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पद्मावत की रचना भूमि में सन्नाटा

संजय लीला भंसाली की फिल्म पदमावती को लेकर देशभर में भले ही शोर शराबा मच रहा है लेकिन जिस रचना पर इस फिल्म को बनाने का दावा किया जा रहा है उसके लेखक की जन्मभूमि न सिर्फ उपेक्षित है बल्कि यहां के लोग इस विवाद पर बात तक करना नहीं चाहते।

उमेश सिंह

कुल जमा नींद तकरीबन 475 बरस। अमेठी राजमहल के पास रामनगर। यहां कोई सामान्य आदमी नहीं लेटा हुआ है। पदमावत, अखरावट और आखिरी कलाम का सर्जक है यह। रहस्यमयी सूफी दर्शन की 22 पुस्तकों का रचयिता है यह। पूरब के अवध की बोली-बानी का ताप है यह। यह मलिक मोहम्मद जायसी मजार है। सूफियाना मस्ती का यह फकीर चुपचाप और शांत भाव में यहीं लेटा हुआ है। नश्वर काया गई तो स्थानीय स्तर पर दुखजनित सन्नाटा पसरा होगा। पौने पांच सौ बरस बाद उनकी पदमावत सुर्खियों में है। दिल्ली से लेकर मुंबई तक का मिजाज गर्म है लेकिन जिस जमीं पर इसकी रचना हुई वह स्थान विवाद व ताप से बेखबर है। परिधि में जबर्दस्त हलचल है और नाभिकेंद्र में शांति। यह कबीरदास की उलटी बानी जैसा लग रहा है लेकिन यह सच है। नींद में अलसाया छोटा सा कस्बा जायस और बाजार रामनगर में पदमावती पर चर्चा करने का वक्त किसी के पास नहीं, हर ओर सिर्फ चुनावी शोर।

सुबह की किरण फूटी ही थी कि फैजाबाद जिले से अमेठी के जायस पहुंच गया। यह कस्बा नींदजनित खुमारी से बाहर निकल रहा था अलसाया सा। सूरज अपनी किरणों से जगा रहा था लेकिन घना कोहरा सूरज की राह में बाधा डाल रहा था। सामने दिखा मलिक मोहम्म्द इंटर कॉलेज। पकी दाढ़ी-बाल में बुजुर्ग मिले। जायसी का घर पूछा तो इशारों में नहीं जानने का संकेत दे दिया। आगे तिराहे पर दो युवा मिले तो बोल पड़े, चुनाव पर बात कीजिए। कौन से कवि और कौन पदमावती? चुनाव में सिर्फ दो दिन ही बचे हैं, अभी कई घरों पर जाना है। इससे आगे कुछ ही कदम पर मदरसा के पास साइकिल से जा रहे बुजुर्ग को रोककर पूछा तो बोल पड़े, ‘हम का जानी’। ठीक उसी वक्त मोहम्म्द अयूब अंसारी मिल गए। झट कहा, ‘चलिए हमारे साथ, कंचाना कला में ही हमारा ननिहाल है जहां जायसी पैदा हुए थे।’ मुख्य सड़क से सैदाना की ओर मुड़ गए। सैदाना दो भागों पूर्वी और पश्चिमी में बंटा है जो प्राचीन टीले पर स्थित है। इसी पूर्वी टीले के एक हिस्से को कंचाना कला कहते हैं जहां पर मलिक मोहम्म्द जायसी पैदा हुए थे। तंग गली जाती है जायसी के जन्मस्थान की ओर। जन्मस्थली के सामने एक ही परिसर में मस्जिद और इमामबाड़ा दोनों हैं। लाखौरी इंटी के ध्वंसावशेष जन्मस्थली के चारों ओर बिखरे पड़े हैं। इसी में कहीं-कहीं पर आधुनिक रंगरूप के मकान भी हैं।

