सालेह की जीत भारत के लिए सुखद

डॉ. शफीक आलम
Wed, 15 May, 2019 15:14 PM IST

यूं तो मालदीव भारत के सुदूर दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर में बसा छोटे-छोटे द्वीप समूहों का एक छोटा सा देश है, लेकिन पिछले कुछ सालों में इस देश में चीन की गैर मामूली दिलचस्पी ने इसका सामरिक महत्व बढ़ा दिया है. दरअसल, चीन दक्षिण एशिया में अपने बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट पर बहुत आक्रामकता के साथ आगे बढ़ रहा है. नेपाल की पनबिजली परियोजनाओं, श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट एवं पाकिस्तान की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की तरह चीन ने मालदीव में भी करोड़ों डॉलर का निवेश किया है. भौगोलिक दृष्टि से निकटता के कारण राजनीतिक रूप से भी मालदीव भारत के करीब रहा है. जाहिर है, मालदीव में चीन की बढ़ती हुई गतिविधियां भारत के लिए ठीक नहीं हैं. इस पृष्ठभूमि में मालदीव में हुए चुनाव न केवल भारत, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

मालदीव की संसद ‘पीपुल्स मजलिस’ के लिए हुए चुनाव में राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सालेह की पार्टी मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) ने असाधारण जीत दर्ज की है. यह पहला मौका है कि 2008 में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के बाद पीपुल्स मजलिस में किसी एक पार्टी को बहुमत मिला हो. देश की 87 सदस्यीय संसद में राष्ट्रपति सालेह की पार्टी को 65 सीटें मिली हैं, जो पिछले चुनाव की तुलना में 39 ज्यादा हैं. इस चुनाव में एमडीपी के पक्ष में कितनी असाधारण लहर थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दूसरे नंबर पर रहीं दो पार्टियों, जम्हूरी पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव,को केवल पांच-पांच सीटें मिली हैं. यही नहीं, देश के कई बड़े दलों का खाता तक नहीं खुल पाया. अब सवाल यह उठता है कि आखिर मजलिस के चुनाव के महत्व क्या हैं? दरअसल, मालदीव में राष्ट्रपति शासन प्रणाली है. सरकार का मुखिया होने के नाते राष्ट्रपति ही वहां सभी शासनात्मक फैसले लेता है. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव वहां सीधे तौर पर गुप्त मतदान के जरिये पांच साल के लिए होते हैं. हालांकि, राष्ट्रपति अपनी कैबिनेट के सभी मंत्रियों का चुनाव खुद करता है, लेकिन अपने हर मंत्री के चुनाव पर उसे संसद की सहमति लेनी पड़ती है. लिहाजा, राष्ट्रपति सालेह को अपनी पसंद के मंत्री नियुक्त करने में अब किसी तरह की दुश्वारी पेश नहीं आएगी. वह स्वतंत्र रूप से फैसले ले सकते हैं.

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दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्रपति सालेह ने चुनाव अभियान के दौरान कहा था कि अगर उनकी पार्टी बहुमत हासिल कर लेती है, तो वह पूर्ववर्ती सरकार के ‘भ्रष्टाचार’ की जांच कराएंगे. इस चुनाव में इंडोनेशिया की तरह यहां भी चीन द्वारा संचालित परियोजानाएं एक बड़ा मुद्दा थीं. हालांकि, चुनाव से पहले जम्हूरी पार्टी, अदालत पार्टी और एमडीपी के बीच विपक्षी गठबंधन बनाने की कोशिश की गई, लेकिन सीटों पर सहमति न बन पाने के कारण सभी पार्टियां अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरीं. राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के खिलाफ जनाक्रोश था कि लोगों ने एमडीपी के पक्ष में एकतरफा मतदान किया. एक विशेषता यह भी रही कि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करार देने में देर नहीं की. बहरहाल, चुनाव जीतने के बाद सालेह ने कहा कि भले ही वह अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़े, लेकिन उन सभी दलों को साथ लेकर चलेंगे, जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में उनका साथ दिया था. गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में सालेह विपक्ष के साझा उम्मीदवार थे. उन्होंने अप्रत्याशित रूप से अब्दुल्ला यामीन को हराया था. यामीन, जो सत्ता हथियाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सब कुछ अपना चुके थे. यामीन ने पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताते हुए पिछले साल विपक्ष के सांसदों को पुन: स्थापित और जेल में बंद विपक्षी नेताओं को रिहा करने से इंकार कर दिया था. उस जीत के बाद राष्ट्रपति सालेह ने कहा था कि चुनाव में जीत का सफर उनके एवं साथियों के लिए बहुत मुश्किल था. बहुतों को जेल जाना पड़ा और कई बड़े नेता निर्वासन झेलने को मजबूर हुए. बहरहाल, मजलिस चुनाव में मिली शिकस्त पूर्व राष्ट्रपति यामीन के लिए दोहरी हार है. यामीन की शिकस्त में न सिर्फ मालदीव के विपक्ष की जीत है, बल्कि यह भारत के लिए भी अच्छी खबर है.

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भौगोलिक रूप से करीब होने के कारण मालदीव से भारत के बड़े मधुर संबंध रहे हैं. भारत पहले भी मालदीव की मदद कर चुका है. 1988 में श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों की मदद से जब मामून अब्दुल गयूम सरकार के तख्ता पलट की कोशिश की गई थी, तो भारत ने सैन्य कार्रवाई के जरिये उसे नाकाम कर दिया था. यामीन सरकार के कार्यकाल में जब मालदीव राजनीतिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था, तो वहां के विपक्षी नेताओं ने भारत से अपील की थी कि वह उसमें हस्तक्षेप करे. भारत और मालदीव के रिश्तों में दूरी का सबब भी यामीन थे. वह चीन से इतने नजदीक हुए कि लगभग भारत विरोधी हो गए. उन्होंने चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के तहत चीनी कंपनियों को करोड़ों डॉलर की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को मंजूरी दे दी थी. यही नहीं, उन परियोजनाओं पर उन्होंने चीन को ‘सोवरेन गारंटी’ भी दे डाली थी. पिछले साल सितंबर में नई सरकार आने के बाद से ही मालदीव से भारत के लिए अच्छे संकेत आने शुरू हो गए थे. राष्ट्रपति सालेह की जीत के बाद मालदीव के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा था कि अपनी ‘नेबरहुड फस्र्ट’ नीति के तहत मालदीव भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत बनाना और उसके साथ मिलकर काम करना चाहता है. विपक्षी नेता एवं पूर्व राष्ट्रपति नाशीद ने तो यहां तक कह दिया कि यामीन सरकार के कार्यकाल में मालदीव को चीन के हाथों बेचा जा रहा था. उनके आरोप को इस पृष्ठभूमि में भी देखना चाहिए कि जब नई सरकार ने चीन के निवेश का जायजा लिया, तो यह पता चला कि मालदीव चीन के कर्ज में डूबा हुआ है. एक अंदाज के मुताबिक, मालदीव पर चीन के 1.4 अरब डॉलर की उधारी है.

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हालांकि, नई सरकार आने के बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि मालदीव से चीन का प्रभाव समाप्त हो जाएगा. लेकिन, विदेश मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन से पीछा छुड़ाना मालदीव के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि वह 1.4 अरब डॉलर के कर्ज से इतनी जल्दी छुटकारा नहीं पा सकता. हां, यह जरूर हो सकता है कि यामीन के कार्यकाल में मालदीव के साथ भारत के रिश्तों में जो खटास आ गई थी, वह दूर हो जाएगी और चीन वहां अपनी मनमानी नहीं कर पाएगा.

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