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उपलब्धियां बड़ी चुनौतियां कठिन

उत्तर प्रदेश में योगी की सरकार ने सक्रियता दिखाई है जिसके परिणामस्वरूप तमाम क्षेत्रों में काफी सुधार आया है। लेकिन यह समस्याओं से भरा पूरा प्रदेश है, भ्रष्टाचार और काहिली चरम पर रही है, इसलिए उसे भेदने में सरकार को निरंतर सामने आने वाली चुनौतियों से जूझना होगा।

बृजेश शुक्ल

होली दहन की रात डरते हुए घर से निकला था कि देखो सड़कों पर कितनी गुंडागर्दी देखने को मिलती है लेकिन इस बार अजब नजारा दिखा। सड़कों पर दौड़ती पुलिस की गाड़ियां और हुड़दंग मचाते लोगों की हो रही धरपकड़ के कारण सड़कों पर होली के नाम पर होने वाली गुंडागर्दी नहीं दिखी। होली के दिन ही अपने नर्सिंगहोम से मरीजों को देखकर लौट रहे डॉ. नुसरत अल्वी कहते हैं, ‘इस साल सड़कों पर वह हुड़दंग व गुंडागर्दी नहीं दिखी जैसी पिछले सालों में होती थी। होली के रंग के दिन ही जुमे की नमाज थी और तमाम आशंकाओं के बीच राज्य में शांति से जुमे की नमाज हुई।’ लेकिन कांग्रेस के नेता सुरेन्द्र राजपूत कहते हैं, ‘राज्य की पुलिस निरंकुश हो गई है। कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर एनकाउंटर हो रहे हैं। इनमें कई फर्जी हैं। सरकार भय का वातावरण बना कर कानून व्यवस्था दुरुस्त होने का दावा कर रही है।’

त्रिपुरा की ऐतिहासिक जीत से उत्साहित योगी आदित्यनाथ जानते हैं कि उनकी असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में ही है। त्रिपुरा में भाजपा की जीत का भी सेहरा योगी के सिर बांधा जा रहा है। इस जीत को लेकर बज रहे ढोल नगाड़ों के शोर के बीच राज्य के ही एक मंत्री कहते हैं कि, ‘उनकी चिंता उत्तर प्रदेश को लेकर है। यहां की लड़ाई इसलिए भी कठिन है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने भाजपा को 100 में 95 नम्बर दे दिए थे। यह भारी सफलता ही भाजपा को डराती है। तब भाजपा व सहयोगी दलों के हिस्से 80 में 73 सीटें आई थीं। त्रिपुरा की जीत को लेकर जब योगी पत्रकारों से बात कर रहे थे तभी उन्हें यह सूचना मिली कि बसपा ने सपा को उपचुनावों के लिए समर्थन दे दिया है। साफ है कि उनके लिए चुनौती बड़ी है। सुबह तीन बजे से उठकर देर रात तक योगी या तो बैठकें करते हैं या दौरे। उनके सुरक्षाकर्मी व स्टाफ के लोग कहते हैं कि योगी के साथ काम करना बहुत कठिन है। इनके साथ रहकर आप आराम नहीं कर सकते। योगी आदित्यनाथ सरकार का एक साल पूरा हो रहा है। न सिर्फ विपक्ष बल्कि भाजपा नेतृृत्व की निगाहें उत्तर प्रदेश पर टिकी हैं। 2019 में देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जानते हैं कि उनकी चुनौती एवरेस्ट की कठिन चढ़ाई जैसी है। समय कम है और चुनौतियां ज्यादा हैं। चुनौती और भी कठिन इसलिए हो जाती है कि सपा व बसपा के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं। राज्य में गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में बसपा ने सपा को समर्थन दिया है। यह अलग बात है कि सपा व बसपा के बीच यह समझौता राज्यसभा व विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हुआ है। लेकिन इन नजदीकियों ने भाजपा नेतृत्व को चिंतित जरूर कर दिया है। प्रदेश सरकार के एक मंत्री कहते हैं, ‘1993 में बसपा के संस्थापक कांशीराम व मुलायम के बीच चुनावी गठजोड़ हुआ था लेकिन पिछले पच्चीस सालों में गंगा में बहुत पानी बह गया है। जब हमारी सरकार एक साल पूरा करने जा रही है तब डरे हुए लोग अपनी दुश्मनी भुलाकर एक होने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्षी नहीं जानते कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जातीय गोलबंदी टूट चुकी है। इसका कोई असर नहीं होगा।’ लेकिन भाजपा के तमाम दावों के बावजूद उसके सामने नई चुनौती आ खड़ी हुई है। विपक्षी नेता कहते हैं कि सरकार का एक साल पूरा होने पर होने वाला जश्न अब विपक्ष ने फीका कर दिया है। लेकिन विपक्ष के सामने यह खतरा भी है कि यदि बसपा का सहयोग सपा को नहीं जिता पाता तो इन दोनों दलों की चमक फीकी पड़ेगी।

