मर-मर गंगे

शशि शेखर
Wed, 20 Feb, 2019 12:17 PM IST
नमामि गंगे का सच

हर-हर गंगे… आज भी इस उद्घोष के साथ गंगा स्नान करने वाले लोग मोक्ष पाने की कामना रखते हैं. मोक्षदायिनी गंगा सदियों से करोड़ों भारतीयों की आस्था और आजीविका का जरिया रही है. बदले में हमने गंगा को सिर्फ और सिर्फ प्रदूषित किया, गंदा बनाया. ‘गंगा एक्शन प्लान’ से लेकर ‘नमामि गंगे’ तक हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी आखिर गंगा मैली क्यों रह गई? पेश है, नमामि गंगे योजना का सच बताती ओपिनियन पोस्ट की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट:

सुश्री उमा भारती नाम की एक केंद्रीय मंत्री हैं, जिन्होंने कभी घोषणा की थी कि अगर अमुक समय के भीतर गंगा को साफ नहीं कर सकी, तो जल समाधि ले लूंगी. वह अमुक समय भी बीत गया, गंगा साफ भी नहीं हुई. दु:खद बात यह रही कि सुश्री उमा भारती से मंत्रालय छीन लिया गया, लेकिन सुखद यह रहा कि उन्होंने जल समाधि नहीं ली. खैर, इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘नमामि गंगे’ को सफल बनाने की जिम्मेदारी अपने सबसे काबिल और मेहनती मंत्री नितिन गडकरी को सौंप दी. केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण, सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी तमाम जिम्मेदारियों को संभालते हुए नमामि गंगे की सफलता के लिए काम तो कर रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले पांच सालों में इस योजना के तहत गंगा कितनी साफ हुई?

uma bharti

12 अक्टूबर 2018 को जल संसाधन मंत्रालय में दायर आरटीआई के तहत यह पूछा गया कि कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉंसिबिलिटी के तहत अब तक गंगा सफाई को लेकर कितने काम हुए? इसके तहत छह विभिन्न कार्यों के बारे में सवाल पूछे गए थे. जैसे, गंगा ग्राम बनाने, वृक्षारोपण, घाट जीर्णोद्धार, शवदाह गृह निर्माण, नालों का बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर कॉरपोरेट घरानों की तरफ से कितने काम किए गए?

दिसंबर 2018 में ही एक सार्वजनिक समारोह में नितिन गडकरी ने कहा कि स्वच्छ गंगा का सपना अब जल्द ही साकार होगा, क्योंकि नदी की सफाई के लिए उठाए गए कदमों के नतीजे अब दिखने लगे हैं. तो सवाल है कि ये नतीजे दिख कहां रहे हैं? सूचना का अधिकार कानून के तहत ‘ओपिनियन पोस्ट’ को मिली जानकारी बताती है कि नमामि गंगे योजना के तहत अभी तक ऐसा कोई काम नहीं हो सका है, जिसके ठोस परिणाम अभी या निकट भविष्य में देखने को मिल सकें. यह हालत तब है, जब गंगा की सफाई को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तबसे गंभीर हैं, जब वह पीएम पद के प्रत्याशी के तौर पर बनारस पहुंचे थे और उन्होंने वहां जाकर बोला था, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है. बाकायदा उन्हें मां गंगा का आशीर्वाद मिला भी. नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए. लेकिन, दो-दो मंत्रियों को जिम्मेदारी देने के बाद भी क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ गंगा का सपना पूरा हो सका है? यही मूल सवाल है, जिसमें समस्या है, समाधान है, राजनीति है और वह सरकारी कहानी है, जो उन सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है, जिसे सूचना का अधिकार कानून कहते हैं. एक पाठक और सजग जनता के तौर पर आपको यह जानना चाहिए कि जिस ‘नमामि गंगे’ के नाम पर सरकार ने करोड़ों रुपये सिर्फ विज्ञापनों पर खर्च किए, उस योजना का हाल आज क्या है? कितना पैसा विश्व बैंक से मिला, कितना पैसा आम जनता (कर या दान के रूप में) से मिला, कितना पैसा कॉरपोरेट्स से मिला और उन पैसों का हुआ क्या?

सबसे पहले नमामि गंगे योजना पर ही बात कर रहे हैं. इसमें हम चर्चा करेंगे कि यह योजना आखिर है क्या, इसकी कार्यप्रणाली क्या है और पिछले पांच सालों में इस योजना के तहत कितना काम हुआ है, कितना पैसा खर्च हुआ है?

