एनडीए ने दोहराया 2014 का प्रदर्शन

मोदी लहर और मुख्यमंत्री रघुवर दास की मेहनत के दम पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में २०१४ का अपना शानदार प्रदर्शन दोहराते हुए १२ संसदीय सीटों पर जीत का परचम लहरा दिया. लेकिन, असली परीक्षा अब शुरू होने वाली है, क्योंकि कुछ माह बाद राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. 

राज्य में एनडीए 2014 का अपना प्रदर्शन दोहराने में सफल रहा. इस बार भी उसे 14 संसदीय सीटों में से 12 पर जीत हासिल हुई. राजमहल एवं पश्चिमी सिंहभूम को छोडक़र शेष 12 सीटों पर एनडीए का परचम लहरा रहा है. राजमहल से झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार विजय हांसदा ने भाजपा के हेमलाल मुर्मू और पश्चिमी सिंहभूम से कांग्रेस की उम्मीदवार गीता कोड़ा ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ को पराजित किया. 11 सीटें भाजपा और गिरिडीह सीट सहयोगी आजसू की झोली में गईं. मुख्यमंत्री रघुवर दास स्वयं चुनाव नहीं लड़ रहे थे, लेकिन उनके सामने 2014 का प्रदर्शन दोहराने की बड़ी चुनौती थी, जिसमें विफल होने पर उनकी कुर्सी खतरे में पड़ सकती थी. रघुवर दास के लिए एक अच्छी बात यह रही कि कम वोटों के अंतर से सही, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा खूंटी से चुनाव जीत गए. अब वह केंद्रीय राजनीति में व्यस्त हो जाएंगे. मुंडा भाजपा में मुख्यमंत्री पद का आदिवासी चेहरा माने जाते हैं और दास के जरा भी कमजोर पडऩे पर वह उनके लिए खतरा बन सकते थे.

दरअसल, झारखंड राज्य गठन के बाद चाहे जिस दल की सरकार बनी हो, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर हमेशा आदिवासी समुदाय के नेता ही विराजमान होते रहे. हालांकि, कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया. वे जितने समय तक मुख्यमंत्री पद पर रहे, उनकी पूरी ऊर्जा अपनी कुर्सी बचाने में लगी रही. उन्हें अन्य मुद्दों पर विचार करने का समय ही नहीं मिला. अधिकांश ने सिर्फ अपनी जेब भरी, नतीजतन बड़े-बड़े घोटाले उजागर हुए. 2014 में भाजपा ने यह मिथक तोड़ा और गैर आदिवासी नेता रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाया. दास को आदिवासी विरोधी साबित करने की लगातार कोशिशें हुईं, लेकिन उन्होंने आदिवासियों के हित में कई काम किए. संदेश गया कि आदिवासी हितों की चिंता समुदाय के नेताओं से ज्यादा बाहरी नेता कर सकता है. इस चुनाव में सबसे बड़ी बात यह रही कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन दुमका सीट पर अपने शिष्य एवं भाजपा के उम्मीदवार सुनील सोरेन के हाथों पराजित हो गए. शिबू राज्य में आदिवासियों के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं, उन्हें दिशोम गुरुकहा जाता है. उन्होंने दुमका के वोटरों से अपील की थी कि यह उनका अंतिम चुनाव है, इसलिए वे उन्हें विजय की मालापहना कर विदा करें. लेकिन, वोटरों ने उनकी अपील नजरअंदाज कर दी.

शिबू सोरेन की हार झामुमो के लिए एक बड़ा झटका है. दुमका सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. यह शिबू सोरेन का पुराना गढ़ रहा है, यहां संथाल आदिवासियों की बहुलता है, सोरेन परिवार भी इसी समुदाय से है. शिबू ने चुनाव के दौरान किसी तरह का प्रचार नहीं किया, बल्कि गांव-गांव स्वयं जाकर वोटरों से संपर्क किया. बावजूद इसके उनकी हार के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा को आगामी विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. इसी तरह कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय रांची सीट से बिल्कुल नए चेहरे विक्रम सेठ के हाथों पराजित हो गए. झाविमो प्रमुख बाबू लाल मरांडी भी राजद से भाजपा में आईं अन्नपूर्णा देवी से हार गए. राजद ने चतरा और पलामू से अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन दोनों सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा. राजद की ओर से कोई बड़ा नेता मैदान में नहीं था, लेकिन महागठबंधन में शामिल कांग्रेस, झाविमो एवं झामुमो के शीर्ष नेता पराजित हो गए. अब विधानसभा चुनाव में उन्हें नए सिरे से रणनीति बनानी होगी, क्योंकि राज्य में भाजपा को सत्ता में वापस आने से रोकना किसी के लिए आसान नहीं होगा. इन चारों दलों की आपसी सहमति के मुताबिक लोकसभा चुनाव कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ा गया और अब विधानसभा चुनाव झामुमो के नेतृत्व में लड़ा जाना है. हालांकि, विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के सामने नेतृत्व का संकट नहीं है.

मोदी लहर और मुख्यमंत्री रघुवर दास की सक्रियता के बावजूद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ का पराजित होना एक बड़ा झटका माना जा रहा है. पश्चिमी सिंहभूम 2014 में भाजपा द्वारा जीती हुई सीट थी. गिलुआ का मुकाबला हाल में कांग्रेस में शामिल हुईं गीता कोड़ा से था, जो पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी हैं. इलाके में कोड़ा परिवार की मजबूत पकड़ रही है, ऐसे में गीता को अपना उम्मीदवार बनाना कांग्रेस के लिए सही निर्णय साबित हुआ. गीता के जरिये झारखंड में कांग्रेस का खाता भी खुल गया. अब भाजपा को अपनी प्रदेश कमेटी पुनर्गठित करने की जरूरत पड़ सकती है. रघुवर दास अब तक के मुख्यमंत्रियों की तुलना में पूर्ण बहुमत की स्थिर सरकार के मुखिया होने के नाते विकास कार्यों पर अपना ध्यान केंद्रित करने में सफल रहे. उनका काम दिखा भी. रघुवर दास राज्य में अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले मुख्यमंत्री हैं. लोकसभा चुनाव तो संपन्न हो गए, अब विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसमें जीत हासिल करके राज्य की सत्ता में पुनर्वापसी की चुनौती उनके सामने होगी. वहीं कांग्रेस, झाविमो, राजद एवं झामुमो को भी लोकसभा चुनाव में अपने खराब प्रदर्शन की भरपाई करनी होगी.

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