संपादकीय- देर से ही पर न्याय मिले

प्रदीप सिंह/संपादक/ ओपिनियन पोस्ट

चौरासी के सिख विरोधी दंगों का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने दस जनवरी को एक आदेश में कहा कि सिख विरोधी दंगों की जांच नये सिरे से हो। जांच के लिए एक विशेष टीम का गठन किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता हाई कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश दंगा पीड़ितों और न्यायिक व्यवस्था में यकीन रखने वालों के मन में उम्मीद जगाता है कि शायद इस बार उन्हें न्याय मिल जाय। पर इसके साथ ही यह आदेश देश की न्याय और जांच व्यवस्था के बारे में भी बहुत कुछ कहता है। इस दंगे में मारे गए सिख परिवार के लोगों को पिछले तैंतीस बरस से न्याय की आस है। जब भी किसी नई जांच का ऐलान होता है उनके मन के किसी कोने में उम्मीद का दिया जलने लगता है लेकिन अभी तक उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। ज्यादातर लोगों ने तो न्याय की उम्मीद ही छोड़ दी है तो इन तीन दशकों में कितनों ने दुनिया छोड़ दी। कहते हैं कि देर से न्याय मिलना न मिलने के बराबर है। फिर भी दंगा पीड़ितों की उम्मीद बरकरार है। उनके संघर्ष के जज्बे को सलाम करने की जरूरत है। दंगे में अपने परिजनों को खोने और बर्बाद होने के बाद एक तरफ जिंदगी को नये सिरे से जीने की कोशिश की जंग और दूसरी ओर न्याय के लिए लड़ाई।

सिख विरोधी दंगा भारतीय समाज, कानून न्याय व्यवस्था, सरकार और राजनीतिक दलों के दामन पर एक बदनुमा दाग की तरह है। इसकी मिसाल देश में दूसरी नहीं मिलेगी। आजाद भारत की यह एकमात्र ऐसी घटना है जिसे दंगा भी कहना उचित नहीं है। क्योंकि इसमें दो समुदायों के बीच संघर्ष नहीं हुआ। एक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर उन्हें जिंदा जलाया और मारा गया। सरकारी आंकड़ों के ही मुताबिक साढ़े तीन हजार से ज्यादा सिख मारे गए। इनमें से 2,733 लोग सिर्फ दिल्ली में मारे गए। पर पुलिस ने कहीं एक भी लाठी, गोली नहीं चलाई। किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई और कोई एफआईआर नहीं लिखी गई। सरकारी अस्पतालों ने घायलों का इलाज करने से मना कर दिया। दिल्ली और देश में कांग्रेस का शासन था। सबने देखा कि सड़कों पर किस तरह लोगों के झुंड कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व में हमले करते रहे और उनकी दूकान और घर लूटते रहे। देश की राजधानी में तीन दिन तक यह नरसंहार चलता रहा और सरकारी अमला कान में तेल डालकर सोता रहा। इन सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि किसी अदालत ने इतने बड़े नरसंहार का स्वत: संज्ञान लेने की जरूरत नहीं समझी।

