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राष्ट्रपति चुनाव- राष्ट्रपति की संस्था 67 साल के उतार-चढ़ाव

एन. के सिंह।

भारत 67 साल के गणतंत्र में आगामी 17 जुलाई को राष्ट्रपति के रूप में 14वें व्यक्ति को चुनेगा। 1950 की 26 जनवरी को औपचारिक रूप से संविधान लागू हुआ हालांकि दो माह पहले यानी 26 नवंबर, 1949 को ही संविधान को संविधान सभा ने अंगीकार कर लिया था। यही संविधान सभा संसद के रूप में तब्दील कर दी गई जिसने अगले दो साल तक काम किया। चूंकि पहले आम चुनाव में जिसमें देश की केंद्रीय विधायिका (लोकसभा) और राज्यों की विधायिकाएं अक्टूबर, 1951 से मार्च 1952 तक जनमत से चुनी गर्इं, लिहाजा राष्ट्रपति का औपचारिक चुनाव भी मई, 1952 में ही हो सका। राष्ट्रपति के चुनाव में संविधान के अनुच्छेद (54) के अनुसार राज्यों की विधानसभा के और संसद के दोनों सदनों के चुने हुए प्रतिनिधि ही आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर वोट देते हैं लिहाजा निर्वाचक मंडल आम चुनाव के बाद ही अस्तित्व में आ सका था।

राष्ट्रपति की संस्था और उसके अधिकार को लेकर इस संस्था के जन्म से ही विवाद रहा। लेकिन कभी भी ऐसी स्थिति नहीं आई जिसे प्रजातंत्र के लिए खतरे की संज्ञा दी जा सके। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पद पर तत्कालीन गवर्नर-जनरल सी राजगोपालाचारी (राजाजी) को बैठाना चाहते थे। इस आशय के लिए नेहरू ने प्रयास भी किया। लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल इस बात पर अड़ गए कि संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति होंगे। इसी बीच अक्टूबर, 1949 में जब नेहरू विदेश दौरे पर गए, पटेल ने केंद्रीय विधायिका के उत्तर भारत के सदस्यों से बातचीत की और उनमें से अधिकांश राजेंद्र प्रसाद के नाम पर सहमत हो गए। राजगोपालाचारी से उनकी नाराजगी इसलिए भी थी कि उन्होंने 1942 में गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ हो कर कांग्रेस से इस्तीफा दिया और अंग्रेजों के साथ खड़े दिखाई दिए।

बहरहाल, नेहरू कुछ मामलों में जिद्दी थे। उन्होंने राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखा, ‘हम महसूस करते हैं कि सामान्य परिवर्तनों के साथ वर्तमान व्यवस्था (अर्थात गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी को नए पद नाम ‘राष्ट्रपति’ के साथ) बहाल रहनी चाहिए। इससे शासन व्यवस्था कम से कम परिवर्तनों के साथ बरकरार रहेगी। साथ ही इस स्टेज पर राजाजी को बाहर करना उनके उत्कृष्ट कार्यांे पर पानी फेरने जैसा दिखेगा। और यह दुर्भाग्यपूर्ण भी माना जाएगा।’ इस पर राजेंद्र प्रसाद का जवाब था, ‘आप के अनुसार मेरे राष्ट्रपति बनने से शासन में काफी फेर बदल और पुनर्संयोजन करना पड़ेगा और यह भी कि इसे राजाजी के कार्यों की अनदेखी समझा जाएगा। मेरी समझ में नहीं आता कि बदलाव और पुनर्संयोजन से परहेज क्यों किया जाना चाहिए जबकि पूरा संविधान जो हम इतने साल से बनाते रहे हैं इसी परिवर्तन का संवाहक है… किसी व्यक्ति को दोबारा पदासीन न करने से उसके कार्यों की अनदेखी कैसे हो जाएगी जबकि उसका कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि दरअसल मेरा इतने साल संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में रहने के बाद भी राष्ट्रपति न बनना मेरे कार्यों की अनदेखी है और वह भी जब मैं खुद शुरू से ही इस प्रक्रिया से बाहर रहना चाहता था।’

इस बीच पटेल ने अपनी स्थिति साफ कर दी कि वह नेहरू की राय से सहमत नहीं हैं। नेहरू इस बीच अमेरिका और ब्रिटेन के दौरे पर चले गए। लौट कर स्वदेश आने पर नेहरू को यह बात पता चली तो उन्होंने पटेल को यह पत्र लिखा, ‘मुझे पता चला है कि (राष्ट्रपति के प्रत्याशी को लेकर) काफी कैन्वेसिंग की गई है और यह भी कि बहुमत राजेंद्र बाबू के पक्ष में है। यह केवल राजेंद्र बाबू का समर्थन करने की बात नहीं है बल्कि जानबूझ कर राजाजी (राजगोपालाचारी) को बाहर रखने का भी प्रयास है।’

