भाजपा की राह आसान नहीं

दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने के लिए किसी भी पार्टी को कुछ राज्यों में बेहतरीन प्रदर्शन करना जरूरी है. भाजपा को अगर फिर से सत्ता में वापसी करनी है,  तो उसे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल एवं ओडिशा जैसे राज्यों में अधिक से अधिक सीटें जीतनी होंगी. वर्तमान स्थितियों पर गौर करें, तो ऐसा लगता है कि लोकसभा में 197 सांसद भेजने वाले इन राज्यों में भाजपा को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद से राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है. गठबंधनों का दौर चल रहा है. कुछ नए गठबंधन बनाए जा रहे हैं, तो कई संभावित गठबंधन बिखरते नजर आ रहे हैं. राजनीतिक पार्टियों के अंदर खलबली मची हुई है. टिकट न मिलने की स्थिति में कई नेता पुरानी पार्टी को अलविदा कहकर नई जगह तलाश रहे हैं. ऐसे माहौल में यह चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है. एक तरफ भाजपा को कुछ गठबंधनों की ओर से चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, वहीं भाजपा के खिलाफ एकजुट होने की अपील करने वाली पार्टियां कई राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लडऩे जा रही हंै. ऐसी स्थिति में बिहार की 40, उत्तर प्रदेश की 80, पश्चिम बंगाल की 42, झारखंड की 14 और ओडिशा की 21 सीटों पर मुकाबला चुनौती पूर्ण होने वाला है. संसद में 197 प्रतिनिधि भेजने वाले इन राज्यों में भाजपा के लिए भी चुनौतियां कम नहीं हंै. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच गठबंधन होने के बाद भारतीय जनता पार्टी को इस राज्य में सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है, लेकिन अगर भाजपा ने इसे गंभीरता से न लिया, तो यह नुकसान बढ़ सकता है. ठीक उसी तरह बिहार और झारखंड में भी महागठबंधन बनने की स्थिति में भाजपा के लिए जीत का रास्ता आसान नहीं होने जा रहा है. जहां तक ओडिशा और पश्चिम बंगाल का सवाल है, तो इन दोनों राज्यों में पिछले चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन नगण्य रहा था, लेकिन अगर उत्तर प्रदेश में संभावित नुकसान की भरपाई करनी है, तो उसे इन दोनों राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करना पड़ेगा यानी यहां भी भाजपा के सामने बड़ी चुनौतियां हैं.

बिहार

भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ी एकजुटता बिहार में दिखाई पड़ रही है. बिहार की 40 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में भाजपा को जदयू का साथ हासिल है, तो दूसरी ओर साल 2014 में भाजपा की सहयोगी रही रालोसपा का राजद के साथ गठबंधन लगभग तय है. बिहार में राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. जदयू और भाजपा के बीच फिर से गठबंधन होने के बाद से राजद खेमे में हलचल मच गई थी और राज्य में भाजपा को शिकस्त देने के लिए राजद ने उसकी विरोधी पार्टियों को एक मंच पर लाने का प्रयास तेज कर दिया था. अगर बिहार में कांग्रेस, राजद, रालोसपा, वीआईपी और हम के बीच गठबंधन हो जाता है, तो भाजपा के लिए चुनौतियां बढ़ जाएंगी. हालांकि, जदयू, लोजपा और भाजपा के बीच गठबंधन के कारण वहां एनडीए की स्थिति कुछ बेहतर दिखाई पड़ रही है, लेकिन महागठबंधन होने की स्थिति में भाजपा को मुश्किलों का सामना भी करना पड़ सकता है. बिहार में राजद का सबसे बड़ा आधार मुस्लिम और यादव वोट है. राज्य में मुसलमानों की आबादी करीब 17 प्रतिशत और यादवों की आबादी 14 प्रतिशत है. इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी, जीतन राम मांझी और कांग्रेस के जुडऩे की स्थिति में महागठबंधन के पास चालीस प्रतिशत से अधिक वोट हो जाते हैं.

