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बच्चों में प्रोफेशनल किलर सी सोच

गुरुग्राम, लखनऊ और यमुनानगर की घटनाएं बताती हैं कि कैसे स्कूल में बच्चे प्रोफेशनल किलर की तरह ठंडे दिमाग से सोच समझ कर किसी की जान ले लेते हैं। देश के जाने माने मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख ने अजय विद्युत को बताया कि शहरी समाज में बच्चे इतने हिंसक कैसे बन रहे हैं और मां-बाप और स्कूल इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं।

हरियाणा के यमुनानगर में एक स्कूल में बारहवीं के एक छात्र ने महिला प्रिंसिपल को गोली मार कर हत्या कर दी। उसने कहा कि प्रिंसिपल उसे परेशान करती थी। हाल में लखनऊ के एक स्कूल में कक्षा छह की ग्यारह वर्षीय छात्रा ने कक्षा एक में पढ़ने वाले छह साल के छात्र को टॉयलेट में ले जाकर चाकू से कई वार किए। उसने कहा कि अगर में तुम्हें नुकसान पहुंचाऊंगी तभी स्कूल में छुट्टी होगी। इससे पहले गुरुग्राम के एक स्कूल में कक्षा दो में पढ़ने वाले सात साल के बच्चे के गले में स्कूल के ही ग्यारहवीं के छात्र ने टॉयलेट में चाकू से वार किए जिसमें उसकी जान चली गई। बाद में पता चला कि चाकू मारने वाला छात्र परीक्षा की तारीख आगे बढ़वाना चाहता था और उसे लगा कि अगर वह किसी बच्चे को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा तो टेस्ट की तारीख आगे बढ़ जाएगी। एक तो यह पैटर्न खतरनाक है और एक छोटा बच्चा अपने साथी की जान लेने पर आमादा हो जाता है- सिर्फ इसलिए कि उसे लगता है कि तभी स्कूल में छुट्टी मिलेगी या एग्जाम की डेट बढ़ जाएगी। वहीं एक किशोर ने गर्लफ्रेंड से वीडियो चैट करते हुए खुद को गोली मार ली।

ये घटनाएं बच्चों की मानसिकता में हिंसा के प्रति रुझान को बताती हैं।
मुझे लगता कि हमें जो बात समझनी है वह यह कि बच्चों में इस तरह की सोच कहां से आती है? इस तरह की सोच आती है बच्चों में जब वे टेलीविजन, अखबार, मीडिया, फिल्मों को देखते हैं- जिसे हम आॅब्जर्वेशनल लर्निंग कहते हैं- उसका बड़ा असर होता है। वो देखते हैं कि किसी ने कुछ किया और उसके कारण कुछ हुआ। अपराध की कोई घटना हुई। उसका बहुत असर होता है कि वे वहां पर कुछ चीजें सीखनी शुरू कर देते हैं। तो सोशल मीडिया में चीजों को कैसे रखते हैं, कैसे जिक्र करते हैं, डिस्कशन क्या है- जो बच्चे आब्जर्व कर रहे हैं उसको लेकर हमें बहुत सावधान रहने की जरूरत है।

क्या इसका अलग अलग बच्चे पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है?
हमें बच्चों की उम्र देखनी भी जरूरी है। कुछ बच्चों की उम्र ज्यादा होती है, उनके अंदर हो सकता है कुछ कॉन्डक्टिव ट्रेंड्स (प्रवाहकीय प्रवृत्तियों) आ रहे हों। कॉन्डक्टिव ट्रेंड्स कहते हैं जब बच्चों में संवेदनशीलता, दूसरे के प्रति लगाव आदि घटता जाता है- और जिनके व्यक्तित्व में ये चीजें आनी शुरू हो गई हैं। कुछ बच्चे जिनको ज्यादा समझ नहीं होती है लेकिन वे ऐसा सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि इससे उनको लगता है कि कुछ मिल जाएगा, वह एक अलग चीज है।

अब किया क्या जा सकता है… जो व्यावहारिक भी हो?
बच्चों में कनेक्ट इंपैथी, इसका मतलब है बच्चों का यह समझ पाना कि जब हम किसी को कुछ गलत करते हैं तो उसे तकलीफ होती है और उसकी तकलीफ को हम वैल्यू दें। और उसका हमें बुरा लगना चाहिए। तो अगर हम यह संवेदनशीलता बच्चों में नहीं ला पाते हैं तो यह हमारे शहरी समाज की खामी है। तो हमें बच्चों में कुछ सामाजिक मूल्य डालने चाहिए कि एक दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें, किसी को तकलीफ नहीं देना- इन बातों पर हमें काम करने की जरूरत है। …सोशल लर्निंग, स्किल बिल्डिंग और इंपैथी- इनकी कमी के कारण ये सब चीजें हो रही हैं।

जिसकी शादी होती है वह पैरेंट भी बन ही जाता है… क्या उनमें भी कुछ समझ जरूरी है?
पैंरेंटिंग में तो सबसे ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है। अभिभावक बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताएं और साथ ही बच्चों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करें कि वे अपने दादा दादी के साथ भी समय बिताएं तो वैल्यूज में फायदा होता है। पैरेंट को जानना चाहिए कि बच्चा किसी बात से परेशान है या दबाव महसूस कर रहा है। वे उसे पहचान कर उस समस्या के हल में उसकी मदद करें।
…और स्कूल?
और स्कूलों में भी हमें लगता है कि स्किल बिल्डिंग, सोशल स्किल, इंपैथी, रिलेशनशिप आदि बातों पर उन्हें भी काम करने की जरूरत है। जिससे कि बच्चे की पर्सनैलिटी पर मां बाप और स्कूल दोनों तरफ से पॉजिटिव काम हो।

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ओपिनियन पोस्ट एक राष्ट्रीय पत्रिका है जिसका उद्देश्य सही और सबकी खबर देना है। राजनीति घटनाओं की विश्वसनीय कवरेज हमारी विशेषज्ञता है। हमारी कोशिश लोगों तक पहुंचने और उन्हें खबरें पहुंचाने की है। इसीलिए हमारा प्रयास जमीन से जुड़ी पत्रकारिता करना है। जीवंत और भरोसमंद रिपोर्टिंग हमारी विशेषता है।
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