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हिन्दी दिवस- सौ देशों ने लगाया हिंदी का जयकारा

मॉरीशस में 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन की शुरुआत पोर्टलुई के विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय सभागार में अटल जी को श्रद्धांजलि देकर की गई, जहां 100 देशों के प्रतिनिधियों ने हिंदी की महत्ता पर चर्चा की। इस मौके पर उम्मीद जताई गई कि संयुक्तराष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिलेगी।

राकेश चंद्र श्रीवास्तव

सौ देशों के माध्यम से 18-20 अगस्त 2018 तक मॉरीशस में 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर पूरे विश्व का दर्शन हुआ। यह कोई मेला नहीं बल्कि महाकुंभ था। पूर्णत: अनुशासित, व्यवस्थित, उद्देश्यपूर्ण और नियंत्रित। अनेक गोष्ठियों-परिचर्चाओं के माध्यम से हिंदी की विश्वस्तरीय स्थिति, समस्याओं और समाधानों पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। 18 अगस्त को अटल जी की स्मृतियों की छाया में विश्व हिंदी सम्मेलन शुरू हुआ। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण जगन्नाथ ने पोर्टलुई के साइबर का नाम अटल बिहारी वाजपेयी साइबर सेंटर करने की घोषणा की।

हिंदी के इतिहास में जनवरी 1975 में हिंदी के पुरोधा लल्लन प्रसाद व्यास ने नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की जो नींव रखी थी, 43 वर्ष बीतने के बाद मॉरीशस में 11वां विश्व हिंदी सम्मेलन ‘वटवृक्ष’ के रूप में तैयार हुआ है। मॉरीशस में 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन की शुरुआत पोर्टलुई के विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय सभागार में अटल जी को श्रद्धांजलि देकर की गई। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण जगन्नाथ ने दीप प्रज्वलित कर सम्मेलन की शुरुआत की। उद्घाटन सत्र में सुषमा स्वराज ने कहा कि यह सम्मेलन हिंदी के विकास और संरक्षण पर केंद्रित है। आज हिंदी पढ़ने, बोलने और भाषा की शुद्धता को बरकरार रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अलग अलग देशों में हिंदी को बचाने की जिम्मेदारी भारत ने ली है। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ ने कहा कि पूरी दुनिया में 50 करोड़ से ज्यादा हिंदी भाषियों की संख्या को देखते हुए हिंदी के लिए वह दिन दूर नहीं जब संयुक्तराष्ट्र संघ में उसे आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिलेगी।

तीन दिन तक चले विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्य विषय ‘हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति’ रहा। सम्मेलन के दूसरे दिन 19 अगस्त को चार सत्रों में फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का संरक्षण, संचार माध्यम और भारतीय संस्कृति, प्रवासी संसार-भाषा और संस्कृति, हिंदी बाल साहित्य और भारतीय संस्कृति पर देश विदेश से आए प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस बात पर लगभग सभी एकमत दिखे कि हिंदी को विश्व भाषा बनाने के साथ भारतीय संस्कृति को भी उसी स्तर पर प्रसारित करने की जरूरत है। माध्यम चाहे जो रहे, लेकिन भारतीय संस्कृति से दुनिया को जोड़ने का प्रयास तेज किया जाना चाहिए। कवि एवं गीतकार प्रसून जोशी ने कहा कि जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण है उसी तरह हिंदी फिल्में भी समाज का प्रतिबिंब और हमारी संस्कृति इसका हिस्सा है। केंद्रीय राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा कि किसी देश की संस्कृति अलग नहीं होती है, पूरी दुनिया में वेदों की संस्कृति है। संचार माध्यम और भारतीय संस्कृति के महत्व पर चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर ने कावड़, कुंभ जैसे आयोजन की रिपोर्टिंग के माध्यम से बताया कि किस तरह मीडिया संस्कृति के विकास और सफर के हर पहलू के बारे में लोगों को रूबरू कराती रहती है। हिंदी को आगे बढ़ाने और दुनिया में उसे वाजिब हक और पहचान दिलाने के लिए एक कार्य योजना बनेगी जिससे अगले तीन वर्षों में इस दिशा में साफ अंतर दिखेगा। 20 अगस्त को इसी भरोसे और संकल्प के साथ मॉरीशस में आयोजित तीन दिवसीय विश्व हिंदी सम्मेलन संपन्न हुआ। तीसरे दिन आयोजित कार्यक्रम में मॉरीशस के मार्गदर्शक मंत्री पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने कहा कि हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। उन्होंने जब-जब देश की बागडोर संभाली हिंदी के विकास के लिए हर जरूरी कदम उठाए। उन्होंने गिरमिटिया संस्कृति की चर्चा करते हुए बताया कि किस तरह वर्षों पहले भारत से आए मजदूरों ने मॉरीशस को आजादी दिलाई थी। उन्होंने कहा कि मॉरीशस ने आज जो भी प्रगति की है उसमें हिंदी का बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि भारत माता है और मॉरीशस उसका पुत्र। उन्होंने कार्यक्रम का अंत जय मॉरीशस, जय भारत, जय हिंदी से किया। मॉरीशस में कार्यवाहक राष्ट्रपति परम शिव पिल्लै वया पुरी ने कहा कि यह सम्मेलन हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर ने कहा कि इस सम्मेलन से हमारी मैत्री और एकता को मजबूती मिलेगी।

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