कांग्रेस और राजद के बीच गठबंधन होने पर मुस्लिम वोटों का विभाजन न के बराबर होने की संभावना है और इससे भाजपा गठबंधन के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हंै. इसके अलावा कांग्रेस ने जिस तरह अपने परंपरागत वोटरों को जोडऩे के लिए उच्च वर्ग और कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोडऩा शुरू किया है, उससे लगता है कि इस वर्ग के भी चार-पांच प्रतिशत वोट महागठबंधन के खाते में जा सकते हैं. गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में जदयू एवं राजद ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और भाजपा ने रालोसपा एवं लोजपा के साथ गठबंधन किया था. भाजपा को उस चुनाव में तीस प्रतिशत वोटों के साथ 22 सीटें मिली थीं, जबकि उसकी सहयोगी लोजपा को छह प्रतिशत वोटों के साथ छह सीटें और रालोसपा को तीन प्रतिशत वोटों के साथ तीन सीटें मिली थीं.

दूसरी ओर राजद को उस चुनाव में २० प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि जीत केवल चार सीटों पर मिली थी. भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश कुमार के जदयू को 16 प्रतिशत वोटों के साथ केवल दो सीटें मिली थीं. इस बार गठबंधन बदल गया है. ऐसे में भाजपा के सहयोगी जदयू को अपना ओबीसी आधार और मजबूत करना होगा. बिहार में पिछड़े वर्ग की आबादी 51 प्रतिशत है, जिसमें ओबीसी अंतर्गत आने वाली जातियों की आबादी 25 और ईबीसी अंतर्गत आने वाली जातियों की आबादी 26 प्रतिशत है. ओबीसी में यादव, कुशवाहा एवं कुर्मी जैसी कुछ जातियां शामिल हैं, जबकि ईबीसी में 130 जातियां शामिल हैं. भाजपा और जदयू को गैर यादव ओबीसी और ईबीसी जातियों के बीच मजबूती के साथ अपना आधार बढ़ाना होगा. इसके लिए टिकट बंटवारे के समय इनके प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखना होगा. इसके अलावा बिहार में 16 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जातियों की है. नीतीश कुमार ने बिहार की 23 दलित जातियों में से 21 को महादलित घोषित करके उनके लिए कुछ विशेष सुविधाएं दी हैं. अगर नीतीश कुमार महादलित वोटरों को अपने पक्ष में करने में सफल रहते हैं, तो महागठबंधन की चुनौतियां कम की जा सकती हैं.

लोकसभा चुनाव 2014

बिहार (कुल सीटें 40)

पार्टी    सीटें    वोट शेयर

भाजपा  22     29.4

लोजपा  06     6.4

रालोसपा 03     3.०

जदयू   02     15.8

राजद   04     20

कांग्रेस  02     8.4

एनसीपी 01     1.2

 

