अमेरिका-तालिबान वार्ता अनिश्चितता का नया दौर या उम्मीद की नई किरण?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या आधी करने और तालिबान के साथ शांति वार्ता की घोषणा की है. तालिबान की हमेशा से यह मांग रही है कि अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी सेना हटा ले. ऐसे में, सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका की इन घोषणाओं से पिछले 17 सालों से विध्वंसकारी और खूनी संघर्ष की आग में झुलस रहे अफगानिस्तान में शांति लौट आएगी या फिर यह देश नई अनिश्चितताओं के दलदल में फंस जाएगा? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जब अफगानिस्तान की धरती पर अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद देश के आधे हिस्से पर तालिबान का नियंत्रण है, तो अमेरिकी सेना की वापसी के बाद इस मुल्क पर किसका सिक्का चलेगा, यह समझ से परे नहीं है.

पिछले साल दिसंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेंटागन को आदेश दिया था कि वह अगले कुछ महीनों में अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या आधी करने का बंदोबस्त करे. फिलहाल वहां 14 हजार अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. यह काम जल्द से जल्द निपटाने के लिए अमेरिका तालिबान प्रतिनिधियों से कतर में ‘शांति वार्ता’ भी कर रहा है. खबर है कि तालिबान और अमेरिका के बीच समझौते के एक मसौदे पर सहमति भी बन गई है, जिससे अमेरिका को उम्मीद है कि शांति समझौते के लिए रास्ता खुल जाएगा. जाहिर है, 17 सालों से जारी अफगानिस्तान युद्ध से अमेरिका के इस तरह अचानक कदम पीछे खींच लेने के आदेश ने न केवल अफगानिस्तान सरकार को सकते में डाल दिया था, बल्कि खुद ट्रंप प्रशासन के अधिकारी भी हैरान नजर आए थे. दरअसल, ट्रंप प्रशासन के तत्कालीन विदेश मंत्री जिम मैटिस के इस्तीफे का मुख्य कारण अफगानिस्तान और सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की जल्द घर वापसी का आदेश ही था. जिस तेजी से ट्रंप अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाना चाहते थे, उस पर मैटिस उनसे सहमत नहीं थे. मैटिस के मुताबिक, अगर जल्दबाजी में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस बुलाई गई, तो यह देश एक बार फिर गंभीर अनिश्चितता का शिकार हो जाएगा.

तालिबान के साथ बैक चैनल से चल रही बातचीत को आधिकारिक शांति वार्ता में बदलने का फैसला करते समय ट्रंप यह दावा करना नहीं भूले कि पिछले 18 सालों से अमेरिकी सेना ने तालिबान पर जो दबाव बनाया था, उसी के नतीजे में तालिबान शांति वार्ता के लिए राजी हुए हैं. जबकि जमीनी हालत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है. खुद अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका के स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल की ताजा त्रैमासिक रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान के 407 जिलों के 53.8 हिस्से पर अफगान सरकार का नियंत्रण है, जबकि शेष पर तालिबान का कब्जा है. यह स्थिति ट्रंप के बयान से मेल नहीं खाती. अगर तालिबान पर पिछले 17-18 सालों के दौरान अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में इतनी चोट पहुंची है, तो उन्होंने अफगानिस्तान के इतने बड़े हिस्से पर कब्जा कैसे कर लिया? तालिबान कितने ताकतवर हुए हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि साल 2015 से 2018 तक तकरीबन 28 हजार अफगान सैनिक तालिबान के शिकार हुए हैं. इस स्थिति को यूं भी समझा जा सकता है कि साल 2002 से 2014 तक तालिबान के खिलाफ संघर्ष में तकरीबन 20 हजार अफगान सैनिक मारे गए थे, जबकि उसके बाद केवल तीन सालों में 28 हजार सैनिक मारे गए. जाहिर है, अगर तालिबान की स्थिति कमजोर होती, तो सरकारी फौज में हताहतों की संख्या इतनी अधिक न होती.

अपनी किताब ‘तालिबान-द स्टोरी ऑफ द अफगान वारलॉर्ड्स’ के माध्यम से तालिबान का दुनिया से परिचय कराने वाले पत्रकार रशीद अहमद का मानना है कि तालिबान को लगता है कि अमेरिका उनसे बात करने के लिए पहले से अधिक तत्पर है. अतीत में रिचर्ड होलब्रुक और अन्य अमेरिकी वार्ताकारों के साथ तालिबान की जो बातचीत हुई थी, उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति या सरकार का पूर्ण समर्थन नहीं मिला था. तालिबान को अब पता है कि टं्रप अपने मतदाताओं से किए गए वादे के मुताबिक अपने सैनिक वापस बुलाने पर दृढ़ हैं. जहां एक तरफ तालिबान से बातचीत के बाद अमेरिका खुद को विजेता घोषित कर अफगानिस्तान से अपने सैनिक वापस बुलाने के बहाने तलाश रहा है, वहीं तालिबान चाहते हैं कि किसी समझौते पर पहुंचने और युद्ध विराम से पहले वे अधिक से अधिक भू-भाग पर अपना कब्जा जमा लें. उधर अमेरिका के विशेष वार्ताकार जलमय खलीलजाद के हवाले से छपी एक खबर के मुताबिक, वाशिंगटन और तालिबान के बीच पिछले महीने के आखिरी हफ्ते में चली वार्ता में काफी प्रगति हुई है और जिससे अफगानिस्तान में आशा की एक नई किरण दिखती नजर आ रही है. दरअसल, खलीलजाद तालिबान पर अफगानिस्तान सरकार से बातचीत करने के लिए दबाव डाल रहे हैं, लेकिन अफगानिस्तान सरकार को तालिबान ‘कठपुतली सरकार’ कहकर उसे खारिज करते रहे हैं.

