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महाशिवरात्रि विशेष : असंगतियों के देवता भगवान शिव

कोई देवता इतने विरोधों से भरा क्यों होगा? क्योंकि हम ऐसा ही चाहते हैं। वे हमें आकर्षित करते हैं। और फिर वे हमें संतुलित करते हैं

2018 Shivratri 13 Feb- Amishअमीश त्रिपाठी

मेरे एक युवा पाठक ने भगवान शिव को देवताओं का ‘ड्यूड’ कहा था। आप सोच सकते हैं कि किस बात ने उन्हें आधुनिक स्त्री-पुरुषों के बीच इतना लोकप्रिय बनाया है? वे तो सिंह की खाल लपेटने वाले एक वैरागी हैं जो अपने शरीर पर राख मलते हैं, खाली समय में अपने भयानक दोस्तों के साथ भांग पीते हैं, और श्मशान घाट में डांस करते हैं। क्या यह ‘कूल’ देवता जैसा सुनाई देता है? यह तो इसका विपरीत सा मालूम देता है… है ना? लेकिन विपरीत होना ही उनका तरीका है। और इसी में राज छिपा है उस गहन समर्पण भाव का जो वे उत्पन्न करते हैं।

मैं थोड़ा सा असहमत हूं और अंग्रेज लेखक चार्ल्स डिकेंस की पुस्तक, ‘ए टेल आॅफ टू सिटीज’ की एक पंक्ति है: वह बेहतरीन समय था, वह बदतरीन समय था। यह हमारी वर्तमान दुनिया का सारगर्भित वर्णन करने के लिए भी लिखा गया हो सकता था। हम जटिल विरोधों के दौर में रहते हैं, साथ ही साथ गोरखधंधों में लिपटे हुए हैं! कुछ मायनों में एक बार फिर यह कहा जा सकता है कि यह बेहतरीन दौर है, साथ ही साथ बदतरीन दौर भी है। हजारों साल में स्त्रियों के पास जितने अधिकार थे, आज उनके पास उससे कहीं ज्यादा अधिकार हैं। फिर भी स्त्रियों के खिलाफ जुर्म में कोई कमी नहीं है। धार्मिक उदारवाद की दुनिया भर में बलपूर्वक रक्षा की जा रही है जो पहले कभी इतनी अच्छी तरह जुड़ी हुई नहीं थी। तकनीक और उत्सुकता का परिणाम विभिन्न मतों के बीच एक स्वस्थ संवाद के रूप में सामने आया। मगर फिर भी धार्मिक कट्टरवाद दुनिया की धज्जियां उड़ाए दे रहा है।

मानव इतिहास में शायद पहली बार निर्धन जायज तौर पर ऐसी जीवनशैली का सपना देख सकता है जो कि पहले अकल्पनीय ही था, मगर फिर भी हमारे आर्थिक विकास की तीव्र गति पर्यावरणीय पतन की धमकी दे रही है। सामाजिक मीडिया सारी दुनिया को करीब लाया है और हमारी जिंदगी बजाहिर तौर पर लोगों से भर गई है, मगर फिर भी बहुत से लोग हताशाजनक रूप से एकाकी हो गए हैं। सेक्स मीडिया और सार्वजनिक स्थानों पर छाया हुआ महसूस होता है मगर फिर भी यौनेच्छा और इच्छा को लेकर लोग भयानक अपराधबोध से भरे हुए हैं। हम प्रेम के बेइंतहा सार्वजनिक प्रदर्शनों और जश्नों से घिरे हुए हैं मगर वह जज्बाती सहारा गुम हो गया महसूस होता है जो सरल मगर गहरा, अघोषित प्यार प्रदान करता है।

हां, यह गहन परिवर्तन और विरोधों का दौर है।

तो क्या यह हैरानी की बात है कि वे भगवान जो हमें ऐसे दौर में ला सकते हैं, वे विपरीतताओं के देवता भी हो सकते हैं?