नमामि गंगे कार्यक्रम का लक्ष्य

यह कार्यक्रम नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) के तहत आता है, जो पहले नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) का इम्प्लीमेंटेशन आर्म था. एनएमसीजी 12 अगस्त 2011 को सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकृत संस्था है. एनजीआरबीए को अक्टूबर 2016 में भंग कर उसकी जगह नेशनल गंगा काउंसिल बनाई गई, जिसके अध्यक्ष खुद भारत के प्रधानमंत्री हैं. जून 2014 में लांच ‘नमामि गंगे’ केंद्र सरकार का फ्लैगशिप कार्यक्रम है. इसका बजट करीब 20 हजार करोड़ रुपये है. गंगा सफाई के लिए 2011 में ही विश्व बैंक की तरफ से भी 4,600 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि मिली थी. इसके अलावा जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी ने भी बनारस में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए 496 करोड़ रुपये दिए थे. इस कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य है, गंगा को प्रदूषण मुक्त करना, गंगा संरक्षण और गंगा का कायाकल्प करना. इसके तहत सीवेज ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण, गंगा ग्राम बनाना, वनीकरण, रिवर फ्रंट बनाना, नदी सफाई, औद्योगिक कचरे का निस्तारण, जैव विविधता और जन-जागरूकता फैलाने जैसे कार्य शामिल हैं. क्या पिछले पांच सालों में इनमें से कोई भी काम हुआ और अगर हुआ, तो कितना हुआ?

READ  सड़क से संसद तक सिर्फ़ मोदी

कहां हैं 113 रियल टाइम बायो मॉनिटरिंग सिस्टम 

गोमुख से निकल कर गंगा सागर (बंगाल की खाड़ी) तक पहुंचते-पहुंचते गंगा करीब 2,525 किलोमीटर का सफर तय कर लेती है. प्रदूषण का आलम यह है कि ऋ षिकेश/ हरिद्वार से ही गंगा प्रदूषित होना शुरू हो जाती है. मुरादाबाद के बाद से गंगा का पानी पीने तो क्या, नहाने लायक भी नहीं रह जाता है. ये तथ्य खुद एनजीटी और केंद्रीय व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हैं. कानपुर के बाद से गंगा के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा भी घटने लगती है. फेकल क्लोरीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि गंगा का पानी नहाने लायक नहीं रह जाता है.

तो सवाल है कि उत्तराखंड से लेकर पश्चिम बंगाल के बीच 113 रियल टाइम बायो मॉनिटरिंग सिस्टम अब तक क्यों नहीं स्थापित किए जा सके हैं? ये वैसे बायो मॉनिटरिंग सिस्टम हैं, जो रियल टाइम में नदी में प्रवाहित होने वाले प्रदूषण की मात्रा की जांच करते हैं और समग्र रूप से पानी की रासायनिक-भौतिक स्थिति का आकलन करते हैं. मतलब यह कि इस सिस्टम से उत्तराखंड से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा में प्रवाहित होने वाले प्रदूषण की रियल टाइम मॉनिटरिंग हो सकती थी. लेकिन, अब तक यह सिस्टम स्थापित नहीं किया जा सका. इस सिस्टम के लिए बाकायदा सरकार ने रिपोर्ट वगैरह भी बना दी. लेकिन, 6 नवंबर 2018 को मिली आरटीआई सूचना में साफ-साफ लिखा है कि गंगा नदी पर अब तक एक भी रियल टाइम बायो मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं लगाया जा सका है. अब इसे लापरवाही कहें या मां गंगा के साथ छल?