पटेल ने इस पर जवाब दिया, ‘स्थिति बहुत जटिल और परेशान करने वाली है। माहौल बदबूदार हो चुका है। और मुझे अफसोस है कि षड्यंत्र के किस घिनौने स्तर तक हमने अपने आप को गिरा लिया है।’ नेहरू ने फिर भी हार नहीं मानी और राजाजी को राष्ट्रपति के रूप में प्रतिष्ठापित करने का आखिरी प्रयास करते हुए 8 दिसंबर, 1949 को सीधे डॉ. राजेंद्र प्रसाद को एक पत्र लिखा, ‘देश के लिए और साथ ही कांग्रेस के लिए यह एक अजीब कष्टप्रद दृश्य होगा कि दो बड़े कद्दावर नेता एक दूसरे के खिलाफ खड़े होंगे… हमारे पास जवाब नहीं होगा। यह निश्चित है कि केवल दो नेताओं-आप और राजाजी- में से ही राष्ट्रपति चुना जाना है। …आप दोनों में से एक को यह ऐलान करना होगा कि वह चुनाव की होड़ में नहीं है। मैं आप का आभारी रहूंगा अगर मुझे इस पर अपनी सलाह दें।’

राजेंद्र बाबू ने तत्काल जवाब भेजा, ‘मैं पूरी तरह सहमत हूं कि भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति के मामले में तत्काल फैसला लेना होगा। …सही या गलत जो भी कारण हो, अधिकांश सदस्य इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मैं राष्ट्रपति बनूं। ऐसा लगता है कि अगर मैंने उनकी भावनाओं को नजरअंदाज करते हुए यह प्रस्ताव नहीं माना तो वे इसे अपने साथ एक धोखा मानेंगे। मैं जो अनुमान लगा पा रहा हूं वह यह कि अगर मैं रास्ते से हट भी जाऊं तो राजाजी का चुना जाना सहज नहीं होगा।’

बहरहाल, राजेंद्र प्रसाद का दूसरा कार्यकाल बेहद सहज रहा क्योंकि उन्होंने भी नेहरू की नेतृत्व क्षमता को मान लिया। रूस दौरे की ऐतिहासिक सफलता के बाद पूरे देश में नेहरू की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता की लहर चल रही थी। इसी लहर में बहते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने दोबारा चुने जाने के लगभग डेढ़ साल पहले ही नेहरू को भारत रत्न देने की इतनी हड़बड़ी दिखाई कि कई परंपरागत प्रोटोकॉल भूल गए। यह अलग बात है कि नेहरू प्रसाद को दोबारा नहीं चुनने देना चाहते थे और उप-राष्ट्रपति राधाकृष्णन को ही राष्ट्रपति बनाना चाहते थे लेकिन इस बार भी कांग्रेस संसदीय दल में प्रसाद का जबरदस्त समर्थन रहा।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के राष्ट्रपति पद के प्रथम पांच साल में दो ऐसी तनाव की घटनाएं हुर्इं जिन्होंने राष्ट्रपति-कार्यपालिका के संबंधों को प्रभावित किया। पहली थी राजेंद्र प्रसाद का नेहरू के स्पष्ट रूप से मना करने के बावजूद सोमनाथ मंदिर जाना और दूसरा हिंदू कोड बिल पर अपनी मुहर न लगाना। पहले मामले में नेहरू कैबिनेट के मंत्री के.एम. मुंशी, जो कि सोमनाथ मंदिर जीर्णोद्धार समिति के अध्यक्ष भी थे, मंदिर के कायाकल्प के बाद राष्ट्रपति से उद्घाटन करने का आग्रह करने गए जिसे राजेंद्र प्रसाद ने तत्काल स्वीकार कर लिया। नेहरू आग बबूला हो गए क्योंकि उन्हें यह राज्य के ‘धर्मनिरपेक्ष’ स्वरूप से बिलकुल अलग लगा। नेहरू ने पहले तो मुंशी को पत्र लिख कर लताड़ा जिसका उतना ही सख्त जवाब मुंशी ने भी दिया। फिर राजेंद्र प्रसाद से न जाने की बात कही। बहरहाल नेहरू की नहीं चली।