जातिगत स्थिति

यादव   14.4 %

कुशवाहा  06.4 %

कुर्मी   04 %

ईबीसी  26 %

ब्राह्मण 5.7 %

भूमिहार 4.7 %

राजपूत  5.2 %

कायस्थ 1.4 %

एससी 16 %

मुस्लिम 16.9 %

उत्तर प्रदेश

जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, तो वहां बसपा और सपा के बीच गठबंधन होने के बाद से भाजपा की स्थिति कमजोर मानी जा रही है. हालांकि, कांग्रेस के मजबूत होते आधार से भाजपा को कुछ राहत मिली है, लेकिन अब भी सबसे अधिक लोकसभा सीट वाले इस राज्य में भाजपा के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. पिछला प्रदर्शन दोहराना तो भाजपा के लिए मुश्किल है, लेकिन सम्मानजनक सीटें लाने के लिए भी उसे काफी मशक्कत करनी होगी. उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा के बीच गठबंधन के चलते भारतीय जनता पार्टी को वोटों के बिखराव का फायदा मिलना मुश्किल है और जीत के लिए उसे अपना आधार बढ़ाना होगा. जिन लोकसभा सीटों पर भाजपा को इन दोनों पार्टियों के बीच वोट बंटने के कारण जीत हासिल हुई थी, वहां सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. उत्तर प्रदेश की राजनीति भी मुद्दों से ज्यादा जातीय समीकरणों से संचालित होती है. सपा, बसपा एवं रालोद के बीच गठबंधन के बाद ओबीसी और दलित वोटों का बिखराव कम होगा. हालांकि, दोनों ही पार्टियों के पास ओबीसी और दलितों के पूरे वोट नहीं हैं, बल्कि दोनों वर्गों की कुछ खास जातियों के बीच इनकी पैठ बहुत अधिक है, तो कुछ जातियों के बहुत कम वोट इनके खाते में आते हैं. प्रदेश में ओबीसी की आबादी 44 और अनुसूचित जातियों की आबादी करीब 22 प्रतिशत है. अगर अखिलेश और मायावती इन दोनों वर्गों के सत्तर प्रतिशत वोट गठबंधन के पक्ष में करने में सफल हो गए, तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी. इसके अलावा बसपा-सपा गठबंधन बनने के बाद मुस्लिम वोटों का विभाजन न्यूनतम होने की प्रबल संभावना है. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 20 प्रतिशत है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में उनके वोट निर्णायक होते हैं. ऐसे में अगर उनके एकमुश्त वोट गठबंधन को जाते हैं, तो भाजपा के लिए समस्या खड़ी हो सकती है.

इसके अलावा कांग्रेस के अकेले चुनाव लडऩे से बसपा-सपा गठबंधन को तो नुकसान होगा, लेकिन भाजपा भी इससे अछूती नहीं रहेगी. भाजपा और कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक का आधार सामान्य वर्ग रहा है. कांग्रेस भी इस वर्ग के वोटों में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश करेगी. ध्यान रहे कि उत्तर प्रदेश में सामान्य वर्ग की आबादी करीब 25 प्रतिशत है, जिसमें 13 प्रतिशत तो केवल ब्राह्मण हैं, जो पहले कांग्रेस को वोट देते रहे हैं. प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने के बाद कांग्रेस का आधार पहले की अपेक्षा थोड़ा मजबूत हुआ है. भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के नेताओं द्वारा कांग्रेस पर हमलों से भी यह जाहिर होता है कि कांग्रेस को कमजोर समझने वालों को अब उसकी मजबूती का आभास हो रहा है. इसके अलावा नोटबंदी और जीएसटी से व्यवसायियों को परेशानी हुई है. इस वर्ग के बहुत सारे लोग भाजपा से अब भी नाराज चल रहे हैं. अगर यह नाराजगी चुनाव के समय तक बनी रही, तो इस वर्ग के अच्छे-खासे वोट कांग्रेस या गठबंधन के खाते में जा सकते हैं.

हालांकि, ओबीसी में गैर यादव जातियों के अच्छे-खासे वोट भाजपा को मिलते रहे हैं. ओबीसी में जहां नौ प्रतिशत यादव वोट हैं, वहीं लोध, कुर्मी एवं कुशवाहा वोट भी सात-सात प्रतिशत हैं. भाजपा में इन जातियों के कई नेता हैं. कुर्मी समाज की अनुप्रिया पटेल भी भाजपा के साथ हैं, तो लोध नेता कल्याण सिंह और कुशवाहा नेता केशव प्रसाद मौर्य एवं स्वामी प्रसाद मौर्य प्रदेश भाजपा के बड़े नेता हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों के अच्छे-खासे वोट भाजपा गठबंधन को मिले थे. विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा को परंपरागत वोट 62 प्रतिशत, कुर्मी वोट 57 प्रतिशत, लोधी वोट 63 प्रतिशत और दूसरी पिछड़ी जातियों के 60 प्रतिशत वोट मिले थे. इसके अलावा अनुसूचित जातियों के 17 प्रतिशत वोट भी भाजपा के खाते में गए थे. विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुल 40 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे 42 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे. अगर भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियां उत्तर प्रदेश में गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित वोटों का पचास प्रतिशत हिस्सा अपनी झोली में डाल लेती हैं, तो उन्हें बसपा-सपा गठबंधन और कांग्रेस से मिलने वाली चुनौतियां कम हो सकती हैं.

