरियर पर भारी पड़ सकती है। जिस तरह खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रकरण को लेकर बेहद चिंतित हैं और सरकार से पूरे प्रकरण पर रिपोर्ट मांगी है। ट्वीट कर घटना पर अफसोस जताते हुए कहा है कि उन्होंने गृहसचिव एवं एनआईए के अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी घटना पर चिंता जताई है। चूंकि मनोहरलाल मोदी की पसंद हैं, इसलिए उनकी कुर्सी पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है। घटना के एक दिन बाद तक प्रदेश भाजपा का एक भी बड़ा नेता या मनोहर मंत्रिमंडल का कोई सदस्य सरकार के बचाव में आगे नहीं आया। घटना के दिन केवल दो ही लोग जनता से शांति की अपील करते रहे। एक मनोहरलाल और दूसरे शिक्षा मंत्री राम विलास शर्मा। डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों की सूची में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज भी शामिल हैं, पर इस प्रकरण में उन्होंने बिल्कुल चुप्पी साधे रखी। प्रदेश जब जल रहा था तो मंत्रिमंडल के दो वरिष्ठ सदस्य फरीदाबाद के अपने-अपने कार्यक्रम में व्यस्त थे। इस प्रकरण में प्रदेश के कोटे से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल तीन सदस्यों की रहस्यमय चुप्पी भी काबिल-ए-गौर मानी जा रही है। इनमें से दो खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं।

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