कॉरपोरेट्स का हाथ, नहीं है गंगा के साथ 

जब बात सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रम और जीवनदायिनी मां गंगा के अस्तित्व की रक्षा की आती है, तो कॉरपोरेट घराने भी किनारा करते नजर आ रहे हैं. 12 अक्टूबर 2018 को जल संसाधन मंत्रालय में दायर आरटीआई के तहत यह पूछा गया कि कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉंसिबिलिटी के तहत अब तक गंगा सफाई को लेकर कितने काम हुए? इसके तहत छह विभिन्न कार्यों के बारे में सवाल पूछे गए थे. जैसे, गंगा ग्राम बनाने, वृक्षारोपण, घाट जीर्णोद्धार, शवदाह गृह निर्माण, नालों का बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर कॉरपोरेट घरानों की तरफ से कितने काम किए गए? 6 नवंबर 2018 को जो जवाब मिला, उसे पढि़ए. जवाब में लिखा है, सीएसआर के तहत गंगा ग्राम, वृक्षारोपण और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर अब तक कोई प्रोजेक्ट नहीं बना है. अलबत्ता, शिपिंग कॉरपोरेश्न ऑफ इंडिया और इंडो रामा ग्रुप ने जरूर कुछ घाट और शवदाह गृहों के निर्माण कराए हैं, वह भी काफी कम संख्या में. इंडसइंड बैंक ने भी इलाहाबाद में सात नालों के बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट का जिम्मा उठाया है. यानी कुल छह विभिन्न कार्यों में से कुल मिलाकर तीन कॉरपोरेट हाउसेज ने कुछ काम किए हैं.

अब ध्यान दीजिए कि कैसे साल 2018 में एक महत्वाकांक्षी साधु ने पूरी गंगा की यात्रा की थी. जाहिर है, उस यात्रा पर काफी पैसा भी खर्च हुआ होगा. लेकिन, उस यात्रा से निकला क्या? यदि वह चाहते, तो उसी पैसे से गंगा सफाई के लिए कुछ ठोस काम कर सकते थे. दूसरी तरफ, देश के कई उद्योगपति भी समय-समय पर गंगा दर्शन कर अपने पाप-पुण्य का हिसाब-किताब करते रहते हैं. लेकिन, किसी ने भी मां गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए कोई प्रोजेक्ट अपने जिम्मे नहीं लिया. यह अलग बात है कि कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉंसिबिलिटी के तहत हर कॉरपोरेट घराने को अपने कुल मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा (दो प्रतिशत) सीएसआर फंड के तहत खर्च करना होता है. यह रकम समग्र तौर पर हजारों करोड़ रुपये की होती है. कॉरपोरेट घराने यह पैसा खर्च भी करते हैं. लेकिन, वह खर्च इतने शातिराना तरीके से होता है कि उक्त धनराशि घूम-फिर कर उनके अपने ही लोगों या हित में चली जाती है. सरकार अगर गंगा सफाई को लेकर गंभीर होती, तो वह आसानी से कॉरपोरेट घरानों के सीएसआर फंड का एक खास हिस्सा गंगा सफाई के ठोस कार्यों में डायवर्ट करने के लिए नियम तक बना सकती थी. लेकिन, ऐसा कुछ हुआ नहीं.

READ  क़द्दावर चेहरों के बीच आर-पार की लड़ाई

गंगा सफाई हो न हो, कमाई जरूर हो रही है 

राम जी की गंगा भले मैली की मैली रह गई, लेकिन तब भी वह देश की आधी आबादी की आजीविका का साधन बनी हुई है. तब भी गंगा राजनेताओं की राजनीति का एक अहम जरिया बनी हुई है. इससे भी आगे यह कि गंगा के नाम पर केंद्र सरकार न सिर्फ करोड़ों रुपये आम आदमी से दान के तौर पर ले रही है, बल्कि उसे खर्च न करते हुए, साल दर साल उन पैसों पर भारी ब्याज भी कमा रही है. गंगा जल की बिक्री कर पोस्ट ऑफिस के जरिये भी सरकार पैसा कमा रही है. कुल मिलाकर यह कि मां गंगा भले अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हो, लेकिन तब भी सरकारी खजाने को भरती जा रही है.