निस्संदेह, वे ऐसे वस्त्र धारण करते हैं जिसे कोई सभ्य समाज में नहीं पहनेगा, मगर वे कई कलाओं के जनक भी हैं जो उच्चवर्ग को पसंद हैं। वे नटराज हैं। पौराणिक कथा कहती है कि नीलकंठ ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के रहस्यों को महर्षि नारद को बताया था। वे भांग पीते हैं वह नशीली दवा जो मन के सामने एक दिव्य संसार उजागर करती है मगर भौतिक शरीर को नुकस़्ाान पहुंचाती है। इसी के साथ वे योग के प्रणेता आदि योगी भी हैं, जो शारीरिक, मानसिक, भावात्मक और आध्यात्मिक संतुलन का मार्ग है। वे बेढंगे, असभ्य और यहां तक कि भयंकर साथियों को पसंद करते हैं मगर फिर भी वह प्यार और सम्मान जिससे वे अपनी पत्नी के साथ व्यवहार करते हैं, सज्जनता के लिए एक सबक है। वे वैरागी हैं, आत्मत्याग के सबसे बड़े गुरु जो भौतिक दुनिया को दूर रखना पसंद करते हैं मगर अपनी पत्नी के साथ उनका श्रृंगारिक प्रेम लोककथाओं का विषय है। उनके प्रतीक शिवलिंग को अनेक लोग उत्पत्ति का लैंगिक प्रतीक मानते हैं। वे उच्चवर्ग-विरोधी देवता हैं जो वंचितों, दीनों और हाशिए पर  लोगों के पक्ष में हैं मगर सबसे ताकतवर राजाओं ने उनके विशाल मंदिर बनवाए हैं। वेदों के उत्पत्तिकर्ता के रूप में उनके पास युगों का ज्ञान है मगर फिर भी उनके बालसुलभ भोलेपन के कारण उनके भक्त प्रेम से उन्हें भोलेनाथ कहते हैं यद्यपि आप उनके ‘रुद्र रूप’ से भय खा सकते हैं, मगर उनके भक्तों का स्वामित्व भरा प्रेम अटल रहता है।

कोई देवता इतने विरोधों से भरा क्यों होगा? क्योंकि हम ऐसा ही चाहते हैं।

वे हमें आकर्षित करते हैं। और फिर वे हमें संतुलित करते हैं।

संभ्रांत लोग भगवान शिव की ओर इसलिए आकर्षित होते हैं कि वे कलाओं के देवता हैं। और अगर कोई संभ्रांत सच्चा भक्त है तो वह महादेव से वंचितों के प्रति संवेदनशीलता सीखेगा। एक साधारण व्यक्ति भगवान शिव की ओर इसलिए आकर्षित होता है क्योंकि वे इस तरह से व्यवहार करते हैं मानो वे उनमें से ही एक हों। मगर साधारण व्यक्ति, समय के साथ, भगवान शिव से सीखेगा कि वह भी इच्छा कर सकता है और उसे हासिल कर सकता है; लीजेंडरी कणप्पा नयनर की तरह। महादेव अफीम पीने वाले लोगों को भी आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन अगर वह सच्चा भक्त है तो वह नीलकंठ के फलसफे  में गहरे उतरेगा और सीखेगा कि योग और आध्यात्मिकता उसे कहीं ज्यादा नशा दे सकते हैं और मेरे जैसा एक पूर्व-नास्तिक भगवान शिव की दुनिया में इसलिए खिंचा चला जा सकता है क्योंकि… वे ऐसा चाहते हैं। वे अपने भक्तों का सम्मान करते हैं और जब महादेव की कहानियों की गहरी समझ विकसित की तो मैंने जाना कि प्रभु चाहते हैं कि हम सभी धर्मों और देवताओं का सम्मान करें।

बहुत बार, शांति पाने के लिए, अपने व्यस्तताओं भरे जीवन का सतुंलित करने के लिए हमें विपरीतताओं को अंगीकार करना पड़त़्ाा है। मैंने भगवान शिव के प्रति अपने समर्पण से अपना सतुंलन और शांति पा ली है। उम्मीद करता हूं कि आप भी पा लेंगे।

 

