विचार

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जिरह- मुजाहिद से तारक बने केजरीवाल

हिंदी की एक फिल्म आई थी ‘बहू बेगम’। 1967 में आई इस फिल्म में साहिर लुधियानवी का एक गीत है, जिसके बोल हैं- निकले थे कहां जाने के लिए, पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं। अब अपने भटकते कदमों को मंजिल का निशां म...

जिरह- बातों से बात नहीं बनेगी

हिंदू समाज के दलित समुदाय ने हजारों साल वर्ण व्यवस्था का दंश झेला, इस मसले पर कोई मतभेद नहीं है। उस अत्याचार के प्रायश्चित स्वरूप देश के संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की व्यवस्था की। जिस राजनीति ने आम...

जिरह- अपने ही जाल में फंसी माया

प्रदीप सिंह (प्रधान संपादक/ओपिनियन पोस्ट)। उत्तर प्रदेश राजनीतिक संस्कृति की गिरावट की प्रयोगशाला बन गया है। कौन कितना गिर सकता है इसकी कोई सीमा नहीं रह गई है। नेता अपने बारे में कही गई बातों, टिप्पणि...

जिरह- आतंकवाद का जवाब एक ही है…..

प्रदीप सिंह (प्रधान संपादक/ओपिनियन पोस्ट)। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। यह वाक्य आजकल देश और दुनिया के सभी बड़े छोटे नेताओं से सुनने को मिलता है। यह अलग बात है कि अस्सी के दशक में भारत के पंजाब में ख...

जिरह- बदहाल पंजाब, बेफिक्र नेता

प्रदीप सिंह(प्रधान संपादक/ओपिनियन पोस्ट) पंजाब के बारे में सोचिए तो जीवन में जो कुछ अच्छा हो सकता है सब आंखों के सामने घूम जाता है। पंजाब के जिक्र के बिना आधी से ज्यादा हिंदी फिल्में बन ही न पातीं। दे...

माननीयों का मानमर्दन

प्रदीप सिंह (प्रधान संपादक/ ओपिनियन पोस्ट) देश का संविधान बनने के बाद उच्च सदन के रूप में राज्यसभा का गठन हुआ। इसके पहले सभापति बने तत्कालीन उप राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन। राज्यसभा की पहली बैठक क...

हेलीकॉप्टर सौदा : दूसरा बोफोर्स!

प्रदीप सिंह (प्रधान संपादक/ओपिनियन पोस्ट) । दुनिया में भ्रष्टाचार का शायद पहला मामला है जिसमें रिश्वत देने वाले जेल में हैं और रिश्वत लेने वाले खुले घूम रहे हैं। उनसे कोई सवाल भी नहीं पूछा जा रहा कि भ...

…नहीं तो बदल जाएगा मतदाता

जिरह/प्रदीप सिंह बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए एक सबक हैं, अगर वह उससे कुछ सीख सके। भाजपा, संगठन, सामाजिक समीकरण बिठाने की रणनीति और चुनाव के मुद्दे तय करने  में नाकाम रही। प्रधानमंत्री न...

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