उदाहरण के लिए, नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत एक फंड बनाया गया था, जिसका नाम है क्लीन गंगा फंड. यह फंड 2016 में बनाया गया था. इस फंड में आम लोगों ने अपनी तरफ से आर्थिक योगदान किया और अब भी कर रहे हैं. 6 नवंबर 2018 को भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय द्वारा आरटीआई के तहत दी गई सूचना के मुताबिक, 15 अक्टूबर 2018 तक इस फंड में 266.94 करोड़ रुपये जमा हो चुके थे (ब्याज समेत). इसके अलावा, मार्च 2014 में नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के खाते में अनुदान और विदेशी लोन के तौर पर जितनी रकम जमा थी, उस पर सात करोड़ 64 लाख रुपये बतौर ब्याज सरकार को मिले. अब सीधे आते हैं मार्च 2017 में. मार्च 2017 में इस खाते में आई ब्याज की रकम सात करोड़ से बढक़र 107 करोड़ रुपये हो गई. यानी तीन सालों में सरकार ने ‘कुशलतापूर्वक’ अकेले नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के खाते से 100 करोड़ रुपये का ब्याज कमा लिया. गौरतलब है कि सरकार को जो विदेशी लोन मिलता है, उस पर भी ब्याज देना होता है. लेकिन, हमारी सरकार ने लोन के पैसे पर भी भारी ब्याज कमा लिया. तो क्या इसका अर्थ यह है कि अनुदान मिलने के बाद पैसों के इस्तेमाल में देरी हुई और इस प्रकार खाते में ब्याज बढ़ता चला गया?

इसके अलावा, सरकार ने देश भर के पोस्ट ऑफिसों के जरिये गंगा जल बेचकर भी कमाई की. अब यह दिलचस्प तथ्य है कि जो मां गंगा सदियों से बिना कभी कुछ मांगे (बिना एक पैसा लिए) अपनी करोड़ों संतानों का पेट भर रही है और मोक्षदायिनी भी बनी हुई है, उसी मां गंगा का जल सरकार ने बेचकर दो सालों में 52 लाख 36 हजार छह सौ 58 रुपये कमा लिए. करीब 119 शहरों के पोस्ट ऑफिसों के जरिये वित्तीय वर्ष 2016-17 और 2017-18 के दौरान दो लाख 65 हजार ८०1 बोतलें (200 और 500 मिलीलीटर) बेची गईं. (उक्तआंकड़े  जून 2018 तक के हैं)

विज्ञापनों में चमकती गंगा या सरकार 

अब गंगा कितनी साफ हुई, कितनी मैली, इसका लेखा-जोखा तो एनजीटी से लेकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तक करते ही रहते हैं, लेकिन एक चीज बिना शक लगातार चमकदार होती चली गई, यानी सरकार का चेहरा. इसका प्रमाण मिलता है, 6 दिसंबर 2018 को जल संसाधन मंत्रालय के नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा की तरफ से उपलब्ध कराए गए आरटीआई दस्तावेजों में. इस आरटीआई में वित्तीय वर्ष 2014-15 से लेकर 2018-19 के बीच प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा की तरफ से जारी विज्ञापनों पर हुए खर्च के बारे में पूछा गया था. जवाब में बताया गया कि 2014-15 से लेकर 2018-19 (30 नवंबर 2018) के बीच ऐसे विज्ञापनों पर कुल 36.47 करोड़ रुपये खर्च किए गए. 2014-15 में जहां यह राशि केवल 2.04 करोड़ रुपये थी, वहीं आगे के वर्षों में यह धीरे-धीरे बढ़ती गई और चुनावी साल आते ही यह राशि 10 करोड़ रुपये का आंकड़ा भी पार कर गई. जैसे, 2015-16 में 3.34 करोड़, 2016-17 में 6.79 करोड़, 2017-18 में 11.07 करोड़ और 2018-19 (30 नवंबर 2018 तक) में यह राशि बढक़र 13.23 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. जाहिर है, तकरीबन सभी विज्ञापनों में प्रधानमंत्री का चेहरा ही प्रमुखता से दिखता या दिखाया जाता है.

READ  सांप्रदायिक हिंसा की जद में पश्चिम बंगाल

उदाहरण के लिए 14 अक्टूबर 2017 को देश के महत्वपूर्ण अखबारों में एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ, जो पटना-बेऊर एसटीपी, सीवरेज नेटवर्क, एसटीपी पटना कर्माली चौक, एसटीपी पटना सैदपुर एवं सीवरेज नेटवर्क के नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन से संबंधित था. अब ध्यान देने वाली बात यह है कि पटना-बेउर एसटीपी (43 एमएलडी) प्रोजेक्ट 15 जुलाई 2014 में सैंक्शन हुआ था. शेष अन्य प्रोजेक्ट्स के कार्य भी 2014 में सैंक्शन हो चुके थे, लेकिन 14 अक्टूबर 2017 तक इनके शिलान्यास तक नहीं हुए थे. आखिर क्यों? क्यों इन प्रोजेक्ट्स के शिलान्यास के लिए तीन सालों तक इंतजार करना पड़ा? क्या भाजपा सरकार इस इंतजार में थी कि बिहार में महा-गठबंधन की सरकार टूटे, नीतीश कुमार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाएं और तब जाकर प्रधानमंत्री इन प्रोजेक्ट्स के शिलान्यास करें? कारण चाहे जो रहा हो, लेकिन इससे इतना तो कोई भी समझ सकता है कि पैसा होने के बावजूद, प्रोजेक्ट्स सैंक्शन होने के बाद भी, सरकार गंगा सफाई को लेकर सचमुच कितनी गंभीर है.