जायसी ने हिंदी साहित्य को पदमावत जैसा जगमगाता हीरा दिया। उनकी पैदाइश भूमि पर तत्समय में जो भी रहा हो, अब उसके निशान मिट चुके हैं। वह स्थान स्मारक बन गया है। वर्ष 1988 में लगा राजीव गांधी का शिलापट मौजूद है पर उस पर लिखी इबारतें मिट रही हैं। स्मारक को पग-पग पर सांस्कृतिक गौरवबोधहीनता जकड़े हुए है। इमरान अली, अशरफ, असरान, कैश और दानिश आदि बच्चे वहां क्रिकेट खेल रहे थे। स्टंप के तौर पर स्मारक के र्इंट-पत्थर लगा रखे थे। पिलर के ऊपर लगाए गए पत्थर या तो निकल गए हैं या फिर निकाल लिए गए हैं। जायसी का परिचय देता हुआ तीन स्तंभ एक साथ लगे थे लेकिन मौके पर सिर्फ हिंदी में लिखा ही बचा है। अन्य दोनों स्तंभ पर लिखी इबारतें पत्थर सहित गायब है। कई जगहों पर जूट के बोरे फैलाए गए थे और फर्श पर इतनी गंदगी बिखरी थी कि महसूस हुआ कि महीनों से यहां साफ-सफाई नहीं हुई है। सोलर लाइट के दो बल्ब ही जल रहे थे जबकि शेष दो खुद ही प्रकाशहीन हो चुके हैं। यूं ही बेखबरी रही तो जायसी के पैदाइश स्थल को भविष्य की पीढ़ी के लिए खोजना मुश्किल हो जाएगा।

मोहम्मद अयूब अंसारी ने स्मारक से सटे मकानों का परिचय देते हुए कहा कि पीछे के हिस्से में सफेद चूना लगा जो भवन है वह झारखंड के पूर्व राज्यपाल मोहम्मद शिब्ते रिजवी का है। इसके अलावा फिरोज कुरैशी, सन्नन मियां, अरशद भाई और गुलाम हैदर आदि का मकान है। चाय की दुकान चलाने वाले अरशद भाई ने बताया कि पहले लोहे की जाली से स्मारक को घेरा गया था जिसे अब चारदीवारी की शक्ल दे दी गई। प्रेमाश्रई धारा के निर्गण भक्तिमार्गी महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी की जन्म तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। चौदहवीं शताब्दी में उनका जन्म जायस में हुआ। नाम में जायसी शब्द का प्रयोग उनके उपनाम की भांति किया जाता है। यह इस बात को सूचित करता है कि वह जायस के निवासी थे। ‘आखिरी कलाम’ में जायसी खुद कहते हैं, ‘जायस नगर मोर अस्थानू/ नगरक नांव आदि उदयानू/ तहां देवस दस पहुने आएउं/ भा वैराग बहुत सुख पाएउं’ यानी इस नगर का प्राचीन नाम उदयान था, यहीं पर उन्होंने अपना नश्वर शरीर प्रारंभ किया था। इसे उद्याननगर या उज्जालिक नगर भी कहा जाता था। उपनिषद् काल के ऋषि उद्दालक यहां पर आश्रम बना कर रहते थे। इस स्थान को कंचना खुर्द भी कहा गया है जिसे मौजूद समय में बोलचाल में कंचाना कला कहा जाता है।

यहीं के पूर्व पहलवान 80 वर्षीय चांद मोहम्मद ने बताया कि पुराना नाम सैदाना था और गौरी सवार भी जो अब कंचाना कला हो गया। इसी से कुछ दूरी पर जायसी का खेत-खलिहान और तालाब था। वे ज्यादातर वक्त वहीं रहते थे। वे अकेले भोजन नहीं करते थे। एक अजनबी भोजन में उनका साथ देने के लिए आया। त्वचा रोग के कारण उसके हाथ से खून व मवाद रिस रहा था। उसने कहा- मेरे साथ खाएंगे। जायसी ने मन से खीर खाई लेकिन वह खीर खून से लाल हो गई थी। यह घड़ी उनके लिए परीक्षा काल थी जिसमें वह कामयाब हुए क्योंकि अजनबनी व्यक्ति कोई और नहीं, पैगंबर थे। इसके बाद जायसी ने अजीबोगरीब रूहानी हरकतें शुरू कर दी। अमेठी के राजा को पता चला तो वे उन्हें अपने साथ रामनगर लेकर चले गए जहां उनकी मृत्यु हुई। जायस में महाकवि के परिवार और उनकी मृत्यु को लेकर तरह-तरह की चर्चा प्रचलित हैं। दूरभाष पर शायर फलक जायसी ने बताया कि साहित्य जगत पर कुछ बोलने के लिए फ्री माइंड होना चाहिए। चुनाव का समय है, किससे बात करें और किससे न करेें। मैं तो जायस से 20 किलोमीटर दूर हूं।

