घटिया हास्य का बोलबाला था, जंग छेड़ी तो मेरा विरोध किया

कैसी है हिंदी कवि सम्मेलनों की दुनिया?

बीसवीं शताब्दी के शुरू में कानपुर में अंग्रेज रेजीडेंट के घर पर हिन्दी का पहला आधिकारिक कवि सम्मेलन होने की सूचना मिलती है। रेजीडेंट की पत्नी कविता लिखती थीं। उन्होंने पति से कहा कि यहां भी भाषा के कवि भी तो कविता लिखते होंगे, मैं उनको सुनना चाहती हूं। एक अनुवादक भी मुझे चाहिए। तो उस समय के कवि गया प्रसाद शुक्ल सनेही और कुछ अन्य कवि बुलाए गए।

सम्मेलन की फोटो भी किसी अखबार में है। कवि लोग अर्द्धवृत्ताकार फ्रेम में बैठे हैं। पीछे तकिए लगे हैं। और बीचोंबीच गोल वाला ध्वनि विस्तारक यंत्र दिखाई दे रहा है। लोग, भाषा, समाज का चलन कहां के कहां पहुंच गया, हिन्दी के कवि सौ सालों से ज्यादा तक वैसा ही करते रहे। समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप अपना रूपान्तरण नहीं किया।

संभवत: मैं अकेला व्यक्ति था जिसने इस पर काम किया। जब मैंने 2001 या 2002 में काम शुरू किया तो मुझे भीषण विरोध का सामना करना पड़ा। हिन्दी के जितने मानक सितारे आज की तारीख में मंचों पर महारथी हैं, उनमें से 24 ने एक पत्र पर हस्ताक्षर कर कहा कि ये जहां जाएगा, वहां हम नहीं जाएंगे।

आज की तारीख में वे वापस आ गए हैं। फोटो साथ में खिंचवाते हैं, फेसबुक पर लगाते हैं। अपने पोतों, बच्चों को लेकर सेल्फी खिंचवाने आते हैं। मेरी प्रशंसा करते हैं। मैं 17 साल में मंच पर आया अब 47 का हूं। कभी किसी से तू-तू-मैं-मैं नहीं हुई। ऐसे कई कार्यक्रम हुए जिनमें मैं नहीं गया। सुब्रत राय ने एक कार्यक्रम कराया था हरिवंशराय बच्चन जी की स्मृति में। मुझे भी बुक किया। लेकिन जो बड़े कवि वहां बुलाए गए थे, उन्होंने कहा कि अगर विश्वास आएगा तो हम  नहीं आएंगे। फिर आयोजकों ने मुझसे कहा कि आप मत आइए।

मैं उससे वंचित रहा लेकिन रुका थोड़े ही। मैं युवाओं के बीच गया। आईआईटी, आईआईएम के लड़के-लड़कियों के बीच जाना-आना शुरू किया। कविता सुनाना शुरू किया। पैसे तब बहुत कम मिलते थे। रिस्क भी बहुत रहता था कि उनको कविता पसंद आएगी कि नहीं आएगी। फिर मैंने उनके साथ संवाद की एक भाषा बनाई और एक पड़ाव तैयार हुआ।

मैंने एनडीटीवी की एक लड़की का स्टेटमेंट पढ़ा कि ‘जब मैं आईआईएमसी आई थी तो पहली बार हिन्दी कविता के संपर्क में कोई दीवाना कहता है के माध्यम से आई थी। उसके बाद मेरी पढ़ने की उत्सुकता बढ़ी तो मुझे लगा कि यह तो सामान्य सा कवि है, साहिर इससे कहीं ज्यादा अच्छा है। फिर फैज पढ़ा। सीरिया की कवयित्री को पढ़ने लगी। लेकिन आज मैं कुमार विश्वास को इसलिए क्यों गाली दूं कि मैं दुनिया के तमाम बड़े कवियों को पढ़ती हूं, जिनके मुकाबले वह कोई खास नहीं है। वह मेरा प्रस्थान बिंदु था और वह उसी रूप में सदा के लिए आदर योग्य है। उतना ही काम था उसका। वो आगे और अच्छा लिखेगा तो मैं उसे और ऊपर स्थान दूंगी।’

आज पाकिस्तान में गुलाम रसूल कादरी समेत कई गायक मुझे गाते हैं। यू ट्यूब पर काफी चीजें हैं। तमाम देशों में लड़के-लड़कियां मुझे गाते हैं। मैं तो चाहता हूं कि ब्राजील में युवा मुझे गाएं और मेरे माध्यम से हिंदी समझना शुरू करें।

 

आपका विरोध क्यों हुआ?

देखिए, सत्तर के दशक तक साहित्य के मानक कवि मंच पर थे। दिनकर जी, भवानीप्रसाद मिश्र, देवराज दिनेश, रामावतार त्यागी ये सब मंच पर थे। महादेवी जी भी मंच पर आती थीं। लेकिन जब हिन्दी के मंचों पर हास्य के कवि आने शुरू हुए… हालांकि अब वह दिवंगत हो चुके हैं और ऐसी परंपरा है कि दिवंगत लोगों के विषय में टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। लेकिन यह सही घटना है कि महीयसी महादेवी वर्मा ने मंच छोड़ा मंच पर काका हाथरसी को सुनने के बाद। उन्होंने कहा कि यह कविता यहां हो सकती है तो मेरा यहां स्थान नहीं। खैर।

उसके बाद हास्य के नाम पर कुछ लोग मंचों पर चढ़ गए। उन्होंने मंच कब्जा लिया। नीरज जी जैसे एकाध लोग ही बच पाए क्योंकि तब तक वे कद में इतने बड़े हो चुके थे कि आप उन्हें हिला नहीं सकते। तमाम बड़े और गुणी गीतकार दब गए। घटिया हास्य का बोलबाला था। मैंने इसके खिलाफ जंग छेड़ी। हास्य तो मैं सहज संवाद में पैदा कर लेता था। और उसके बाद आ जाता था गीत पर। तो इन सब लोगों ने मेरा विरोध किया कि ये तो हमारे लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

और मैं ही क्या, सुना तो यहां तक है कि जब नोबल पुरस्कार देने के लिए अज्ञेय जी के नाम पर विचार किए जाने की हवा यहां कुछ भाई लोगों को लगी तो बाकायदा एक लॉबी बनाकर विदेश में रह रहे कथा-साहित्य के एक बड़े नाम से नोबल समिति तक यह संदेशा भिजवाने की कोशिश हुई कि हिन्दी में कुछ खास काम नहीं हुआ है।

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