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युग मन पर ‘अटल’ प्रभाव

राजनाथ सिंह सूर्य।

सार्वजनिक जीवन से चौदह वर्ष तक नेपथ्य में चले गए अटल बिहारी वाजपेयी के अवसान पर देश विदेश में छाए अवसाद की सघनता से उनकी प्रभावशीलता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उनके बारे में 1984 के चुनाव में बड़े-बड़े विपक्षी नेताओं के पराजित हो जाने के बाद एक भोजपुरी गायक ने जो पंक्तियां लिखी थीं उसकी सार्थकता भी साबित हो गई। अटल जी के बारे में उसने लिखा था- ‘हारे अटल बिहारी वाणी के प्रवीण लोकसभा शून्य हो गई।’ उनकी वाणी का प्रभाव बहुत लोगों ने जादुई शब्द से आंका है। लेकिन वे जादूगर की तरह कुछ क्षणों के लिए सम्मोहित नहीं करते थे। उनकी वाणी की प्रवीणता और आचरण की सार्थकता अनंतकाल के लिए प्रभावशाली बनी रहेगी। वाणी आचरण का चरण मिले बिना कभी प्रभावशाली नहीं बनेगी। जो उनसे असहमत थे वे भी अप्रभावित नहीं रहते थे। इस बात की सार्थकता उनके शरीर त्याग के बाद इस प्रकार किए गए उनके स्मरण से प्रमाणित होती है। उनके राजनीतिक जीवन में अनेक चढ़ाव उतार आए, लेकिन अंतत: जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई भविष्यवाणी सार्थक साबित हुई। उन्होंने विदेशी राजनयिकों से अटल जी का परिचय कराते हुए कहा था, ‘हियर इज ए यंग पार्लियामेन्टेरियन हूू इज फ्यूचर प्राइम मिनिस्टर आॅफ इंडिया’ और वह ऐसे प्रधानमंत्री बने। उनके कृत्यों का प्रभाव ही था कि 10 वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद भी कांग्रेस 2014 में अपने लम्बे जीवन काल की सबसे बुरी पराजय की शिकार हुई और निरन्तर होती जा रही है। उनके नेपथ्य में चले जाने के बाद भी जिस प्रकार राजनीतिक व्यवहार और सामाजिक सौहार्द के लिए उनकी वाणी और आचरण को संसद और उसके बाहर उद्धृत किया जाता रहा है, वह इस बात का प्रमाण है कि वह सर्वधिक जननायक थे।
अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे राजनीतिक व्यक्ति थे जिन्होंने उतार चढ़ाव की अनेक मंजिलों को बिना धैर्य खोए लांघा है। चाहे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद कतिपय बड़े नेताओं का जनसंघ छोड़कर जाना हो या फिर 1984 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के महज दो सदस्यों का लोकसभा में पहुंचना या फिर 1962 का चुनाव हारना या 1980 में जनता पार्टी का अलग होना और 1984 में फिर चुनाव हारना। या फिर जनसंघ जैसी पार्टी का अध्यक्ष बनना, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का पद सुशोभित करना, 1977 में विदेश मंत्री बनना। संयुक्तराष्टÑ संघ में हिन्दी में भाषण देना। 1980 में जनता पार्टी के टूटने बिखरने और 1989 में महज एक वोट से लोकसभा में सरकार की पराजय या पांच वर्ष तक पहली गैर कांग्रेसी सरकार को सफलतापूर्वक चलाने में 24 दलों का साथ लेना हो- न तो किसी घटना पर उन्हें विषादयुक्त देखा गया और न ही वे प्रगल्भित होते थे। गीता में भगवान कृष्ण ने स्थितिप्रज्ञता को धैर्यवान व्यक्ति के लिए सर्वोत्तम लक्षण बताया है। दुख सुख और हार जीत को सम भाव से लेते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी राजनीतिक यात्रा को जब विराम दिया तब भी उनकी आभा की छाया के बिना भारतीय जनता ने कभी कोई कदम नहीं उठाया। अभी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनका स्मरण करते हुए कश्मीर की समस्या सुलझाने के उनके ही बताए हुए त्रिसूत्रीय फार्मूले को दोहराया है।
अटल बिहारी वाजपेयी पत्रकार, लेखक, कवि और राजनेता की त्रिवेणी थे। ऐसा अद्भुत संगम किसी अन्य व्यक्तित्व में देखने को नहीं मिलता। कई बार उनकी सहज भाव से की गई अभिव्यक्तियों को न समझ पाने के कारण कुछ लोग यह भी कहने लगते थे कि उनकी राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ से निभ नहीं रही है। इसका उत्तर वह सदैव देते थे कि मैं संघ का स्वयंसेवक हूं और जीवन के अंतिम क्षण तक संघ का स्वयंसेवक रहंूगा। वह जननेता थे। यही कारण है कि उनकी जन सभाओं को सुनने के लिए जो भारी भीड़ उमड़ती थी उनमें भाजपा और जनसंघ के अनेक विरोधी भी शामिल रहते थे। संसद हो या संसद के बाहर उन्होंने अपनी बात बेबाक ढंग से रखी लेकिन अभिव्यक्ति में शब्दों का चयन ऐसा रहा कि चोटिल होने पर भी लोग हंगामा नहीं कर पाते थे। ऐसा नहीं था कि वाजपेयी जी चिन्तित नहीं होते थे। समस्याओं पर वह चिन्तित अवश्य होते थे लेकिन उसके विषाद से अपने और आसपास के वातावरण को कभी बोझिल नहीं होने देते थे।
