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जांच आयोग बनाओ जनता को बरगलाओ

राज्य गठन के बाद से जितने घोटाले सामने आए हैं सबकी जांच के लिए आयोग का गठन किया गया मगर नतीजा सिफर ही रहा। किसी आयोग ने कोई सिफारिश भी की तो सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसा कांग्रेस ही नहीं भाजपा की सरकार में भी हुआ।

अनूप गैरोला/राजीव थपलियाल

उत्तराखंड के पूर्व मंत्री व भाजपा नेता हरक सिंह रावत को लेकर राजनीतिक गलियारों में घमासान मचा हुआ है। राजनीतिक उठापटक के बीच भ्रष्टाचार समेत विभिन्न मामलों को लेकर जांच कमेटियां बैठाई जा रही हैं। इससे पहले भी भ्रष्टाचार समेत अन्य मुद्दों को लेकर राज्य में कई आयोग व कमेटियां गठित हो चुकी हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि सियासी मोहरे बिठाने व अपनी छवि को साफ रखने के लिए सरकारें इस प्रकार का सियासी दांव खेलती आई हैं। पिछले 16 सालों का सच यह है कि राजधानी आयोग समेत भ्रष्टाचार आदि मामलों पर भी आधा दर्जन से अधिक आयोगों का गठन हो चुका है। करोड़ों खर्च होने के बाद भी आयोगों की सिफारिशें एक कदम भी कार्रवाई की तरफ नहीं बढ़ पाईं। उस पर तुर्रा यह कि सरकार मामलों की जांच से बाज नहीं आ रही है।

हरीश ने भी निभाई परंपरा
सीबीआई जांच में फंसे मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हाल ही में जमीन घोटालों से जुड़े मामलों की जांच कराने का ऐलान किया। उनकी मानें तो प्रदेश में सारे झगड़े की जड़ चूंकि जमीनें हैं, लिहाजा उन्होंने जमीनों से जुड़े सभी विवादों की जांच सरकार के तीन मंत्रियों के हवाले कर दी हैं। कुछ मामलों की जांच मंत्री करेंगे। एक-दो मामलों की एसआईटी जांच करेगी और बाकी के जमीन घोटालों का पर्दाफाश गढ़वाल आयुक्त के तहत गठित समिति से कराया जाएगा। सीएम ने इन सभी मामलों की जांच में इस बात पर खास जोर दिया है कि ये समयबद्ध होंगी। लेकिन जांच में दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ उनकी सरकार क्या एक्शन लेगी, इस बारे में उन्होंने कुछ भी कहना जरूरी नहीं समझा। दरअसल, उत्तराखंड में अब तक सुर्खियों में आए सैकड़ों घोटालों पर जांच बैठाने की ही परंपरा है। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी इस परंपरा को कायम रखा है। इतिहास गवाह है कि सरकार और मुख्यमंत्री बदलने में निर्णायक भूमिका निभाने वाले दर्जनों घोटाले अंतहीन जांचों में गुम हो गए और जांच के नाम पर करोड़ों रुपये फूंक डाले गए। वरिष्ठ पत्रकार नीलकंठ भट्ट ने अफसोस जताते हुए कहा कि विकास की बजाय जांच पर बर्बाद होने वाले जनता के धन को लेकर जवाब देने को कोई तैयार नहीं है।

राजधानी घोटाले से आयोगों का आगाज
यह विडम्बना ही है कि राज्य गठन के साथ ही उत्तराखंड में घोटालों की शुरुआत हो गई थी। इसका आगाज भाजपा की अंतरिम सरकार में घोटालों के साथ हुआ। तत्कालीन मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी के कार्यकाल में सबसे पहले राजधानी घोटाला सुर्खियों में रहा। जांच बैठी मगर नतीजा जीरो रहा। राजधानी बनाने के नाम पर निर्माण एजेंसियों से घोटाले की शुरुआत हुई। इसमें सरकारी एजेंसियों का नाम आते ही विपक्ष ने इस मामले को जमकर भुनाया। लिहाजा विपक्ष के दबाव में जांच कमेटी व जांच आयोग का गठन हुआ। कई दिनों तक यह तमाशा चलता रहा। विपक्षी कांग्रेस ने इस मामले को खूब भुनाया और अपनी सरकार आते ही इस मामले पर चुप्पी साध ली।