हिंदू कोड बिल पर तो संवैधानिक प्रश्न उठ खड़ा हुआ। राष्ट्रपति का कहना था कि एक तो उस समय की संसद प्रतिनिधि स्वरूप नहीं रखती क्योंकि संविधान सभा ही संसद के रूप में काम कर रही थी। दूसरा प्रसाद का मानना था राष्ट्रपति कार्यपालिका की हर सलाह मानने को बाध्य नहीं है। उन्होंने नेहरू को पत्र लिखा : ‘इस मामले में मंत्रिमंडल की राय मानने को बाध्य नहीं हूं। फिर वर्तमान संसद अस्थायी है और चुन कर नहीं आई है लिहाजा मैं इस संसद की राय मानने को बाध्य नहीं हूं।’ इस पर नेहरू ने प्रसाद को लिखा, ‘हमारी राय में राष्ट्रपति के पास इस विधेयक के मामले में संसद की इच्छा के विरुद्ध जाने की कोई शक्ति नहीं है। संवैधानिक सरकार की अवधारणा के मूल में ही यह बात विहित है कि राष्ट्रपति उसकी राय के खिलाफ नहीं जा सकता। जहां तक इस संसद (अस्थायी) की शक्तियों का सवाल है इस मुद्दे पर स्पीकर ने अपनी व्यवस्था पहले ही दे दी है और यह संसद पूरी तरह विधेयक बनाने के लिए सक्षम है।’

इसके बाद के राष्ट्रपतियों का कार्यकाल बगैर विवाद के चलता रहा। और राजनीतिक नैतिकता में गिरावट आती रही। आपातकाल लगाने के आदेश पर इंदिरा गांधी ने दबाव डाल कर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत तो करवा लिए, लेकिन बदनाम 42वें संविधान संशोधन के तहत राष्ट्रपति को बाध्य किया गया कि वह संसद में पारित किसी भी विधेयक पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर करने को मजबूर हो। दो साल बाद जब मोरारजी के नेतृत्व में जनता सरकार आई तो उसने इस संशोधन में मात्र इतना बदलाव किया कि अब राष्ट्रपति किसी भी विधेयक पर हस्ताक्षर करने को मजबूर तो होगा लेकिन एक बार वह उस विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद के पास भेज सकता है।

भारत के अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा विवाद राष्ट्रपति जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच रहा जिसकी अनुगूंज गली-कूचों तक सुनी गई। लेकिन इससे पहले इंदिरा गांधी की नीति पर कुछ प्रकाश डालना जरूरी है। 1969 में इंदिरा गांधी ने निजलिंगप्पा से झगड़े के बाद पहली बार पार्टी में दो फाड़ का मार्ग प्रशस्त किया। नीलम संजीव रेड्डी औपचारिक कांग्रेस प्रत्याशी घोषित किए गए लेकिन इंदिरा गांधी उन्हें हरा कर पार्टी के विरोधी पक्ष को संदेश देना चाहती थीं। वी.वी. गिरी को स्वतंत्र रूप से खड़ा किया गया और इंदिरा गांधी ने देश भर के सभी कांग्रेस सांसदों और विधायकों को ‘अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने को कहा।’ गिरी जीत गए। इंदिरा गांधी का वर्चस्व कायम रहा। ज्ञानी जैल सिंह उस चाटुकारिता के तब प्रतीक बन गए जब इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाए जाने पर इस सिख नेता ने कहा, ‘अगर श्रीमती गांधी कहें तो मैं झाड़ू-पोछा भी लगाने को तैयार हूं। बहरहाल इंदिरा गांधी की हत्या के समय राष्ट्रपति जैल सिंह विदेश में थे और तत्काल वापस आ गए। रास्ते में अफसरों से उन्होंने कहा कि वह राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ के लिए आमंत्रित करेंगे। इस पर कुछ अफसरों ने सलाह दी कि कांग्रेस संसदीय पार्टी की राय ले ली जाए तो बेहतर रहेगा। सिंह इतने आतुर थे कि उन्होंने अफसरों से कहा, ‘संसदीय पार्टी कुछ भी कहे मैं तो राजीव को ही शपथ दिलवाऊंगा क्योंकि मेरे राष्ट्रपति पद पर चुने जाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है।’ और हुआ भी वही। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने।

