फिल्मों में क्रेडिट ना देने की प्रथा बंद हो, सच के लिए मेरी लड़ाई जारी रहेगी- मनोज मैरता

मनोज मैरता की लिखी फिल्म “मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर” पर निर्देशक राकेश ओमप्रकश मेहरा ने फिल्म बनाई है। फिल्म भारत सरकार के स्वछता मिशन के थीम पर आधारित है। हालांकि अब फिल्म के निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा और लेखक मनोज मैरता के बीच फिल्म में क्रेडिट को लेकर कानूनी जंग छिड़ गई है। फिल्म में क्रेडिट को लेकर हुए विवाद और कई अहम पहलुओं पर निशा शर्मा ने बात की फिल्म लेखक मनोज मैरता से

आप कह रहे हैं आपने स्क्रिप्ट लिखी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा कह रहे हैं उन्होंने लिखी है मामला क्या है विस्तार में बताएं।

उन्होंने ऐसा क्यों कहाँ मुझे नहीं पता पर आप ही सोचिये मेहरा जी इतने बड़े डायरेक्टर है अगर उन्होंने “मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर” लिखी या उन्हें कहीं से स्टोरी का आईडिया आया होता तो वो मेरी स्क्रिप्ट क्यों लेते। मैं तो किसी बड़े राइटर का बेटा नहीं हूँ और न ही मेहरा जी का रिश्तेदार। न ही इससे पहले मेरी कोई फिल्म आई है जो ब्लॉकबस्टर हो गयी और मेहरा जी मेरे काम से इम्प्रेस्सेड हो गए और मुझे फिल्म के लिए ले लिया। अगर आईडिया या कहानी उनके पास था तो वो खुद लिखते या किसी बड़े राइटर को लेते। अगर मुझे लिया है इसका मतलब है था उनके पास कुछ नहीं था।

मैंने “मेरे प्यारे प्राईम मिनिस्टर” का आईडिया सोचा, कहानी लिखी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखे यानी एक बाउन्ड स्क्रिप्ट और खुद डायरेक्ट करने के लिए प्रोड्यूसर से मिल रहा था। मेहरा जी से भी इसी सिलसिले में मिला और 120 पेज की स्क्रिप्ट पहली मीटिंग में उन्हें दी। हमारा अग्रीमेंट हुआ है अगर इस पर भी मेहरा जी कह रहे हैं कि उन्होंने लिखी है तो बड़ा ही हास्यास्पद और ओछी बातें लगती हैं।

अगर आप फिल्म निर्देशित करना चाह रहे थे फिर लेखक की भूमिका में कैसे आए ?

बनना तो मैं डायरेक्टर ही चाहता था और अभी भी बनना चाहता हूँ, पर डायरेक्टर कैसे बनूँगा न मैंने कहीं से कोई कोर्स किया है डायरेक्शन में और ना ही कोई डायरेक्टर अपने साथ असिस्ट करने का मौका देते थे। ऐसे में मैंने सोचा मेरा प्लस पॉइंट क्या है…मैं लिख सकता हूँ। खुद की लिखी स्क्रिप्ट अच्छी होगी तो कोई भी मेरे साथ काम करने को तैयार हो जायेगा और नहीं होगा तो मैं अपनी स्क्रिप्ट नहीं दूंगा। डायरेक्टर ना बन पाने के भय ने मुझे राइटर बनने के लिए उकसाया। ये स्क्रिप्ट मैंने 2012 में लिखी थी। उस समय मैं दिलीप शुक्ला जी को दबंग 2 में बतौर एसोसिएट राइटर असिस्ट कर रहा था। मैं तो डायरेक्टर बनने के लिए ही मुंबई आया था। मैं एक ऐसी कहानी से डायरेक्शन में आना चाहता था जब मुझे एक अलग पहचान दिलाए। रोज़ में नयी कहानिया लिखता था और हर दिन निर्णय करता था की इस कहानी को स्क्रिप्ट में डेवेलप करता हूँ जैसे ही काम करता था आगे जाकर मेरा उस सब्जेक्ट से इंटरेस्ट टूट जाता था। इस तरह करते करते मैंने पचासों कहानिया लिखी