दंगों के दौरान जो हुआ उससे भी ज्यादा दुखद है उसके बाद का घटनाक्रम। पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से दंगा पीड़ित अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। उन्हें परेशान करने, गवाहों को धमकी देने और सरकारी तंत्र के दुरुपयोग से उनके खिलाफ जो कुछ किया जा सकता था वह हुआ। इन तीन दशकों में कई सरकारें आर्इं और चली गर्इं। पर किसी ने दंगा पीड़ितों को न्याय नहीं दिलाया। अलबत्ता इन दंगों की जांच के लिए बनी समितियों और आयोगों के लोगों को सरकारी और राजनीतिक पुरस्कार मिलते रहे। निचली अदालत से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक यह तमाशा होते हुए देखती रहीं। दंगा पीड़ितों को तो अब शायद यह भी याद नहीं होगा कि वे कितने आयोगों और समितियों के सामने अपनी फरियाद लेकर गए। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई भी इस मामले में अपनी छवि नहीं बचा पाई। ऐसा लगता रहा कि उसे अपनी छवि से ज्यादा चिंता आरोपियों को बचाने की है। गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए गए। आरोपियों से पूछताछ नहीं हुई। अदालत ने जांच का आदेश दिया तो जांच करने की बजाय जांच एजेंसी ने एक दो नहीं एक सौ छियासी मामले बंद कर दिए। यह सब इसलिए हुआ कि जांच एजेंसी से लेकर आरोपियों तक को यकीन था कि उन्हें बचाने वाले बहुत ताकतवर हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 241 मामलों में से 186 की फिर से जांच का आदेश दिया है। दिल्ली पुलिस ने सबूतों का अभाव बताकर इन मामलों की जांच बंद कर दी थी। विशेष जांच टीम में दो आईपीएस अधिकारी और हाईकोर्ट के एक रिटायर जज होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो रिटायर जजों की समिति बनाई थी जिसको तीन महीने में रिपोर्ट देनी थी कि कौन से मामलों की फिर से जांच होनी चाहिए। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों की फिर से जांच के आदेश दिए हैं। दिल्ली सिख गरुद्वारा प्रबंधक समिति के सदस्य गुरलाद सिंह कहलों की इन मामलों की फिर से जांच कराने की याचिका पर फैसला देते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की पीठ ने यह आदेश दिया। सर्वोच्च अदालत का यह आदेश दंगा पीड़ितों की लड़ाई लड़ रहे संगठनों के लिए राहत की तरह आया है। नई जांच टीम के लिए इतने पुराने मामले के सुबूत जुटाने, गवाहों को फिर से तैयार करने और आरोपियों के बच निकलने के रास्तों को बंद करने में खासी कठिनाई आएगी।

चौरासी के दंगों के बाद उसी साल हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने कहा था कि बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। उनके इस बयान से कांग्रेस और उसकी सरकार ने दंगों का औचित्य ठहराने और उसे भड़काने का काम किया। राजीव गांधी ने अपने जीते जी कभी इन दंगों पर अफसोस जाहिर नहीं किया। यूपीए शासन के दौरान सोनिया गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसके लिए माफी मांगी। पर दंगा पीड़ितों के लिए इस माफी का कोई अर्थ नहीं रह गया था। उनके लिए तो दंगाइयों को सजा दिलाना पहले भी सबसे बड़ा मुद्दा था और आज भी है। वे उस माफी का क्या करें जो उन्हें न्याय न दिला सके। दंगा पीड़ितों को न्याय मिल सके इसके लिए कांग्रेस की सरकारों ने कुछ नहीं किया। इतना ही नहीं दंगे के आरोपियों को कांग्रेस ने सांसद और मंत्री बनाया। उससे भी ज्यादा अफसोस की बात यह है कि दूसरी सरकारों का रेकार्ड भी इस मामले में कुछ अच्छा नहीं है। दंगा पीड़ितों को सबने निराश किया।

इतना लम्बा अर्सा गुजर जाने के बाद एक और सवाल जुड़ गया है। दोषियों को सजा मिले यह तो न्यूनतम है। जरूरी है कि अब उन लोगों के चेहरे से भी नकाब उठे जो इतने सालों से आरोपियों का बचाने का प्रयास करते रहे हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट की बनाई नई एसआईटी यह कर पाएगी। यह मामला सिर्फ सिखों को न्याय दिलाने का नहीं है। यह मामला दंगे का राजनीतिक दोहन करने वालों के लिए भी सबक बनना चाहिए कि कानून का हाथ उनके गिरेबान तक भी पहुंच सकता है। एक मिसाल कायम होनी चाहिए कि दंगा कराकर वोट लेना घाटे का सौदा भी हो सकता है, देर से ही सही। सिख एक स्वाभिमानी कौम है। उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंची है। उम्मीद करना चाहिए कि इस बार उन्हें न्याय मिलेगा। कुछ भी हो देश की न्याय व्यवस्था से उनका भरोसा उठना नहीं चाहिए। देर से ही सही उन्हें न्याय मिलना चाहिए। सामाजिक समरसता के लिए भी यह जरूरी है कि समाज के एक वर्ग को यह न लगे कि इस व्यवस्था में उसे न्याय नहीं मिल सकता। उन्हें लगना चाहिए कि देश की न्यायिक व्यवस्था में देर भले ही हो पर अंधेर नहीं है।

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