लेकिन डेढ़ साल के भीतर ही दोनों के बीच संबंध इतने खराब हो गए कि राजीव गांधी के इशारे पर केपी तिवारी सरीखे लोग संसद में आरोप लगाने लगे कि राष्ट्रपति भवन में खालिस्तानी आतंकवादी शरण ले रहे हैं। सरकार ने जैल सिंह को विदेश यात्रा की अनुमति देना बंद कर दिया। परंपरा है कि प्रधानमंत्री विदेश यात्रा से लौटने के बाद राष्ट्रपति को ब्रीफ करता है पर राजीव गांधी दो साल तक राष्ट्रपति भवन नहीं गए। मंत्री भी राष्ट्रपति के बुलाने पर नहीं जाते थे। प्रतिक्रिया में राष्ट्रपति भवन विपक्ष के नेताओं का अड्डा बना। इसी बीच सरकार डाक विधेयक ले कर आई। इसके प्रावधान का आशय सरकार को किसी की भी चिट्ठी खोल कर पढ़ने के अधिकार देने का था। जैल सिंह ने इस विधेयक को न तो लौटाया न ही दस्तखत किए। दरअसल, संविधान में राष्ट्रपति दोबारा हस्ताक्षर करने को बाध्य तो है पर संविधान यह नहीं बताता कि राष्ट्रपति किसी विधेयक पर कितने दिन के भीतर हस्ताक्षर करे।

के.आर. नारायणन देश के पहले दलित राष्ट्रपति थे। अपने कई फैसलों से उन्होंने इस संस्था की गरिमा बढ़ाई। गुजराल सरकार 22 अक्टूबर,1997 को उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त करना चाहती थी पर नारायणन ने इस पर पुनर्विचार करने की संस्तुति की। फिर जब वाजपेयी सरकार ने 25 सितंबर, 1998 को बिहार की राबड़ी सरकार को बर्खास्त करने की अनुशंसा पर राष्ट्रपति की मुहर चाही तो नारायणन ने इस पर पुनर्विचार करने को कहा।

वहीं स्वर्गीय डॉ. अब्दुल कलाम ने अपने राष्ट्रपति काल में पहली बार एक गलती की जब उनसे उनकी मास्को यात्रा के दौरान आधी रात को बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने के आदेश पर हस्ताक्षर करवाए गए। लेकिन तत्काल बाद उन्हें यह अहसास हुआ कि राष्ट्रपति को अपने विवेक से सही-गलत देखने और तदनुसार निर्णय लेने की क्षमता है। जब सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को असंवैधानिक ठहराते हुए राज्यपाल बूटा सिंह और केंद्र सरकार के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी की तो कलाम ने इसे अपने ऊपर आक्षेप मानते हुए इस्तीफा देने का मन बना लिया था। हालांकि बाद में कुछ कानूनविदों की सलाह पर इस विचार को त्याग दिया। यह बात उनके प्रेस सलाहकार ने कुछ साल बाद एक मीडिया साक्षात्कार में बताई। लिहाजा जब कांग्रेस सरकार ने आॅफिस आॅफ प्रॉफिट विधेयक सदन से पास करवा कर राष्ट्रपति के पास भेजा तो कलाम ने संविधान के तमाम जानकार जैसे वी.एन. खरे (भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश) से सलाह ली और बिल कुछ सलाह के साथ पुनर्विचार के लिए वापस कर दिया। वास्तव में अगर कलाम उस बिल पर संस्तुति कर देते तो वह एक गलत कदम होता क्योंकि उसमें कुछ लोगों को जो पद पर रहते हुए लाभ के अन्य पदों पर काबिज थे, संविधान के प्रावधानों से बचाया जा रहा था जबकि अन्य लोगों की सदस्यता पर आंच आ रही थी।

कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा पेश किया। बताया जाता है कि जब पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी राष्ट्रपति से मिलने पहुंचीं तो कलाम ने उनका ध्यान उनकी भारतीय नागरिकता की ओर दिलाया। दरअसल, उस समय सोनिया गांधी की भारत की नागरिकता ‘नेचुरलाइज्ड’ श्रेणी की थी जो कि भारतीय नागरिकता कानून की सात श्रेणियों में सबसे कमजोर श्रेणी की थी। यह अलग बात है कि अगले दो सालों में सोनिया गांधी ने इसे बदलवा कर मजबूत श्रेणी में करवा लिया। इसी बीच वाजपेयी सरकार ने भी कानून में संशोधन कर दिया। कुल मिला कर राष्ट्रपति की संस्था भारत में पिछले 67 सालों से एक वाचडॉग का काम कर रही है और प्रजातंत्र को मजबूती की ओर ले जाने में मददगार है।

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