यौन शोषण में फंसे आईजी

कमलेश पाण्डेय ।

समाज में नैतिकता की कानूनी पहरेदारी पुलिस ही करती है लेकिन अगर पुलिस के ऊंचे ओहदेदार ही नैतिकता को दरकिनार करने लगें तो फिर सवाल उठना लाजिमी है। बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक पवन देव पर एक महिला कांस्टेबल द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप को सिर्फ एक षडयंत्र के रूप में नहीं देखा जा सकता। बल्कि इस मसले पर सोशल मीडिया में आईजी के समर्थक और विरोधी जिस तरह से आपस में भिड़े उससे इस गंभीर आरोप पर उनकी अंसवेदनशीलता ही दिखी। हालांकि यह जांच का विषय है कि आरोप सच है या झूठ मगर आईजी साहब इस पूरे घटनाक्रम को अलग ही रंग देने में लगे हुए हैं। उनका बार-बार यही कहना है, ‘इस षडयंत्र के पीछे एक पुलिस इंस्पेक्टर है जिसे उन्होंने बर्खास्त किया है। आरोप लगाने वाली कांस्टेबल से उस इंस्पेक्टर का संबंध है। बदला लेने के लिए ही बर्खास्त इंस्पेक्टर ने यह षडयंत्र रचा है।’

मगर उस आॅडियो के बारे में कोई बात नहीं कर रहा जिसमें आईजी अपनी बेटी की उम्र की कांस्टेबल से सारी हदें लांघकर बात कर रहे हैं। न ही इस बात को लेकर कोई चर्चा हो रही है कि नशे में आईजी द्वारा गाड़ी भेजकर रात के 2-3 बजे महिला कांस्टेबल को अपने बंगले पर बुलाना कैसे सही है। शिकायतकर्ता महिला के सम्मान की सुरक्षा की भी किसी को चिंता नहीं हो रही है। सोशल मीडिया पर एक धड़ा आईजी की समर्थन करने वाला है तो दूसरा उनका विरोधी। मगर इसमें कोई ऐसा नजर नहीं आ रहा जो कम से कम उस पीड़िता के नजरिए से पूरा मामला देख रहा हो। हो सकता है कि जांच में सारी बातें झूठ निकले। हो सकता है कि इसके पीछे षडयंत्र हो। मगर यह भी सच है कि आईजी पवन देव पर पहले भी इस तरह के आरोप लग चुके हैं। राजनांदगांव में एसपी रहते हुए भी उन पर ऐसे ही आरोप लगे थे। तब पुलिस मुख्यालय में गोपनीय शाखा में तैनात एक महिला पुलिसकर्मी ने उनके चरित्र पर सवाल उठाए थे।

पुलिस महकमे में गाहेबगाहे ऐसे ही सुलूकों और बर्तावों का शिकार कई महिला पुलिसकर्मी होती रही हैं मगर अफसोस इस बात का ज्यादा है कि इस मसले पर वो भी असंवेदनशीलता दिखा रही हैं। शिकायतकर्ता पीड़िता जिस मुंगेली जिले में पदस्थ है सौभाग्य से वहां की कमान महिला पुलिस अफसर के हाथ ही है। मगर उनकी ओर से भी इस मसले पर कोई ऐसा बयान नहीं आया जो पीड़िता के लिए मरहम समान हो। एक महिला अफसर अगर दूसरी महिला सहकर्मी के गंभीर मसले पर भी संवेदनशीलता न दिखाए तो इसे क्या माना जाए। बड़े ओहदेदार पर आरोप लगाने के बाद शिकायतकर्ता की सुरक्षा के बारे में पूछने पर महकमे से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा। यौन पीड़ित महिला कांस्टेबल इस वक्त कहां है किसी को नहीं पता। उसकी सुरक्षा को लेकर क्या किया जाएगा कोई नहीं जानता। अफसोस इस बात का भी है कि तमाम तथाकथित सामाजिक लोग भी इस मामले में आईजी का साथ दे रहे हैं। मामले की जांच के बगैर ही उन्होंने आईजी को चरित्रवान घोषित कर दिया है।

उस पीड़िता के नजरिए से सोचने की किसी ने जहमत नहीं उठाई जिसने अपने ही महकमे के आला अफसर की करतूत जगजाहिर की। इसके बाद क्या वह खुद को सुरक्षित महसूस कर पा रही होगी। हालांकि मुंगेली पुलिस ने जांच के नाम पर शुरुआती औपचारिकता पूरी कर दी है लेकिन मुहरों और मुहर्रिरों से चलने वाले इस कायदे में क्या उसे इंसाफ मिल पाएगा क्योंकि जैसे ही बात अपने पर आती है तो जांच करने वाले पुलिस अफसर खुद को फायदा-नुकसान के तराजू पर रखकर मामले को देखने लगते हैं।

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