प्रसन्नमना धार्मिक एवं उदारवादी

मैं शिव भक्त हूं। और मैं उतना ही भक्त हूं जितना कोई हो सकता है। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि अपने घर के पूजाघर में मैंने बीच में भगवान शिव की प्रतिमा रखी है। उसके पास ही बेशक अन्य हिंदू देवताओं की प्रतिमाएं हैं, जैसे भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान गणेश, भगवान कार्तिक, दुर्गा मां, काली मां, पार्वती मां, सरस्वती मां, लक्ष्मी मां, और भी अन्य कई (हम हिदुंओं के बहुत सारे भगवान हैं)। उतनी ही मुख्यता से आप काबा की, मदर मेरी, जीजस क्राइस्ट, गौतम बुद्ध, गुरु नानक, पैगंबर, जरथुष्ट्र और डेविड के स्टार को पाएंगे। मैं सबकी पूजा और सम्मान करता हूं।

मेरे मित्र मजाक में कहते हैं कि मैं अपने दांव खेल रहा हूं- यह सुनिश्चित करते हुए कि मुझ पर ‘ईश्वर’ की कृपा हो जाए, इससे बेपरवाह कि ‘सच्चा धर्म’ क्या है! मगर मैं तो बस अपने देश की संस्कृति के प्रति ईमानदारी बरत रहा हूं।

किशोरावस्था में मैं नास्तिक था; कई साल तक मैं ऐसा ही रहा। नब्बे के दशक के आरंभ में बार-बार हो रहे सांप्रदायिक दंगों ने मुझे धर्म से दूर कर दिया था। मेरे धर्मनिष्ठ पिता ने मुझे समझाने की कोशिश की कि धार्मिक उग्रवाद का सामना धर्मनिरपेक्ष उग्रवाद से नहीं किया जा सकता, क्योंकि उग्रवाद का कोई भी रूप कारगर नहीं होता है। धार्मिक असहिष्णुता का विरोध धर्मनिरपेक्ष असहिष्णुता से करने से केवल एक दानव की जगह दूसरा दानव ले लेता है। उस समय अपने पिता के शब्दों का महत्व मुझे समझ नहीं आया था। अब आता है।

धार्मिक उग्रवाद का जवाब धार्मिक उदारवाद में निहित है। यह हमें अपने अगले प्रत्यक्ष सवाल पर लाता है: उदारवाद क्या है? आधुनिक भारतीय जनता ने उदारवाद की परिभाषा को तोड़-मरोड़ दिया है। उदार होने को अक्सर वामपंथी समझ लिया जाता है। मगर बहुत से वामपंथी उतने ही अनुदारवादी हैं जितना कि वे दक्षिणपंथी उग्रवादी जिनका वे विरोध करते हैं।

उदारवाद की सबसे अच्छी परिभाषा एक उद्धरण में सामने आती है जिसे लोकप्रिय तौर पर और अलबत्ता गलत ही वॉल्तेयर का माना जाता है… वास्तव में इसे एवलिन हॉल ने लिखा था: ‘आप जो कह रहे हैं मैं उसे अस्वीकार करती हूं मगर मैं मरने तक यह कहने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगी।’

इसे धार्मिक उदारवाद से कैसे जोड़ेंगे? बहुत सरल है। मेरे पास अपना सच्चा धर्म है और आपके पास आपका अपना सच्चा धर्म है। मैं अपने धर्म का पालन करने के आपके अधिकार का सम्मान करूंगा और आपको अपने धर्म का पालन करने के मेरे अधिकार का सम्मान करना होगा।

उदारवाद को उच्चवर्ग द्वारा लागू किया जाना चाहिए, (और कभी-कभी संविधान द्वारा अनिवार्य होना चाहिए) अगर समाज मूलत: कट्टर है तो। वास्तव में हमने अनेक समाजों में ऐसा देखा है। भारत में ऐसा नहीं है। हम मूलत: ऐसा समाज हैं जो वास्तव में धार्मिक और उदारवादी है। कहा जा सकता है कि हम एवलिन हॉल के विचारपूर्ण कथन से परे जाते हैं। हम उन धर्मों को ‘बर्दाश्त’ करने का ढोंग नहीं करते जिन्हें हम अंदरूनी तौर पर ‘नापसंद’ करते हैं। हम सक्रियतापूर्वक उन धर्मों का सम्मान करते हैं और उन्हें अपनाते हैं जो हमसे भिन्न होते हैं। ऋग्वेद इस दर्शन को खूबसूरती से अंगीकार करता है: एकम् सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति। सत्य एक है, मगर बुद्धिमान लोग इसे अनेक रूप से कहते (या जानते) हैं।

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