रामनगर स्थित जायसी की मजार शांति के आगोश में थी। दरगाह हजरत मलिक मोहम्म्द जायसी के गद्दीनशीन सैयद मोहम्म्द मुईन शाह बाजार गए हुए थे। उनकी पत्नी ने बताया कि रविवार को कम ही लोग यहां आते हैं। दरगाह से बाहर निकलते ही डिग्री कॉलेज के शिक्षक डॉ. प्रभाकर पांडेय, डॉ. जितेंद्र पांडेय, डॉ. नीलमणि सिंह, डॉ. विमल चंद्र पांडेय आदि मिल गए जो वहां मत्था टेकने आए थे। किसान डिग्री कॉलेज के शिक्षक डॉ. प्रभाकर पांडेय ने कहा कि जायसी अवध की शान हैं। यहां की बोली-बानी को उन्होंने पदमावत, अखरावट और आखिरी कलाम के जरिये नई ऊंचाई दी।

प्रेम का महाकाव्य पदमावत
‘सन नरे सौं तैतालीस अहा/ कथा आरंभ बैन कवि कहा/ सिंहल द्वीप पदमिनी रानी/ रतनसेन चितउर गढ़ आनी/ अलाउद्धीन देहली सुल्तानू/ राघव चेतन कीन्ह बखानू/ सुना साहि गढ़ छेंकन आई/ हिंदू तुरकन्ह भई लराई/ आदि अंत जस गाथा अहै/ लिखि भाषा चौपाई कहे।’ यानी आदि से अंत तक जैसी गाथा है, उसे वे प्रस्तुत कर रहे हैं। अवधी भाषा के इस उत्तम काव्य में मानव जीवन के चिरंतन सत्य प्रेम तत्व की उत्कृष्ट कल्पना है। यह मूलत: प्रेमकथा का मर्म है। ‘गाढ़ी प्रीति नैन जल भेई’ यही प्रेम रतनसेन और पदमावती दोनों के जीवन का अंतर्यामी सूत्र है। पदमावत में सूफी और भारतीय सिद्धांतों के समन्वय का सहारा लेकर प्रेम पीर की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की गई है। पदमावत हिंदी भाषा के प्रबंध काव्यों में शब्द अर्थ और अलंकृत तीनों दृष्टियों से अनूठा काव्य है। इसमें श्रेष्ठतम प्रबंध काव्यों के सभी गुण हैं। धार्मिक स्थलों की बहुलता, उदात्त लौकिक और ऐतिहासिक कथा वस्तु, भाषा की अत्यंत विलक्षण शक्ति, जीवन के गंभीर सर्वांगीण अनुभव, सशक्त दार्शनिक चिंतन आदि इनकी अनेक विशेषताएं हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय प्रताप सिंह ने कहा कि जायसी ने पदमावत का कथानक अमीर खुसरो के ‘खजाएं-उल फतूह से लिया था।’
कलाएं आनंदवर्धन, रसरंजन, लोकरंजन, लोकमंगल और लोक मर्यादित हों तो बेहतर है। इतिहास में यदि मिथ तत्व हो तब भी उसे तोड़ा-मरोड़ा न जाए। चूंकि सदियों से जन मानस में जो मिथक है वह सत्य भले न हो लेकिन सत्य जैसा लगने लगता है। सिनेमा बाजार सत्य, आर्दश आदि के सापेक्ष खनखनाते सिक्कों को ज्यादा प्यार करता है। इसी से विवाद पैदा होता है और विवाद से दर्शक संख्या बढ़ती है, मुनाफा बढ़ता है। सिनेमा बाजार के लिए मुनाफा मोक्ष पाने जैसा है। इतिहास बोध राष्ट्र निर्माण का अहम अध्याय है। भारत में खिलजी वंश की शुरुआत जलालुद्दीन खिलजी से हुई जिनके पूर्वज तुर्किस्तान से आए थे। अलाउद्दीन खिलजी कड़ा मानिकपुर व अवध का सूबेदार रहा। ख्यातिलब्ध इतिहासकार डॉ. एएल श्रीवास्तव, सर बूज्ले हेग और वीए स्मिथ ने अलाउद्दीन खिलजी के शासन को बेहतर नहीं बताया है। फिल्मकार संजय लीला भंसाली को इन तथ्यों का ज्ञान जरूर होगा। इतिहास की प्राणधारा सत्य और मूल्य है। जबकि अकसर देखने में आता है कि बाजार मुनाफे के फेर में सत्य से मुंह मोड़ लेता है।