जातिगत स्थिति

यादव  9%

लोध  7%

जाट  2.7%

कुशवाहा  7%

कुर्मी 7%

गुर्जर  1.5%

अन्य ओबीसी  10%

जाटव  9%

गैर जाटव दलित  12%

ब्राह्मण  13%

ठाकुर  8%

वैश्य  3%

त्यागी-भूमिहार   1.1 %

मुस्लिम  19.23 %

 

लोकसभा चुनाव 2014

उत्तर प्रदेश (कुल सीटें 80)

पार्टी    सीटें    वोट शेयर

भाजपा  71     42.3

अपना दल   02   01

सपा     05    22.2

बसपा   00     19.6

कांग्रेस  02   7.50

झारखंड

पिछली बार झारखंड की कुल 14 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव के करीब सात महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी बड़ी जीत दर्ज की थी और पहली बार राज्य में किसी पार्टी को अकेले दम पर बहुमत मिला था. साल 2000 में झारखंड के गठन के बाद से यहां की राजनीति काफी अस्थिर रही है. तेरह सालों में यहां करीब दो साल तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा, क्योंकि किसी एक पार्टी को बहुमत न होने के कारण राज्य में राजनीतिक अस्थिरता चरम पर रही. लोकसभा चुनाव के सात महीने बाद दिसंबर 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत मिला और एक स्थायी सरकार बनी. विधानसभा चुनाव में भाजपा को 37 और उसकी सहयोगी पार्टी आजसू को पांच सीटें मिली थीं, लेकिन सरकार बनने के दो महीने बाद झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के 08 में से 06 विधायक भाजपा में शामिल हो गए. बता दें कि झारखंड विकास मोर्चा का गठन भाजपा के पूर्व नेता बाबू लाल मरांडी ने किया है, जो राज्य के पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इस बार लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लिए झारखंड में अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा पाना मुश्किल है. इस बार उसका मुकाबला महागठबंधन से होने वाला है. कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और झारखंड विकास मोर्चा के बीच गठबंधन हो गया है. हालांकि, राजद को इस गठबंधन से अलग रखने का फायदा भाजपा को मिल सकता है, लेकिन राज्य में भाजपा सरकार होने के कारण भी लोकसभा चुनाव में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि यहां विपक्ष के पास केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकार पर हमला करने के लिए कई मुद्दे हैं. इस बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में भाजपा को महागठबंधन के साथ मुकाबला करने के लिए पूरी तैयारी के साथ चुनाव में उतरना पड़ेगा. झारखंड में भाजपा का बड़ा जनाधार रहा है. राज्य गठन के बाद से हर विधानसभा चुनाव में वह सबसे बड़ी पार्टी बनी रही. केवल साल 2009 के विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा को बराबर सीटें मिली थीं, लेकिन उसके बाद भाजपा ने फिर से अपना आधार मजबूत कर लिया और साल 2014 के लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में उसने सारे दलों का सूपड़ा साफ कर दिया. भाजपा ने यहां के जातीय समीकरण को देखते हुए पहली बार किसी गैर आदिवासी शख्स को मुख्यमंत्री बनाया. रघुवर दास इस राज्य के पहले ओबीसी मुख्यमंत्री हैं. इसका फायदा भी इस चुनाव में भाजपा को मिल सकता है. लेकिन सारी अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद इस बार यहां भाजपा को एक मजबूत विपक्ष के साथ मुकाबला करना है, जिसके चलते उसकी चुनौती भी बड़ी होगी.

