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एमपी की दास्तां- डाकू गए, माफिया आ गए

सूबे के हर संभाग और जिले में बालू माफिया सक्रिय हैं। इनके हौसले इतने बुलंद हैं कि ये अपने रास्ते के हर कांटे को साफ करने के लिए हत्या करने से भी नहीं चूकते। भले ही इसके लिए उन्हें पुलिस थानों पर हमला ही क्यों न करना पड़े।

डॉ. संतोष मानव । अप्रैल 2016- खरगोन में एक निजी खनन कंपनी के कार्यालय पर बालू माफिया का हमला, लूट। होशंगाबाद में अवैध बालू खनन देखने-समझने गए संवाददाता को पीटा, कैमरा तोड़ा।
मार्च 2016- बुरहानपुर में कार्रवाई करने गए एसडीएम पर हमला, डुबोकर मारने का प्रयास। मुरैना में फॉरेस्ट गार्ड नरेंद्र कुमार की हत्या। मुरैना घड़ियाल सेंचुरी के अघीक्षक पर हमला। एएसपी अमृत मीणा पर भिंड में हमला। भिंड में ही जिला खनन अधिकारी पर हमला।
अप्रैल 2015- सिपाही घमेंद्र चैहान की मुरैना में हत्या।
जनवरी 2014- फॉरेस्ट गार्ड और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों पर हमला।
वर्ष 2013- बालू माफिया का थाने पर हमला, तोड़फोड़, पुलिस के वाहनों को आग लगाई।
मार्च 2012- भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी नरेंद्र कुमार की मुरैना में हत्या।

ये सारी कारस्तानी पूरे राज्य में फैल चुके रेत माफिया की है। मध्य प्रदेश में अब डाकू नहीं हैं। चंबल में भी नहीं। सब मार दिए गए या पकड़े गए या फिर आत्मसमर्पण कर दिया। अब डाकू से भी खतरनाक हैं रेत माफिया। डकैतों की तरह ये भी लोगों को मार रहे हैं। बालू लूट रहे हैंै। सूबे के हर संभाग, हर जिले में बालू माफिया सक्रिय हैं। प्रदेश में 1700 से ज्यादा रेत की खदानें हैं। कुछ छोटी-कुछ बड़ी। यहां बालू का लगभग दो लाख करोड़ रुपये का वैध कारोबार है। एक अनुमान के मुताबिक इसका सालाना अवैध कारोबार 20 हजार करोड़ रुपये का है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि 2013-14 में बालू माफिया की आपसी रंजिश और पुलिस से मुठभेड़ में 715 और 2014-15 में 547 लोगों को जान गंवानी पड़ी। बालू माफिया को लेकर ग्वालियर-चंबल संभाग ज्यादा कुख्यात है। यह इसलिए कि चंबल नदी से बालू निकालने पर रोक है। ऐसे में बालू के दाम आसमान पर हैं। सो माफिया के लिए बालू लूट फायदे का धंधा है।
ग्वालियर-चंबल संभाग में तो गांव के गांव माफिया के संरक्षण में बालू लूट के काम में लगे हैं। मुरैना में आगरा-मुंबई रोड पर रात भर अवैध बालू से लदे ट्रक, ट्रैक्टर और डंपर दौड़ते दिखते हैं। मुरैना में एक ट्रक बालू अधिकतम 400 रुपये का पड़ता है और यहां से महज 45 किलोमीटर दूर ग्वालियर में यही बालू 3500-4000 रुपये प्रति ट्रक में बिक जाता है। चंबल नदी का बालू आगरा में 10 हजार रुपये तो मेरठ, गाजियाबाद पहुंचकर और महंगा हो जाता है। मुरैना से ग्वालियर के बीच चार थाने व अनेक बैरियर हैं। रोज रात को सैकड़ों डंपर अवैध बालू लेकर वहां से गुजरते हैं लेकिन उन्हें पकड़ने की खबर कभी-कभी ही आती है। ऐसा क्यों?
जानकार बताते हैं कि यह पूरा खेल नेता, बिल्डर, अधिकारी और माफिया के गठजोड़ का है। मुरैना जिले में एक पूर्व मंत्री व फिलहाल विधायक पर बालू माफिया को संरक्षण देने का आरोप है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अरुण यादव ने मीडिया के सामने आरोप लगाया है कि इस खेल में सत्तारूढ़ दल भाजपा के कई नेता शामिल हैं। हालांकि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता शैलेंद्र प्रधान इससे इनकार करते हैं। उनका कहना है कि यादव के आरोप तथ्यहीन हैं। पुलिस-प्रशासन व खनन विभाग के लोग सख्त कार्रवाई कर रहे हैं इस कारण ज्यादा चर्चा हो रही है।
दरअसल, रेत माफिया आधुनिक डकैत हैं। उनके पास अत्याधुनिक वैध-अवैध हथियारों का जखीरा है। गांवों के बेरोजगार युवकों को उन्होंने अपने साथ जोड़ रखा है। ये बालू लदे डंपरों के साथ चलते हैंै। ये अपने आका से मोबाइल पर जुड़े रहते हैंैै। कोई इनके वाहनों को रोकने की जुर्रत करता है तो आका का आदेश पाते ही ये उसे उड़ा या कुचल देते हैं। पुलिस का कहना है कि अवैध बालू से लदे डंपर समय-समय पर पकड़े जाते हैं। उनकी नीलामी भी होती है। मगर सच तो यह है कि चंबल आज डाकुओं की वजह से नहीं बल्कि बालू माफिया के कारण फिर से बदनाम हो गया है।
पिछले 15 साल से ग्वालियर-चंबल संभाग में रिपोर्टिंग कर रहे मुरैना के पत्रकार विनोद त्रिपाठी का कहना है कि चंबल नदी के 22 घाटों पर प्रतिबंध के बावजूद दिन-रात बालू का उत्खनन हो रहा है। इसमें लगभग दो हजार वाहन लगे हैं। सरकार ने अवैध बालू खनन रोकने के लिए सशस्त्र पुलिस बल की एक कंपनी मुरैना में तैनात कर रखी है लेकिन उसका सदुपयोग नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए कि यह बल वन विभाग के निर्दश पर काम करता है, पुलिस के नहीं। विनोद त्रिपाठी का कहना है कि मुरैना जिले में ही पिछले दस साल में उत्खनन रोकने वाले सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियोंपर सौ से ज्यादा बार हमले हुए हैं। माफिया के हौसले इतने बुलंद है कि वे कई बार थानों पर हमला कर जब्त वाहन भी ले जा चुके हैं।
मुरैना के पुलिस अधीक्षक विनीत खन्ना ने ओपिनियन पोस्ट को बताया, ‘बालू माफिया को रोकने के लिए पुलिस ने नई रणनीति बनाई है। इसके तहत घाटों को जोड़ने वाले रास्तों पर बड़े-बडेÞ गड्ढे बना दिए गए हैं। इससे रास्ते बंद हो गए हैं। परिणाम यह हुआ है कि राजघाट से खनन पूरी तरह बंद हो गया है। उन्होंने माना कि दूसरे घाटों से कुछ खनन हो रहा है लेकिन वहां भी गड्ढे खोदकर रास्ते बंद कर दिए जाएंगे । इससे खनन पर पूरी तरह रोक लग जाएगी।’

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