इतिहास बताता है कि अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को घेरा था। जन मानस में ऐसी मान्यता है कि वह राणा रतन सिंह की पत्नी पद्मिनी को पाना चाहता था। अमीर खुसरो ने अपनी आंखों से युद्ध देखा था। खुसरो ने लिखा है कि एक की लड़ाई में इतना भीषण रक्तपात हुआ कि हजारों राजपूत मारे गए। जीत के बाद चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रख दिया गया। रानी पद्मिनी भी युद्ध में शामिल थीं और हजारों राजपूत स्त्रियों के साथ उन्होंने जौहर किया। पता नहीं कि पदमावती इतिहास की पात्र हैं या नहीं लेकिन वह बहुसंख्यकों में श्रद्धा, आस्था, विश्वास, जौहर, पतिव्रता, वीरता, अदम्य साहस का प्रतीक हैं जो भारत के बहुसंख्यक जनमानस को सदियों से मथती रही है। इतिहास के गौरवबोध के उज्जवल प्रतीकों को अर्थ लाभ के लिए नृत्यरत करा देना क्या न्यायोचित है? इतिहासकार डॉ. हरिप्रसाद दुबे ने कहा कि फिल्म को प्रचारित करने के लिए यह एक षड़यंत्र है। एक पिक्चर से क्या होगा? वह दिखा ही दी जाएगी तो क्या हो जाएगा। दोनों पक्ष सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में लगे हुए हैं। योग्यता, पारदर्शिता, सत्य और न्याय को नकारने के लिए।

जमींदार परिवार के थे जायसी
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि मलिक मोहम्म्द जायसी, मलिक वंश के थे। मलिक अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ स्वामी, राजा, सरदार होता है। जबकि फारसी में मलिक का अर्थ अमीर व बड़ा व्यापारी होता है। मिस्र में मलिक सेनापति व प्रधानमंत्री को कहते थे जबकि ईरान में जमींदार को मलिक कहते हैं। कवि जायसी के पूर्वज मूलत: ईरान से आए थे। ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ में 12 हजार रिसालदार को मलिक कहा जाता था। जायसी के पिता का नाम मलिक शेख ममरेज जिनको लोग मलिक राजे अशरफ भी कहते थे। मां मनिकपुर के शेख अलहदाद की पुत्री थी। ये मामूली जमींदार थे तथा खेती करते थे। स्वयं जायसी भी खेती से जीविका निर्वहन करते थे। उनमें गुरु के प्रति अगाध आस्था थी। उन्होंने गुरु परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा है कि सैयद अशरफ सच्चे फकीर थे जो मेरे उज्ज्वल पथ के प्रदर्शक बने। उन्होंने प्रेम का दीप जलाकर मेरा ह्दय निर्मल कर दिया।

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