नकली करेंसी सौ फीसदी चलन से बाहर हो जाएगी

डीसी पाठक
डीसी पाठक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय व आर्थिक सुरक्षा के मद्देनजर 500 व 1000 के पुराने नोट बंद करके नई करेंसी जारी की है। पूर्व आईबी डाइरेक्टर डी सी पाठक  एक ऐसे अधिकारी हैं जिनकी राष्ट्रीय व आर्थिक सुरक्षा के मुद्दों पर अच्छी पकड़ है। उनसे नोटबंदी के कई पहलुओं पर ओपिनियन पोस्ट के विशेष संवाददाता सुनील वर्मा ने चर्चा की।

सरकार ने कुछ दिन पहले ही 500 व 1000 रुपये के नोट बंद करके नई करेंसी जारी की है। असल वजह क्या मानते हैं?

डीमॉनेटाइजेशन के कई कारण हैं, जिसके दूरगामी परिणाम कुछ समय बाद देखने को मिलेंगे। अवैध कमाई यानी ब्लैकमनी का ब्योरा लोग सरकार को नहीं देते। इसे भ्रष्टाचार और घूसखोरी से लेकर अपराध व आतंकवादी गतिविधियों से जुटाया जाता है। यही ब्लैकमनी हमारे चुनावी तंत्र में शामिल होकर भ्रष्ट और नाकारा सरकारी तंत्र के रूप में सामने आती रही है। प्रचलित करेंसी को बंद करके सरकार ने ब्लैकमनी के तंत्र पर अंकुश लगाने का काम किया है। हमारी करेंसी के साथ प्रचलन में आ चुकी जाली करेंसी भी नई करेंसी जारी किए जाने की एक प्रमुख वजह रही है। यही वजह रही है कि पिछली सरकारें भी जाली करेंसी को रोकने के लिए पुरानी करेंसी को बदलने पर विचार कर चुकी थीं, लेकिन वे उस पर अमल नहीं कर सकीं। वर्तमान सरकार ने नोटबंदी का साहसिक कदम उठाया है। हो सकता है कि तात्कालिक रूप से कुछ दिक्कतें लोगों के सामने पेश आएं, लेकिन नोटबंदी के इस फैसले से लंबे समय तक देश जाली करेंसी से मुक्त रहेगा। भारत से छद्म युद्ध लड़ते हुए पड़ोसी देश पाकिस्तान ने पिछले कुछ सालों में हमारी करेंसी की हूबहू नकल करके कई सौ करोड़ की नकली करेंसी का जो अंबार अलग-अलग तरीकों से हमारे देश में लगाया, पुरानी करेंसी पर प्रतिबंध लगते ही वह कूड़े का ढेर बन गई है।

देश में जाली करेंसी अर्थव्यवस्था का नेटवर्क कितना बड़ा था कि हमें अपनी करेंसी को बंद कर नई करेंसी जारी करने का कड़ा फैसला लेना पड़ा?
भ्रष्टाचार और ब्लैकमनी पर लगाम लगाने के लिए तो सरकार लंबे समय से प्रयास कर ही रही थी। इसमें कुछ आंशिक सफलता भी मिली, लेकिन पाकिस्तान से तैयार होकर आई नकली करेंसी इतनी बड़ी तादाद में प्रचलन में आ चुकी थी कि उसे रोकने के लिए एक ही उपाय था कि जिस करेंसी की नकल हो चुकी है उसे बंद कर दिया जाए।

(पूरा इंटरव्यू ओपिनियन पोस्ट पत्रिका के ताजा अंक (1-15 दिसंबर) में पढ़ें। ई-पत्रिका आप हमारी वेबसाइट से भी डाउनलोड कर सकते हैं)

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