लोकसभा चुनाव 2014

झारखंड (कुल सीटें 14)

पार्टी    सीटें    वोट शेयर

भाजपा  12     40

झामुमो  02     9.3

कांग्रेस  00     13.3

झाविमो 00     12.1

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल की राजनीति तेजी से बदल रही है. चुनाव की घोषणा के कुछ महीने पहले से ही नेताओं द्वारा अपनी पुरानी पार्टी छोडक़र नई पार्टी में जाने का सिलसिला शुरू हो गया था. टीएमसी के संस्थापक सदस्यों में से एक मुकुल राय पिछले साल नवंबर में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. मुकुल राय ममता बनर्जी के करीबी थे और केंद्र में रेल मंत्री भी रह चुके हैं. पिछले साल ममता बनर्जी के साथ उनके संबंध खराब होने शुरू हुए. आखिरकार उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और बाद में भाजपा में शामिल हो गए. हाल में टीएमसी के दो सांसद सौमित्र खान और अनुपम हजारा भाजपा में शामिल हुए. इसके अलावा उम्मीदवार न बनाए जाने से नाराज होकर गैर बांग्लाभाषी वर्ग के बड़े नेता एवं भाटपाड़ा के विधायक अर्जुन सिंह भी भाजपा में शामिल हो गए. बैरकपुर क्षेत्र में अर्जुन सिंह का अच्छा प्रभाव है. हिंदीभाषी लोगों के बीच उनकी काफी पैठ है. बैरकपुर से टीएमसी ने दिनेश त्रिवेदी को टिकट दिया है, जिसके कारण अर्जुन सिंह नाराज चल रहे थे. त्रिवेदी भी गैर बांग्लाभाषी वर्ग के नेता माने जाते हैं. कई छोटे नेता भी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं. हालांकि, राज्य में भाजपा की स्थिति तेजी से मजबूत हुई है, लेकिन उसे अगर 42 लोकसभा सीटों में से 15-20 सीटें हासिल करनी हैं, तो कठिन परिश्रम करना पड़ेगा. पिछले चुनाव में भाजपा को केवल दो सीटें मिली थीं, लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान यहां उसका आधार काफी बढ़ा है. असम में एनआरसी लागू किए जाने का लाभ भी भाजपा को मिलने की उम्मीद है, क्योंकि कई रैलियों में भाजपा नेताओं ने उसे पश्चिम बंगाल में लागू कराए जाने की बात कही है. स्थानीय निकाय चुनाव में भी भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी रही. इन राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा की उम्मीदें बढ़ गई हैं, लेकिन ममता बनर्जी को कमजोर समझना उसकी भूल हो सकती है. ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. महागठबंधन की बात करने वाली ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए कोई बातचीत नहीं की. उन्होंने पिछले दस सालों में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है. पिछले लोकसभा चुनाव में टीएमसी को चालीस प्रतिशत वोट मिले थे और उसने 34 सीटों पर जीत हासिल की थी. सीपीएम को जहां 23 प्रतिशत वोटों के साथ केवल दो सीटें मिली थीं, वहीं कांग्रेस भी 10 प्रतिशत वोट पाकर दो सीटें जीत गई थी. भाजपा ने पिछले चुनाव में 18 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, लेकिन अगर इस बार बेहतर प्रदर्शन करना है, तो उसे करीब 30 प्रतिशत वोट हासिल करने होंगे. पिछले साल हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा का आधार काफी बढ़ा है. पश्चिम बंगाल में भाजपा की रैलियां रोकने की ममता बनर्जी की कोशिशें भी उसके बढ़ते आधार की ओर इशारा करती हैं.

पश्चिम बंगाल में एक बड़ी समस्या सही तरीके से चुनाव कराने की भी रही है. स्थानीय निकाय चुनाव के समय टीएमसी और भाजपा के बीच काफी झड़पें हुई थीं. करीब 500 उम्मीदवारों को नामांकन तक नहीं कराने दिया गया. यह मुद्दा कोलकाता हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था. ऐसे में इस चुनाव में भी यहां राजनीतिक संघर्ष रोकना और अपने वोटरों को मतदान केंद्र तक पहुंचाना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. इसके अलावा भाजपा को सही उम्मीदवारों की तलाश भी करनी है. राज्य में भारतीय जनता पार्टी का जनाधार तो बढ़ा है, लेकिन बड़े नेताओं की कमी दिखाई पड़ रही है. ऐसे में टीएमसी और कांग्रेस से आए नेताओं को टिकट देने से पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की स्थिति पैदा न हो, इस बारे में भी भाजपा नेतृत्व को गंभीरता से सोचना है.