मुझे 1954 में बरेली संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह के अवसर पर एकत्रित हुए स्वयंसेवकों के साथ सामूहिक खेल में भाग लेने का अवसर मिला था और 2006 में जब वह अस्वस्थ थे मैं उनसे मिलने के लिए उनके आवास पर गया था। मेरा उद्देश्य उत्तर प्रदेश के बारे में बातचीत करना था। वे विषय को टाल गए और बोले लिख रहे हो न और लिखते रहो। उसके बाद वार्ता खत्म हो गई। फिर उनके बारे में समाचार मिलते रहे लेकिन भेंट का अवसर नहीं मिला। एक पत्रकार के रूप में मैंने उन्हें बहुत नजदीक से देखा है। अक्सर नेता चुभते हुए प्रश्नों से विचलित हो जाते हैं। वाजपेयी जी ऐसे प्रश्नों पर ठहाके लगाते थे। जो उनके उत्तर न देने का एक तरीका था। कभी-कभी प्रश्नकर्ता से पूछ बैठते थे क्या ऐसा हो रहा है जो तुम कह रहे हो फिर अच्छा कहकर दूसरे प्रश्नकर्ता से मुखातिब हो जाते थे। प्रत्युत्पन्नमति तो जैसे उन्होंने घुट्टी में पी थी और उसी के माध्यम से वे कठिन से कठिन परिस्थितियों को पार करने में सहज सफलता प्राप्त कर लेते थे। हर स्थिति में सहज रहना बड़ा कठिन है। राजनीति करने वाले के जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं जब उनकी इच्छा और आकांक्षा के विपरीत माहौल बन जाता है। उस माहौल की कालावधि को धैर्यपूर्वक झेलते हुए पूर्व स्थिति को प्राप्त करने की भी उनमें अद्भुत क्षमता थी। ऐसा लोगों का मानना है कि वह जननेता तो थे लेकिन संगठनात्मक कार्यों में उनकी अभिरुचि नहीं थी ऐसा वही कह सकते हैं जिन्होंने संगठनात्मक आयोजनों में कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन करते नहीं सुना। पहले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और फिर पंडित दीन दयाल उपाध्याय के चले जाने के बाद पार्टी का सम्पूर्ण भार उनके ऊपर आ गया। पार्टी में उनको प्रतिद्वन्द्वी मानने वाले बलराज मधोक ने उनके बारे में अनेक बातें कहीं। वाजपेयी ने उनका कभी संज्ञान नहीं लिया। एक अन्य राजनीतिक कार्यकर्ता जो फिर से भाजपाई बने हैं जब अटल बिहारी वाजपेयी की आलोचना की थी तब उन्होंने कहा था कि वे स्वामी मैं सेवक। अपनी आलोचनाओं पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी टिप्पणी नहीं की।
एक कवि के रूप में उनकी एक रचना जो संभवत: 60 साल पहले की है, आज के हिन्दुत्व के बारे में भारतीय जनता पार्टी और संघ के रुख को समझने में शायद मददगार साबित हो। उनकी वह कविता ‘हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय’ जिसे गाकर उन्होंने कई पुरस्कार प्राप्त किए, की एक पंक्ति है- ‘कोई बतावे कब हमने काबुल में जाकर मस्जिद तोड़ी, भूभाग नहीं शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय’ यही भारत की सनातन परम्परा रही है। और इस कविता के द्वारा अटल जी ने संघ की सनातन परम्परा के प्रति प्रतिबद्धता का उल्लेख किया है। राजनीतिक क्षेत्र में व्यस्तता के बावजूद सामाजिक सरोकार के साथ-साथ काव्य जगत में भी उन्होंने अपनी पैठ बनाई थी। कवि सम्मेलनों में उन्हें सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे। आज वह हमारे बीच में नहीं रहे। लेकिन उनके सर्वग्राही और सर्वस्पर्शी स्वभाव की सर्वत्र चर्चा हो रही है। राजनीति में जब आज घृणा का दौर चल रहा है और हठवादिता का अतिरेक है उस समय वाजपेयी जी द्वारा बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग किए जाने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रति उनके उद्गार इस बात का सबूत हैं कि क्यों उन्हें एक प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने संयुक्तराष्टÑ संघ में उस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा जिसमें उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्य शामिल थे। उन्होंने इंदिरा गांधी की प्रशंसा करते हुए उन्हें दुर्गा तक का संबोधन प्रदान किया। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में पोखरण का दूसरा परमाणु परीक्षण हुआ जिसकी भनक तक संसार को नहीं लगी थी। उन्होंने सबसे पहले उसकी जानकारी सोनिया गांधी और विपक्ष के नेता सरदार मनमोहन सिंह को अपने यहां चाय पर बुलाकर दी थी। राजनीति में समाप्त हो रहे शिष्टाचार के काल में विपक्ष को विश्वास में लेने का उनका यह उदाहरण दिशाबोधक है। स्थानीय राजनीतिक परिस्थितिवश जिन पार्टियों ने उनका साथ छोड़ा चाहे वह डीएमके रही हो या तृणमूल कांग्रेस या फिर नेशनल कांफ्रेंस- साथ छोड़ते समय सभी के नेताओं की आंखों में आंसू थे। राजनीति में ऐसे सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व का अभ्युदय आज की परिस्थिति को देखते हुए शायद ही संभव हो सके। आज भारत सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी का देश बन गया है। इस पीढ़ी के आचरण और व्यवहार को प्रभावित कर अपनी साख जमाने के लिए राजनीतिक नेता प्रयत्नशील हैं लेकिन जिस व्यक्ति ने सर्वाधिक युवा मन को प्रभावित किया वे अटल बिहारी वाजपेयी थे। इसीलिए लोग उन्हें वृद्धावस्था तक युवा हृदय सम्राट कहा करते थे। युवा पीढ़ी को प्रेरणा देने वाले ऐसे अटल जी को शत शत प्रणाम। 

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