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मेघालय-त्रिपुरा में बिछी चुनावी बिसात

गुलाम चिश्ती

गुजरात और हिमाचल प्रदेश जीतने के बाद भाजपा ने अब अपना पूरा ध्यान पूर्वोत्तर के मेघालय और त्रिपुरा विधानसभा चुनावों पर लगा दिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 20-22 दिनों के अंतराल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का पूर्वोत्तर के दौरे पर आना है। पिछले वर्ष 16 दिसंबर को प्रधानमंत्री मेघालय के दौरे पर आए थे और ढेर सारी घोषणाएं कर चले गए। इसके बाद सात और आठ जनवरी को अमित शाह मेघालय और त्रिपुरा के दौरे पर रहे। इस दौरान शाह ने दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें बनने का दावा किया। फिलहाल मेघालय में कांग्रेस और त्रिपुरा में माकपा की सरकार है।
वास्तव में भाजपा त्रिपुरा और मेघालय विधानसभा चुनावों को लेकर ज्यादा गंभीर दिख रही है। वर्तमान परिस्थिति में पार्टी को लग रहा है कि वह त्रिपुरा में विराजमान दो दशक पुरानी माकपा सरकार को उखाड़ फेंकने में कामयाब होगी। दूसरी ओर जिस तरह मेघालय में कांग्रेस के विधायक पीए संगमा की पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) और भाजपा में शामिल हो रहे हैं उससे स्पष्ट है कि मेघालय में कांग्रेस की स्थिति पतली है। वहीं भाजपा को त्रिपुरा में सत्ता हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और वह कर रही है। पिछली बार अमित शाह ने अपनी त्रिपुरा यात्रा के दौरान तृणमूल कांग्रेस के छह विधायकों को भाजपा में शामिल कराने का ब्लूप्रिंट तैयार किया था। ऐसे में भाजपा वहां एक भी सीट जीते बिना छह विधायकों वाली पार्टी बन गई। सात जनवरी को अमित शाह ने जोरदार तरीके से माकपा सरकार पर हमला किया और उसे सत्ताच्युत करने का संकल्प दोहराया।
उनके इस दौरे से पार्टी की त्रिपुरा इकाई को मजबूती मिली है। पार्टी में गजब का उत्साह देखा जा रहा है। अगरतला के भाजपा कार्यकर्ता विपुल्ल सेनगुप्ता का कहना है कि शाह के इस आगमन के साथ पार्टी पूरी तरह चुनावी तैयारी में लग गई है। वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस की गतिविधियों पर जिस तरह से विराम लगा हुआ है उससे माना जा रहा है कि अगले विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी माकपा और भाजपा के बीच होगा। हालांकि अभी तक भाजपा किसी भी विधानसभा चुनाव में अपना एक भी उम्मीदवार जीता पाने में कामयाब नहीं हो सकी है। बता दें कि त्रिपुरा एक ऐसा राज्य है जहां बांग्लादेश से आए हिंदुओं की संख्या सबसे अधिक है और त्रिपुरा के मूल आदिवासी आज वहां अल्पसंख्यक हो गए हैं। कुछ महीने पहले जब आदिवासियों और बांग्लादेशी हिंदुओं के बीच संघर्ष हुआ था तो अधिकांश आदिवासी अगरतला से पलायन कर गए थे।
राज्य के बहुसंख्यक लोगों का भाजपा की ओर रुख करने की मुख्य वजह केंद्र सरकार की ओर से धर्म के आधार पर शरणार्थी या नागरिकता देने का वादा है जो उन्हें खूब लुभा रहा है। बावजूद इसके माकपा नेता और राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को कमजोर मान लेना और अगले चुनाव में उनकी हार की भविष्यवाणी थोड़ी जल्दीबाजी में की गई टिप्पणी होगी। उनकी ईमानदारी और विकास कार्यों से राज्य के अधिकांश लोग सहमत हैं। उन्होंने राज्य के सभी लोगों के विकास के लिए काम किया है और विकास के माध्यम से अशांत त्रिपुरा को एक शांत राज्य में तब्दील करने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में मुकाबला काफी दिलचस्प