आपको कब लगा कि आप सही दिशा में हैं?
ऐसे ही नहीं बन गया राइटर…काफी पापड़ बेले…3 साल तक इंडस्ट्री के बड़े नामचीन राइटर के साथ बतौर सहायक लेखक काम किया और इसी दौरान कई कहानी लिखी। कई लोगों को अपनी लिखी कहानियां सुनाई। लोग कहानी की तारीफ करने लगे तब महसूस होने लगा कि मैंं सही दिशा में हूं।

इस फिल्म की कहानी की उपज कहाँ हुई?

ये फिल्म मैंने दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के जीवन की मूलभूत समस्याओं को केंद्र में करके लिखी थी। दिल्ली देश की राजधानी है, सत्ता का केंद्र है। इसके बावजूद यहाँ स्लम में रह रहे लाखों लोगों की जिन्दगी नरक बनी हुई है। पानी, बिजली, टॉयलेट, सिवेरेज कुछ भी नहीं है इनके पास। देश में ओपन डेफिकेशन यानी खुले में शौच एक बड़ी समस्या है और ये हमारे लिए बड़ी शर्म की बात है। हम चाँद पर पहुंच गए हैं, पर ज़मीन पर रहने वाले लोगों के लिए एक टॉयलेट नहीं बना पा रहे हैं और हम बनाना भी नहीं चाह रहे हैं। दोनों बातें हैं। इसी व्यथा को मैंने यमुना पार स्लम में रहने वाले एक ८ साल के लड़के कन्हैया के जरिये दिखाया था, पर बाद में कहानी दिल्ली से मुंबई टेक्निकल कारण से शिफ्ट हो गई। मुंबई एशिया का सबसे बड़ा स्लम है और यहाँ लोगों की स्थिति और भी ख़राब है। मैंने मुंबई के कई चाल में रिसर्च भी किया। दिल्ली के जुग्गी झोपड़ी में भी रिसर्च किया था। रेलवे से यात्रा करने के दौरान प्लेटफार्म से सटी झुग्गी झोपड़ी के लोगों, महिलाओं, बच्चों को पटरी किनारे खुले में शौच करते देखा तो लगा कि ये इतनी बड़ी समस्या है पर इस पर जागरूकता नहीं है। मा-बेटे के बीच एक अटूट रिश्ते के जरिये इस मुद्दे को मैंने कहानी में पिरोया और फिर पूरी स्क्रिप्ट लिखी और खुद ही डायरेक्ट करने के लिए सोचा।

आपने इतने बड़े मुद्दे को एक छोटे बच्चे के जरिये कहने के लिए चुना क्यों? इतना बड़ा मुद्दा था खुले में शौच उस समय?

इस कहानी को बच्चे के जरिये अपनी बात कहने, रखने का एक ही उदेश्य है की मैं लोगों में सोच जगाना चाहता हूँ की जब ८ साल का बच्चा अपनी माँ के लिए टॉयलेट बनाने की सोच सकता है तो समझ लीजिये की आपके लिए एक वेक-उप कॉल है।

डर नहीं लगा की आपकी लिखी इस स्क्रिप्ट पर कौन एक्टर काम करेगा, कौन प्रोड्यूसर पैसा लगेगा और कौन डायरेक्ट करेगा ?

देखिये कहानीकर्, लेखक जब एक कहानी लिखता है तो वो इन सब चीज़ों के बारे में नहीं सोचता है. कहानी दिल से निकलती है. कई बार परिस्थियों से प्रेरणा मिलती है. कहते हैं न वियोगी होगा पहला कवी, आह से उपजा होगा गान, विडम्बना वही पास खड़ा छेड़ता होगा उलटी तान. मेरे साथ भी यही हुआ. मैं जहाँ भी जाता था चाहे वो मेरा गाँव हो, दिल्ली हो, मुंबई के स्लमस हो, मेरी नज़र हर जगह खुले में शौच करते लोगों पर ही जाता था, मैं भी १० साल तक लोटा उठकर बहार गया हूँ। जब कभी महिलओं को बहार में देखता तो वो शर्म से  उठ खडी  होती थी, इस पीड़ा ने मुझे ये कहानी को लिखने के लिए इंस्पायर्ड किया।

इस विषय पर कहां से आइडिया आया, कहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुहिम ने तो प्रेरित नहीं किया ?

