किसी की राह आसान नहीं

वामपंथ को उखाड़ कर समाजवाद स्थापित करने वाले मगध की जहानाबाद संसदीय सीट काफी ‘हॉट’ मानी जाती है. यूं तो राज्य में कई लोकसभा क्षेत्र भूमिहार बहुल हैं, लेकिन भूमिहार राजनीति का पैमाना नापने का थर्मामीटर जहानाबाद के पास है. बेगूसराय, नवादा एवं मुजफ्फपुर के अलावा भी कई क्षेत्रों में भूमिहार वोटरों की बहुलता है. रामाश्रय सिंह ,महेंद्र प्रसाद उर्फ किंग महेंद्र, जगदीश शर्मा, राम यतन प्रसाद सिन्हा, अभिराम शर्मा एवं अरुण कुमार पिछले चार दशकों से यहां की भूमिहार राजनीति के केंद्र में रहे हैं. यहां के प्रगतिशील वोटरों ने आजादी के बाद कांग्रेस और फिर वामपंथी विचारधारा को फलने-फूलने का मौका दिया, नतीजतन यादव जाति के रामाश्रय प्रसाद सिंह चार बार यहां से सांसद हुए.

 

साल 1996 के बाद जहानाबाद ने अपना वामपंथी लबादा उतार फेंका और समाजवाद अपना लिया. पिछले चार दशकों से यहां दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा एवं कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की सहयोगी रही हैं. अब तक राजद गठबंधन यादव, तो भाजपा गठबंधन भूमिहार उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारता रहा है, लेकिन इस बार एनडीए में शामिल जदयू ने अति पिछड़ा वर्ग के चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी को उम्मीदवार बनाकर एक नया समीकरण रचने का प्रयास किया है. यादव, भूमिहार, राजपूत एवं मुस्लिम बहुल इस लोकसभा क्षेत्र में एनडीए का वोट बैंक यानी अगड़ी जाति के वोटर खामोशी के साथ चुनावी स्थिति भांपने में लगे हैं. साल 2014 में एनडीए उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने वाले रालोसपा के अरुण कुमार इस बार अपनी नवगठित रालोसपा (सेकुलर) से चुनाव मैदान में हैं. उनकी नजर एनडीए द्वारा उपेक्षित भूमिहारों के साथ-साथ अन्य अगड़ी जातियों के वोटरों पर है. अरुण समर्थकों का कहना है कि राजद से नाराज चल रहे स्थानीय यादव वोटों का लाभ भी उन्हें मिलेगा. राजद ने एक बार फिर गया जिले के बेलागंज से राजद विधायक सुरेंद्र प्रसाद यादव को यहां से महागठबंधन का उम्मीदवार बनाया है, वह चौथी बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं. साल 1998 में वह 13 महीने के लिए सांसद बने थे. उसके बाद उन्हें सफलता नहीं मिली.

स्थानीय राजद नेताओं का कहना है कि एक ही चेहरे को बार-बार उम्मीदवार बनाना कहां तक उचित है. तेज प्रताप ने भी सुरेंद्र प्रसाद की उम्मीदवारी का विरोध किया और लालू-राबड़ी मोर्चा से चंद्र प्रकाश यादव को उम्मीदवार घोषित कर दिया. राजद उम्मीदवार सुरेंद्र यादव की नजर एमवाईसमीकरण के अलावा राजपूत और दलित वोटों पर भी है. जदयू उम्मीदवार चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी एनडीए के वोट बैंक के अलावा महादलित एवं अति पिछड़ा वर्ग के वोटरों से उम्मीद बांधे हुए हैं. अरुण समर्थक पिछड़ा बनाम अगड़ा राजनीति को हवा देने में जुटे हैं. अरुण अगर इसमें सफल हो गए, तो जहानाबाद का चुनाव परिणाम चौंकाने वाला हो सकता है. क्षेत्र के भूमिहार वोटरों के बीच यह भी चर्चा चल रही है कि अगर नीतीश का प्रयोग जहानाबाद में सफल हो गया, तो फिर कोई पार्टी भूमिहारों को यहां से लोकसभा का टिकट नहीं देगी. अरुण इसी स्थिति का लाभ लेना चाहते हैं. महागठबंधन और एनडीए के उम्मीदवारों के लिए इस बार संसद की राह आसान नहीं है. क्षेत्र में तीन जिलों गया, जहानाबाद एवं अरवल की छह विधानसभा सीटें अरवल, कुर्था, जहानाबाद, घोसी, मखदूमपुर एवं अत्रि शामिल हैं. 2014 में रालोसपा से जीते अरुण कुमार को 3,22,647 और दूसरे स्थान पर रहे राजद के सुरेंद्र प्रसाद यादव को 2,80,307 वोट मिले थे. 2009 में जदयू से जीते जगदीश शर्मा को 2,34,769 और राजद के सुरेंद्र यादव को 2,13,442 वोट मिले थे. इसी तरह 2004 में राजद से जीते गणेश प्रसाद यादव को 4,00,063 और दूसरे स्थान पर रहे जदयू के अरुण कुमार को 3,53,625 वोट मिले थे.

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