रहने की उम्मीद है। भाजपा ने राज्य की सत्ता को अपनी ओर मोड़ने के लिए राष्ट्रीय महासचिव और पूर्वोत्तर के प्रभारी राम माधव और पूर्वोत्तर डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) के संयोजक डॉ. हिमंत विश्वशर्मा को लगा रखा है। सनद रहे कि माधव और हिमंत की जोड़ी ने असम और मणिपुर में भाजपा को सत्ता में लाने और अरुणाचल प्रदेश में बिना जीते भाजपा सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी। नगालैंड में भाजपा के करीबी टीआर जेलियांग को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने में भी इस जोड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
मेघालय पर भी भाजपा विशेष जोर दे रही है। ऐसे में भाजपा यदि इस जोड़ी पर विश्वास कर रही है तो वह किसी भी तरह की गलतफहमी में नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल 16 दिसंबर को मेघालय आए थे। उन्होंने यहां आयोजित एक जनसभा से विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान का शुभारंभ किया। उसके बाद अमित शाह ने छह जनवरी को शिलांग में एक बड़ी रैली की और मेघालय सरकार पर आरोप लगाया कि केंद्र ने जितनी राशि मेघालय सरकार को दी उसका एक तिहाई भी राज्य सरकार खर्च नहीं कर पाई। बता दें कि इस वर्ष पूर्वोत्तर के चार राज्यों (मेघालय, त्रिपुरा, नगालैंड और मिजोरम) में विधानसभा चुनाव होने हैं। मार्च में त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में चुनाव है तो मिजोरम में चुनाव संभवत: नवंबर में होंगे। इन चार राज्यों में से त्रिपुरा को छोड़ बाकी तीन राज्य ईसाई बहुल हैं। इन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा की ओर से रणनीतिक बदलाव किए गए हैं। खासतौर पर बीफ सेवन के मामले में भाजपा ने पूर्वोत्तर में उदारता दिखाई है जबकि शेष भारत में इसके प्रति उसका रवैया कठोर है। जानकार भाजपा के इस दोहरेपन का कारण मिजोरम, मेघालय और नगालैंड में होने वाले विधानसभा चुनाव को मानते हैं। भाजपा की केंद्रीय इकाई और पूर्वोत्तर की राज्य इकाइयों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा पूर्वोत्तर में बीएफ पर बैन लगाने का समर्थन नहीं करती। भाजपा के इस दोहरेपन की देशभर में आलोचना हो चुकी है। लोग सवाल कर चुके हैं कि क्या पूर्वोत्तर में गौ भाजपा के लिए माता नहीं हैं? क्या भाजपा सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए ही इसे मुद्दा बनाती रही है?
अब देखना है कि पूर्वोत्तर के चार राज्यों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए मोदी-शाह की जोड़ी क्या रणनीति अपनाती है। भाजपा को उम्मीद है कि इन चारों राज्यों से कांग्रेस का सफाया हो जाएगा और इन राज्यों में भाजपा या नेडा के सहयोगी दलों की सरकारें बनेंगी। इसलिए नेडा संयोजक हिमंत विश्वशर्मा पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि 2018 के बाद पूर्वोत्तर भारत कांग्रेस मुक्त हो जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा में हिमंत का कद और बढ़ जाएगा। यहां यह भी याद रहे कि इन चुनावों को देखते हुए पिछले कई महीनों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके सहयोगी संगठन ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों पर किसी भी तरह का सवाल नहीं उठा रहे हैं। माहौल ऐसे ही खुशगवार बनी रहे तो यह अच्छी बात है परंतु यह खामोशी सिर्फ चुनाव जितवाने के लिए है तो संदेह उठना स्वाभाविक है।

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