बीजद-भाजपा में कांटे की टक्कर

आगामी ११ अप्रैल से चार चरणों में होने वाले लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है. स्थानीय निकाय चुनाव में मिली कामयाबी को देखते हुए भाजपा जोश से लबरेज है, दूसरी ओर नवीन पटनायक के सामने अपनी साख बचाने की चुनौती है. कांग्रेस का वही आलम है, जो पहले था यानी उसे अपना वजूद बचाने के लिए लडऩा है. 

विजय महापात्र पिछले 19 सालों से किसी भी तरह सत्ता का हिस्सा नहीं रहे, इसके बावजूद एक राजनीतिज्ञ के रूप में मीडिया में उन्हें हमेशा प्रमुखता मिलती रही. इस बार के चुनाव पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, 2019 के ओडिशा के चुनाव बहुत जटिल होंगे. राज्य में इससे पहले ऐसा चुनाव नहीं हुआ होगा. उनकी टिप्पणी के पीछे आगामी चुनाव में परिणाम की अनिश्चितता स्पष्ट झलकती है और वास्तव में राज्य में चल रही राजनीतिक गतिविधियां भी कुछ इसी ओर संकेत कर रही हैं. चुनाव की घोषणा से पहले लोग परिणामों को लेकर आश्वस्त थे कि बीजद इस बार भी सहजता से चुनाव जीत लेगा. लेकिन, चुनाव नजदीक आते ही सभी एक बार फिर परिणामों के आकलन में जुट गए हैं. राज्य में चार चरणों में होने वाले चुनाव में 11 अप्रैल से मतदान की शुरुआत होगी.

सत्तारूढ़ बीजू जनता दल प्रमुख नवीन पटनायक लगातार अपनी आसान जीत का दावा करते रहे हैं, इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि बीजद सबसे पहले उम्मीदवारों की सूची जारी करेगा, लेकिन इसमें विलंब होने के पीछे विद्रोह की आशंका एक वजह मानी जा रही है. टिकट न पाने वाले दावेदार कांग्रेस या भाजपा में जा सकते हैं, इसी आशंका के चलते बीजद टिकट बांटने से पहले कांग्रेस और भाजपा की सूचियों का इंतजार कर रहा है. लगभग यही स्थिति कांग्रेस और भाजपा में है. तीनों ही दल पहले आप-पहले आप की तर्ज पर एक-दूसरे की चाल भांपने में लगे हैं. इस चुनाव में नवीन पटनायक ने महिला कार्ड खेला है. मिशन शक्तिके तहत उन्होंने महिला स्वयंसेवी संगठनों को आर्थिक सहायता देकर और महिलाओं के लिए सात लोकसभा सीटें आरक्षित करके अपनी महिला हितैषी छवि बनाने का प्रयास किया. इसके अलावा वह विपक्षी दलों के मजबूत नेताओं को भी अपने पाले में लाने की मुहिम चला रहे हैं. इसी क्रम में उन्होंने 17 साल पहले दल से निष्कासित दिलीप राय को वापस बुला लिया है. पश्चिम ओडिशा में बीजद को मजबूत करने की रणनीति के तहत नवीन पटनायक ने इस बार अपनी पुरानी सीट हिंजली के साथ-साथ बीजेपुर से भी चुनाव लडऩे की घोषणा की है.

कांग्रेस के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई बन गया है. पिछली बार वह यहां लोकसभा की एक सीट भी नहीं जीत पाई थी. इस बार उसने माकपा, भाकपा एवं झामुमो जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन करने का निर्णय लेकर उनके लिए एक-एक लोकसभा सीट और कुछ विधानसभा सीटें छोडऩे का समझौता किया है. उसकी इन कोशिशों के बावजूद कुछ पार्टी नेता असमंजस में हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करने के लिए राज्य का दौरा कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पार्टी छोडक़र बीजद की शरण में जा रहे हैं. बीते ८ मार्च को जब राहुल गांधी कोरापुट जिले के जयपुर आए, तो अगले ही दिन राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं आदिवासी नेता हेमानंद बिश्वाल की बेटी सुनीता बिश्वाल बीजद में चली गईं. हालांकि, हेमानंद बिश्वाल ने कहा कि बेटी के बीजद में जाने के पीछे उनकी सहमति नहीं है. अनुमान है कि बीजद सुनीता को आदिवासियों के लिए आरक्षित सुंदरगढ़ सीट से भाजपा के आदिवासी नेता एवं जनजातीय कार्य मंत्री जुएल उरांव के विरुद्ध चुनाव में उतारेगी. अगर ऐसा होता है, तो यह देखना रोचक होगा कि क्या हेमानंद बिश्वाल कांग्रेस के लिए अपनी बेटी के विरुद्ध प्रचार करेंगे?