ट्रंप की अफगानिस्तान नीति

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान और उससे पहले भी अफगानिस्तान एवं सीरिया से अमेरिकी सेना वापस बुलाने की पुरजोर वकालत की थी. अपने हालिया टवीट्स में उन्होंने अपना वही पक्ष दोहराया है. उनका कहना है कि सीरिया एवं अफगानिस्तान युद्ध में हो रहे खर्च की धनराशि देश के कार्यों में इस्तेमाल होनी चाहिए. अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें ‘असीमित खर्च वाला अंतहीन युद्ध’ विरासत में मिला है, जिसमें अमेरिका को जानी नुकसान का भी सामना करना पड़ा. मैंने अपने चुनाव अभियान के दौरान बहुत दृढ़ता से कहा था कि इन अंतहीन युद्धों का अंत होना चाहिए. ट्रंप चाहते हैं कि भारत और रूस जैसे पड़ोसी देश अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं. राष्ट्रपति बनने से पहले उन्होंने अपने एक अन्य ट्वीट में कहा था कि क्या हम अफगानों को इसलिए प्रशिक्षण दे रहे हैं, ताकि वे हमारे सैनिकों को पीठ पर गोली मार दें. यह पूरी कवायद निरर्थक है और अब अपने सैनिक वापस बुलाने का समय आ गया है. ट्रंप का कहना है कि अमेरिका हर साल अफगानिस्तान पर 50 अरब डॉलर खर्च करता है. लेकिन, ट्रंप की इस नीति की आलोचना विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के अलावा खुद उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों ने भी की है. दरअसल, ट्रंप चुनाव में जाने से पहले अपने चुनावी वादे पूरे करते हुए जल्द से जल्द अमेरिकी सेना अफगानिस्तान और सीरिया से वापस बुला लेना चाहते हैं.

अफगानिस्तान की चिंताएं

अमेरिका-तालिबान वार्ता और अमेरिकी सैनिकों की वापसी की वजह से अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी की परेशानी का अंदाजा उनके इस बयान से लगाया जा सकता है, हम तालिबान के साथ किसी समझौते से पहले, समस्या के हर पहलू पर विचार-विमर्श पर जोर देते हैं, क्योंकि हम डॉ. नजीबुल्लाह सरकार के अनुभवों से पूरी तरह अवगत हैं. हम सभी जानते हैं कि उनके साथ किस तरह विश्वासघात किया गया था. दरअसल, अशरफ गनी यह बताना चाहते हैं कि अगर अमेरिका अफगानिस्तान से निकल जाता है, तो देश में बिल्कुल वैसी ही स्थिति पैदा हो जाएगी, जैसी सोवियत यूनियन के निकलने के बाद पैदा हुई थी और जिसने तालिबान को उभरने का मौका दिया था. फिलहाल तालिबान अफगानिस्तान सरकार से बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं.

जहां तक भारत का सवाल है, तो उसने अमेरिका के सामने अपना पक्ष रखते हुए साफ किया है कि तालिबान के साथ किसी समझौते में अफगानिस्तान के मौजूदा संवैधानिक ढांचे में किसी तरह का बदलाव नहीं होना चाहिए और जुलाई में होने वाले चुनाव से पहले किसी अंतरिम सरकार को सत्ता नहीं सौंपी जानी चाहिए. लेकिन, अमेरिका की जल्दबाजी के मद्देनजर भारत तालिबान को नजरअंदाज नहीं कर सकता. खास तौर पर ऐसे समय में, जबकि रूस, चीन एवं जापान आदि देश तालिबान से बातचीत कर रहे हैं. भारत तालिबान और पाकिस्तान की नजदीकियों से भी आगाह है, साथ ही उसे यह भी मालूम है कि अमेरिका के अफगानिस्तान से निकल जाने के बाद तालिबान और अधिक ताकतवर हो जाएंगे. खबरों के मुताबिक, भारत ने भी गैर-आधिकारिक तौर पर तालिबान से संपर्क करना शुरू कर दिया है. हालांकि, तालिबान से बातचीत से पहले मुख्य अमेरिकी वार्ताकार खलीलजाद ने कहा था कि अगर तालिबान बातचीत करना चाहते हैं, तो हम उनसे बात करेंगे और अगर वे जंग चाहते हैं, तो जंग करेंगे. लेकिन, टं्रप के रुख से नहीं लगा कि अमेरिका अब अफगानिस्तान युद्ध में कोई सक्रिय भूमिका निभाएगा. जाहिर है, अगर तालिबान से बातचीत के बाद इस देश में, जहां पिछले 20-30 सालों में लाखों लोग एक अंतहीन खूनी संघर्ष के शिकार हुए हैं, शांति लौटती है, तो यह एक स्वागत योग्य बात होगी. लेकिन तालिबान के इतिहास, उनके मौजूदा रुख और अमेरिका की जल्दबाजी से यही लगता है कि यह देश अनिश्चितता के नए दौर में दाखिल हो जाएगा.

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