आयोग पर आयोग
वर्ष 2002 में राज्य की पहली निर्वाचित सरकार कांग्रेस की बनी। एनडी तिवारी के राज में भ्रष्टाचार और घोटालों का खूब हल्ला रहा। भाजपा ने 56 घोटालों की एक लंबी फेहरिस्त बनाई और इस मुद्दे पर चुनाव लड़ा। सत्ता में आने के बाद भाजपा चुनाव में उठाए गए 56 घोटालों की जांच को लेकर दबाव में थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी ने जस्टिस (सेवानिवृत्त) एएन वर्मा को जांच सौंपी। फिर यही जांच जस्टिस (सेवानिवृत्त) आरए शर्मा ने की और उनके निधन के बाद ये जिम्मा सरकार ने जस्टिस (सेवानिवृत्त) शंभू नाथ श्रीवास्तव को सौंपा। लेकिन किसी भी मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। आयोग की सिफारिश पर करीब एक दर्जन मामले विजिलेंस को सौंपे गए जिन पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह बात और है कि इन मामलों को लेकर राजनीतिकों ने कई साल तक जनता को गुमराह किया। बाद में यह आयोग भी ठंडे बस्ते में चला गया।

जांच का जवाब जांच से
जब तक भाजपा सत्ता में रही, 56 घोटालों की जांच कछुआ गति से चलती रही। विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस भी घोटालों का जवाब घोटाले से देने में पीछे नहीं रही। तब नेता प्रतिपक्ष के तौर पर डॉ. हरक सिंह रावत ने भाजपा राज के 450 से ज्यादा घोटालों की एक लंबी सूची बनाकर उसे राष्ट्रपति को सौंपा। इनमें स्टर्डिया भूमि घोटाला, 56 पनबिजली प्रोजेक्ट घोटाला, ढैंचा बीज खरीद घोटाला, दैवीय आपदा (2010) में हुए खर्च, केंद्र पोषित योजनाओं में अनियमितता, महाकुंभ घोटाला, कार्बेट टाइगर रिजर्व पार्क में अतिक्रमण से जुड़े मामले प्रमुख थे। इन सभी मामलों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और सत्ता में लौटी। सत्ता में आने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने भी अप्रैल 2013 में केआर भाटी आयोग का गठन किया। भाटी ने टीडीएस बीज घोटाले के मामले में जांच रिपोर्ट भी सौंपी जिस पर पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज हुई। भाजपा नेताओं की गर्दन फंसते देख विपक्ष ने तीखा प्रतिरोध किया जिसके चलते भाटी ने इस्तीफा दे दिया। सरकार ने फिर जांच की जिम्मेदारी न्यायमूर्ति सुशील चंद्र त्रिपाठी को सौंपी। त्रिपाठी आयोग ने घोटालों की सूची में से सात मामलों की जांच पर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपी। इस रिपोर्ट को सरकार दबाकर बैठ गई। जनता आज भी कार्रवाई का इंतजार कर रही है।

करोड़ों फूंक डाले
जनता को बरगलाने और तात्कालिक सियासी फायदे के लिए सरकारों द्वारा गठित जांच आयोगों पर पैसा लुटाने वाले सत्ता की मौज लूट रहे हैं। वहीं जनता इन आयोगों का हश्र देख रही है लेकिन सरकार से कोई पूछने वाला नहीं है कि जब उसे जांच रिपोर्टों पर कार्रवाई नहीं करनी थी तो उसने जांच आयोगों का गठन ही क्यों किया? सरकार चाहे जो तर्क दे लेकिन असलियत यही है कि जांच के नाम पर सरकारों ने तीन करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च कर डाली। यदि आयोग पर खर्च का सिलसिलेवार आकलन करें तो सबसे अधिक राशि 28 मार्च 2013 से 31 अक्टूबर 2014 के दौरान सुशील चंद्र त्रिपाठी आयोग पर एक करोड़ 38 लाख 65 हजार 500 रुपये खर्च हुए। केआर भाटी आयोग की जांच सरकारी खजाने पर 29 लाख 80 हजार 434 रुपये की पड़ी। सरकार ने जस्टिस बीसी कांडपाल जांच आयोग पर 66 लाख 77 हजार 165 रुपये और 56 घोटालों की जांच करने वाले जस्टिस एएन वर्मा, जस्टिस आरए शर्मा और जस्टिस शंभू नाथ श्रीवास्तव पर 73 लाख 700 रुपये खर्च किए।

यह सब सियासी स्टंट
राजनीतिक मामलों के जानकार सुरेंद्र आर्य ने जांच आयोगों के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि सियासी प्रतिद्वंद्वियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के सिवाय उत्तराखंड में घोटालों की जांच की कोई उपयोगिता नहीं रही है। कांग्रेस सरकार ने भी चुनावी साल में जमीनों के घोटालों की जांच का जो निर्णय किया है वह भी सियासी स्टंटबाजी ही माना जा रहा है। अब तो लोग इन जांचों का मजाक उड़ाने लगे हैं कि यहां घोटाले दर घोटाले जुड़ते हैं, जांच में माइनस हो जाते हैं। जब प्लस और माइनस जुड़ते हैं तो नतीजा शून्य ही आता है। उत्तराखंड में घोटालों की जांच का यही नतीजा है।

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