भाजपा ने साधे एक तीर से दो निशाने

बाघमारा विधायक के साथ उनकी तकरार बिल्कुल निचले स्तर पर पहुंच गई थी. वे न सिर्फ जनसभाओं में एक-दूसरे के खिलाफ आग उगल रहे थे, बल्कि महिला कार्यकर्ताओं के जरिये एक-दूसरे पर यौन उत्पीडऩ के आरोप भी लगा चुके थे, जिससे पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच आ रही थी. रवींद्र पांडेय गिरिडीह संसदीय क्षेत्र से पांच बार सांसद रह चुके हैं. सिर्फ एक बार यानी 2004 में वह झामुमो के टेक लाल महतो से पराजित हुए थे. पांडेय आडवाणी खेमे के नेताओं में गिने जाते हैं. इस खेमे के लोगों पर वर्तमान भाजपा नेतृत्व की नजर वैसे भी टेढ़ी रही है. ढुल्लू महतो कोयलांचल के बाहुबली विधायक हैं. उन पर रंगदारी वसूलने और हिंसक टकराव के आरोप लगते रहे हैं. धनबाद स्थित इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बीएन सिंह ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके त्राहिमाम संदेश दिया था कि अगर ढुल्लू की रंगदारी वसूली पर रोक नहीं लगी, तो कोयलांचल के हार्ड कोक भ_ा उद्योग का _बैठ जाएगा.

विधायक ढुल्लू महतो ने युवाओं के बीच अच्छी पैठ बना रखी है. उनकी टाइगर फोर्स का कोयलांचल में दबदबा है. मुख्यमंत्री रघुवर दास से उनके घनिष्ट संबंध हैं. महतो गिरिडीह संसदीय क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लडक़र अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहते थे. गिरिडीह में कई कोयला खदानें हैं और बेरमो कोयलांचल भी गिरिडीह संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है. क्षेत्र में कुर्मी मतदाताओं की बहुलता है. महागठबंधन की ओर से यह सीट झारखंड मुक्ति मोर्चा के हिस्से में जानी तय है और झामुमो के संभावित उम्मीदवार जगन्नाथ महतो हैं, जो फिलहाल डुमरी के विधायक हैं. बेरमो कोयलांचल पर राजपूतों एवं ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है. लंबे समय तक सांसद और विधायक इन्हीं दो जातियों से चुने जाते रहे हैं और बेरमो कोयलांचल के आर्थिक स्रोतों पर उनका कब्जा रहा है. झारखंड राज्य बनने के बाद से ही कुर्मी नेताओं ने वर्चस्व कायम करने की जंग शुरू कर दी. बेरमो विधानसभा क्षेत्र से फिलहाल बाटुल महतो विधायक हैं. इंटक महासचिव राजेंद्र प्रसाद सिंह लगातार दो बार चुनाव हार चुके हैं. झारखंड राज्य बनने के बाद इस क्षेत्र में सिर्फ एक बार कुर्मी नेता को जीत हासिल हुई, लेकिन कोयलांचल पर उनका वैसा दबदबा कायम नहीं हो सका, जैसा सवर्ण नेताओं का रहा.

अब ढुल्लू महतो सवर्ण वर्चस्व तोडऩे के प्रयास में लगे हैं. करीब एक साल से उन्होंने सांसद रवींद्र पांडेय के खिलाफ मुहिम चला रखी है. दोनों जब एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आग उगल रहे थे, तभी तय हो गया था कि इनमें से किसी को भाजपा का टिकट नहीं मिलेगा. ढुल्लू को जब यह बात समझ में आई, तो उन्होंने रवींद्र पांडेय का टिकट कटवाने के लिए रांची से लेकर दिल्ली तक दौड़ तेज कर दी. रवींद्र पांडेय जोड़-तोड़ और लॉबिंग में कमजोर पड़ रहे थे. आडवाणी खेमे का होने के नाते भी उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा था. कहते हैं कि पांडेय को पहले ही आभास हो गया था कि उनका टिकट कट सकता है. इसलिए उन्होंने आजसू और झामुमो से भी संपर्क बना रखा था, लेकिन यहां जंग स्थानीय और बाहरी की है. दरअसल, भाजपा ने यह सीट आजसू को देकर एक तीर से दो निशाना साधा. गिरिडीह सांसद के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के साथ-साथ गठबंधन धर्म का निर्वाह भी कर लिया गया. आजसू से जो मकसद पूरा करना था, वह स्वत: हो रहा है. कई विपक्षी दल चुनाव को बहुकोणीय बनाने की राह पर चल पड़े हैं.

विपक्षी महागठबंधन में सीटों के तालमेल के पेंच सुलझ रहे हैं, लेकिन एनडीए और यूपीए से इतर कुछ अन्य खिलाड़ी भी जोर-आजमाइश की तैयारी में हैं. बसपा ने झारखंड की सभी १४ सीटों पर चुनाव लडऩे का मन बना रखा है, उसके उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया चल रही है. पार्टी के जोनल संयोजक अरुण कुमार के मुताबिक, प्रदेश कमेटी ओर से उम्मीदवारों के संभावित नामों की सूची पार्टी प्रमुख मायावती को भेजी जा चुकी है, जल्द ही उस पर अंतिम निर्णय होगा और विधिवत घोषणा कर दी जाएगी.

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