लोकसभा चुनाव 2014

पश्चिम बंगाल (कुल सीटें 42)

पार्टी    सीटें    वोट शेयर

टीएमसी  34     39.4

सीपीएम 02     23

भाजपा  02     18

कांग्रेस  04     9.7

 

ओडिशा

ओडिशा में भाजपा की स्थिति पहले की अपेक्षा थोड़ी मजबूत तो हुई है, लेकिन ‘साइलेंट किलर’ माने जाने वाले नवीन पटनायक के गढ़ में सेंधमारी करना भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत आसान नहीं है. करीब दो दशकों से ओडिशा की सत्ता पर काबिज नवीन पटनायक को पटखनी देना आसान नहीं है. एनडीए से अलग होने के बाद बीजद ने ओडिशा में लगातार जीत दर्ज की है. पिछले लोकसभा चुनाव में जब पूरे देश में मोदी लहर की बात कही जा रही थी, तो नवीन पटनायक अपने राज्य में भाजपा को हराने की रणनीति बना रहे थे. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजद ने राज्य में 44 प्रतिशत वोटों के साथ 21 सीटों में से 20 पर जीत हासिल की थी. हालांकि, भाजपा को भी उस चुनाव में 22.5 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन सीट केवल एक ही मिल पाई थी. राज्य की नौ लोकसभा सीटों पर भाजपा दूसरे स्थान पर रही थी. वोट शेयर के मामले में कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी रही थी और उसे 26 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन सीट एक भी नहीं मिली थी. इस बीच भाजपा ने अपना आधार मजबूत किया है और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन के चलते होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए पश्चिम बंगाल के साथ-साथ ओडिशा में भी अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए उसने राज्य में काफी मेहनत की है और पिछले स्थानीय निकाय चुनाव में उसका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा. जिला परिषद की 853 सीटों में से 306 पर उसकी जीत हुई थी.

भाजपा ने भुवनेश्वर में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने हिस्सा लिया. भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अनौपचारिक तौर पर मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित कर दिया है, लेकिन नवीन पटनायक को हराना उसके लिए आसान नहीं है. पटनायक की कई योजनाओं की काट भाजपा को ढूंढनी होगी और एक बेहतर विकल्प का भरोसा राज्य की जनता को देना होगा. नवीन पटनायक ने आदिवासियों के लिए विशेष विकास परिषद का गठन किया है, जो मयूरभंज, केंदुझर, सुरंदरगढ़, कंधमाल एवं गजपति जैसे आदिवासी बाहुल्य इलाकों में विशेष रूप से सक्रिय है, जहां आदिवासियों की आबादी पचास प्रतिशत के आस-पास है. इसी तरह ‘आमा गांव’ और ‘आमा विकास’ जैसी जनता से सीधे संवाद की योजनाएं भी भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती हैं. पटनायक ने केंद्र की आयुष्मान भारत योजना से पहले ही स्वास्थ्य बीमा योजना लागू कर रखी है, जिसमें जिला अस्पतालों में सात लाख रुपये तक की नि:शुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराई जाती है. पटनायक को शिकस्त देने के लिए भाजपा को राज्य में मजबूत नेतृत्व दिखाना पड़ेगा, क्योंकि बीजद के पास पिछले दो दशकों से एक ऐसा चेहरा है, जो अभी तक बेदाग माना जाता है.

लोकसभा चुनाव 2014

ओडिशा (कुल सीटें 21)

पार्टी    सीटें    वोट शेयर

बीजद   20     44.1

भाजपा  01     21.5

कांग्रेस  00     26

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