अगर इन विज्ञापनों का विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि गंगा सफाई से जुड़े साधारण से काम को लेकर भी लाखों रुपये के विज्ञापन जारी किए गए. यह ठीक बात है कि कोई भी सरकार अपने कामकाज का प्रचार करना ही चाहती है, लेकिन जब गंगा सफाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य को भी सरकार अपने प्रचार-प्रसार का जरिया भर बना ले और कोई भी ठोस पहल होती न दिखे, तो गंगा सफाई को लेकर बनी नीति और नीयत पर शंका होना स्वाभाविक है. मसलन, 113 रियल टाइम बायो मॉनिटरिंग सिस्टम न लगना, ड्रेनेज पर राष्ट्रव्यापी नीति न होना (जिसके बिना एसटीपी की पूर्ण सफलता संदिग्ध है) आदि बताता है कि ‘व्यवस्था’ गंगा की सफाई और उसके पुनर्जीवन को लेकर कितनी गंभीर है.

बहती रहे गंगा, चलती रहे राजनीति…

आरटीआई के तहत जल संसाधन मंत्रालय से यह पूछा गया कि 13 अगस्त 2016 के बाद कितने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए गए, किन शहरों में ड्रेनेज नेटवर्क की प्लानिंग हुई है और उनकी मौजूदा स्थिति क्या है, 10 स्मार्ट गंगा सिटी बनाने की बात कही गई थी, उसका क्या हुआ? इन सवालों के जवाब देते हुए जल संसाधन मंत्रालय ने 10 अक्टूबर 2018 को बताया कि नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत आज तक (10 अक्टूबर 2018) कुल 236 प्रोजेक्ट्स सैंक्शन किए गए, जिनमें म्यूनिसिपल सीवरेज ट्रीटमेंट, औद्योगिक कचरे का ट्रीटमेंट, नदी की सतह की सफाई, ग्रामीण स्वच्छता, वनीकरण, जैव विविधता एवं जागरूकता फैलाने आदि के कार्य शामिल हैं और इनमें से 63 प्रोजेक्ट्स अब तक पूरे हो चुके हैं, बाकी पर काम चल रहा है. इसके अलावा अब तक (10 अक्टूबर 2018) 114 सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर और एसटीपी प्रोजेक्ट्स सैंक्शंड हुए हैं, जिनमें से 27 पूरे हुए हैं.

उपरोक्त जवाब इतने जटिल हैं कि जब तक हर एक प्रोजेक्ट का फिजिकल वेरीफिकेशन न किया जाए, असलियत किसी को पता नहीं चलेगी. इसी तरह 13 अगस्त 2016 को उज्जैन में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने 10 स्मार्ट गंगा सिटी बनाने की बात कही थी. इसमें हरिद्वार, ऋ षिकेश, मथुरा-वृंदावन, वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, पटना, साहिबगंज और बैरकपुर के नाम शामिल हैं. पिछले ढाई सालों में अगर इनमें से एक भी शहर में स्मार्ट गंगा सिटी बन गया हो, तो पाठक वहां जाकर ‘स्मार्ट तीर्थाटन’ का आनंद उठा सकते हैं. बहरहाल, गंगा को उस सरकार से भी उम्मीद थी, जिसने ‘गंगा एक्शन प्लान’ बनाया था, गंगा को इस सरकार से भी उम्मीद है, जिसने ‘नमामि गंगे प्लान’ बनाया है.

अब यह उम्मीद पूरी होती है या एक बार फिर गंगा छली जाती है, इसका जवाब तो जब मिलेगा, तब मिलेगा. लेकिन, मोदी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना की क्रियान्वयन प्रक्रिया को देखते हुए इस बात की उम्मीद कम है कि ‘नमामि गंगे’ समय रहते अपना मकसद हासिल कर पाएगी.

 

 

 

×