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पार्टी को कई झटके लगने के बावजूद राहुल गांधी राज्य का दौरा कर कार्यकर्ताओं में जान फूंकने का प्रयास कर रहे हैं. वह अपनी जनसभाओं में कांग्रेस सरकार आने पर किसानों की कर्ज माफी, लड़कियों की शिक्षा पूरी तरह नि:शुल्क करने, गरीबों की बेटियों के विवाह में सरकारी मदद देने और महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने का वादा कर रहे हैं. लेकिन, उनकी बातों का प्रभाव होता दिख नहीं रहा है. कांग्रेस मजबूत होने के बजाय सबसे अधिक नुकसान झेल रही है. पार्टी के चार विधायक अन्य दलों में शामिल हो गए हैं. राज्य में जितने भी जनमत सर्वेक्षण किए गए, उन सबमें कांग्रेस को तीसरे स्थान पर दिखाया गया है. अगर वास्तविक परिणाम भी ऐसे रहे, तो यह कांग्रेस के लिए सदमे के समान होगा. पिछले साल अप्रैल में जब वरिष्ठ नेता निरंजन पटनायक को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई, तब उन्होंने कहा था कि पार्टी अगस्त तक विधानसभा के लिए कम से कम ५० उम्मीदवारों की घोषणा कर देगी. लेकिन, अभी तक ऐसा संभव नहीं हो सका. इससे कांग्रेस की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

दूसरी ओर भाजपा पूरी गंभीरता से यह चुनाव लड़ रही है. साल 2017 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता ने उसे एक नया आत्मविश्वास दिया. पार्टी कार्यकर्ता अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा तय लक्ष्य मिशन-120’ को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह नियमित अंतराल में यहां के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं. पश्चिमी ओडिशा में भाजपा हमेशा मुकाबले की स्थिति में रही है, लेकिन तटीय इलाकों में उसका संगठन कमजोर रहा है. हाल में तटीय क्षेत्रों में बीजद के बड़े नेताओं बैजयंत पंडा, दामोदर राउत एवं कांग्रेस के प्रकाश बेहेरा के आने से भाजपा की ताकत बढऩे के आसार हैं. पंडा का कद देखते हुए उन्हें दल का उपाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किया गया है. बीजद के पूर्व सांसद बलभद्र मांझी ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है. सबसे बड़ी बात यह कि एयर स्ट्राइक के बाद युवाओं के बीच मोदी लोकप्रिय हुए हैं. राज्य में हुए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में भाजपा को आठ से तेरह लोकसभा सीटें जीतते हुए दर्शाया गया है. नवीन पटनायक के मुकाबले भाजपा ने तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को आगे किया है.

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक नवीन दास कहते हैं, भाजपा को आठ और कांग्रेस को दो संसदीय सीटों पर कामयाबी मिल सकती है. इस बार नवीन पटनायक का फीलगुड फैक्टर कम हुआ है. बीजद की विधानसभा सीटें भी घटेंगी. वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष मिश्र तटीय क्षेत्रों में मोदी के प्रति अंडर करेंट की बात स्वीकारते हुए कहते हैं, लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें बढऩे की संभावना है. बीजद पूरी तरह नवीन पटनायक की छवि पर निर्भर है, उसके अन्य नेताओं की अपनी कोई इमेज नहीं है.

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