दिल्ली में शाहदरा इलाके से कश्मीरी गेट जाते हुए यमुना क्रॉस कर रहा था तभी ये कहानी वहां सैंकड़ों झुग्गियों को देखकर मेरे जहन में आई। 2012 में मैंने ये कहानी सोची थी, मोदी जी 2014 में आये थे। यहाँ तक की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोजी का लाल किला से स्वच्छता के बारे में बात करने वाला सीन भी क्लाइमेक्स में मैंने मोदी जी के भाषण से पहले लिखा था की फर्स्ट टाइम इन द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया अ प्राइम मिनिस्टर इज टॉकिंग अबाउट ओपन डेफेकेशन फ्रॉम रेड फोर्ट और पूरे देश में इसके खिलाफ़ मुहिम चलाने की बात करते हैं।

कहानी में प्रधानमंत्री तो हैं ही, थोड़ा कहानी के बारे में बताईये?

एक 8 साल का लड़का अपनी मां के लिये टॉयलेट बनाना चहता है और इसके लिए पीएम को पत्र लिखता है।

फिल्म की कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है या इसमें कुछ ऐसा है जो आपने देखा भोगा हो?

कहानी काल्पनिक है पर ये पूरे देश का यथार्थ भी है।

फिल्मी दुनिया में लेखक हमेशा उतना क्रेडिट नहीं ले पाता जितना उसे मिलना चाहिये क्या कारण लगते हैं आपको इसके पीछे ?

हिन्दुस्तान में कहानीकारों की कोई कद्र नहीं है। कुछ हद तक लेखक भी जिमेदार है इसके लिये।

 आजकल ऐसा आम देखने को मिलता है कि कोई बड़ा निर्देशक या निर्माता किसी की फिल्म को अपने नाम से बना देता है, आपको डर नहीं लगा की कहानी का क्रेडिट आपके हाथ से जा सकता है, कहानी या पटकथा में निर्देशक अपना नाम साझा करने की शर्त रख सकता हैं?

कमज़ोर और खुद को असुरक्षित पाने वाले निर्देशक ऐसा करते हैं।

क्या कुछ इस तरह का कॉंट्रेक्ट भी होता है कि स्क्रीप्ट में कोई भी तब्दीली आपसे बिना बातचीत या पूछे नहीं की जा सकती?

हां ऐसा है, फिल्म माध्यम एक टीम वर्क है जहाँ डायरेक्टर सब को एक साथ लेकर चलते हैं। डायरेक्टर कुछ भी नहीं होते हैं अगर आपके पास एक स्क्रिप्ट नहीं है।  बड़े अफ़सोस की बात है कि हमारी फिल्म इंडस्ट्री में राइटर की कद्र नहीं है। कमरे के अन्दर आपकी स्क्रिप्ट की तारीफ़ करते हैं और बाहर आपके बारे में बोलना भी पसंद नहीं करते हैं।

अभी क्या लिख रहे हैं, आगे किसके साथ क्या प्रोजेक्ट है?

दो तीन स्क्रिप्ट लिख चुका हूँ।  अगले साल के अंत तक खुद भी एक फिल्म डायरेक्ट करने की तैयारी में हूँ।

क्या ये भी स्क्रिप्ट बच्चों पर है?

नहीं इसमें एक स्क्रिप्ट में बच्चा मुख्य किरदार में है। एक वुमन ओरिएंटेड एजुकेशन बेस्ड कहानी है जिसके लिए कंगना रानौत, सोनाक्षी सिन्हा, विद्या बालन जैसे स्ट्रॉंग एक्ट्रेस कहानी के करक्टेर्स में फिट बैठती है, हालांकि अभी किसी को एप्रोच नहीं किया है। लेकिन काम जारी है।

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