योगी सरकार को राज्य की जनता को आश्वस्त करना होगा कि भाजपा के चुनावी वादों को सरकार पूरा कर रही है। राज्य में सबसे बड़ा मुद्दा कानून व्यवस्था व बेरोजगारी का है। सपा सरकार की खराब कानून व्यवस्था को ही भाजपा ने अपना चुनावी मुद्दा बनाया था। मुख्यमंत्री समझ रहे थे कि उनकी चेतावनी से अपराधी डरेंगे लेकिन उन्हें शायद यह नहीं मालूम था कि नेताओं व अपराधियों के गठजोड़ ने अपराधियों को इतना ढीठ बना दिया है कि वे पुलिस से भी दो-दो हाथ करते हैं। भ्रष्टाचार के कारण अपराधी और बेखौफ थे। जल्द ही मुख्यमंत्री को समझ में आ गया कि उत्तर प्रदेश में अपराधी कानून से नहीं डरते। सरकारों के अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का जवाब अपराधी अपराध कर के ही देते रहे हैं। पिछले दो माह से उत्तर प्रदेश में ताबड़तोड़ एनकाउंटर हो रहे हैं। इन मुठभेड़ों में लगभग एक दर्जन बदमाश मारे गए हैं। सबसे ज्यादा मुठभेड़ें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुई हैं। परिणाम यह हुआ है कि अपराधियों के गढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपराधी जमानत रद्द करा कर जेल जा रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक थाने में तैनात पुलिस अधिकारी कहते हैं कि पुलिस तलवार की धार पर चल रही है। राज्य सरकार का दबाव है कि किसी भी कीमत पर अपराध रोके जाएं लेकिन अपराधियों के साथ कई मुठभेड़ें कानूनी पचड़े में फंसा सकती हैं। सरकार ने पुलिस को अपराधियों से निपटने के लिए खुली छूट दे रखी है। विपक्ष इन मुठभेड़ों को लेकर आक्रामक है। पुलिस के खिलाफ भी अब तमाम शिकायतें आ रही हैं। पुलिस की मनमानी को लेकर भाजपा के पदाधिकारी व विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ दर्जनों शिकायत कर चुके हैं।
राज्य के सामने सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी को लेकर है। युवाओं को सरकार से बहुत उम्मीदें हैं। राज्य सरकार उन विभागों में भर्ती के लिए जगहें निकाल रही है जिनमें पद खाली पड़े हैं। लेकिन सरकार जानती है कि इस भर्ती अभियान से बेरोजगारी की समस्या हल नहीं होने वाली। योगी सरकार ने इनवेस्टर समिट का आयोजन कर देश के शीर्ष उद्योगपतियों का मेला लगा बेरोजगारों के मन में उम्मीदें जगाई हैं। ये उम्मीदें पूरी होंगी बेरोजगारों के मन में इसको लेकर संदेह है। लगभग पांच सौ उद्योगपतियों ने राज्य में उद्योग लगाने के लिए एमओयू साइन किए। रोजगार के लिए जरूरी है कि उद्योगपतियों के साथ हुए समझौते धरती पर उतरें। जो एमओयू साइन हुए हैं वे धरती पर उतरें इसके लिए बैठकों का दौर चल रहा है।

योगी सरकार ने किसानों के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इस साल बजट में उनके लिए सरकार ने खजाना खोल दिया। बुंदेलखंड में सूखे व भुखमरी की मार झेल रहे किसानों के लिए सरकार ने पांच हजार तालाब बनाने की योजना के लिए धन आवंटित किया है। आवारा पशुओं के लिए गोशाला बनवाने के लिए धन की व्यवस्था की गई है। किसान अपना माल सीधे बेच सके इसके लिए 20 कृषि उत्पादन केन्द्र खोले जा रहे हैं। लेकिन इन तमाम योजनाओं के बावजूद राज्य के किसान अभी भी परेशान हैं। सबसे बड़ी चुनौती है कि योजनाएं धरती पर कैसे उतरें। पिछले सत्तर सालों से किसानों के लिए योजनाएं तो बनती रहीं लेकिन इन योजनाओं का बड़ा हिस्सा दलालों की जेब में चला गया। अब सरकार दावा कर रही है कि एक एक पैसा योजनाओं पर ही लगेगा। योगी सरकार ने किसानों के एक लाख रुपये तक के ऋण माफ किए। कर्ज में डूबे तमाम किसानों के लिए यह वरदान साबित हुआ। पिछले वर्ष सरकार की गेहूं खरीद योजना ने किसानों का दिल जीत लिया। बाराबंकी के रामनगर के किसान सर्वेश वर्मा कहते हैं, ‘योगी सरकार ने गेहूं खरीद में दलालों को बाहर कर दिया। इसका फायदा किसानों को मिला। गेहूं खरीद का पैसा किसानों के खाते में आया। सरकार के इन तमाम प्रयासों के बावजूद किसान अभी परेशान हैं। इस वर्ष आलू के रिकार्ड उत्पादन ने किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया।’ सरकार ने किसानों से आलू खरीदने की योजना बनाई लेकिन इसका लाभ किसानों को नहीं मिल सका। वास्तव में किसानों से आलू खरीदने की योजना कारगर साबित नहीं हुई। किसानों को अपना आलू फेंकना पड़ा। आगरा में आलू किसान मुनव्वर कहते हैं, ‘पांच छह साल में ऐसा चक्र आता है जब आलू मिट्टी के मोल बिकता है। सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे किसान को बर्बाद होने से बचाया जा सके। जब भी यह चक्र आता है सरकार किसान से आलू खरीद का वादा करती है लेकिन कुछ टन आलू खरीद कर वादा निभाने के झूठे दावे होते हैं।’

सरकार उन वादों को पूरा करना चाहती है जो उसने राज्य की जनता से किए थे। लेकिन भाजपा में ही यह आरोप लग रहे हैं कि अफसर सरकारी योजनाओं को ईमानदारी से लागू करने में बाधक हैं। योगी सरकार भूमाफिया के विरुद्ध अभियान चला रही है, जिनकी सूची भी बनवा ली गई है। उत्तर प्रदेश में भूमाफिया सबसे ताकतवर हैं। पिछली सरकारों में उनकी तूती बोलती रही है। भूमाफिया की प्रशासन पर गहरी पकड़ है। सरकार दावा कर रही है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले जेल जाएंगे। लेकिन बहुत से अधिकारी पंचायतों की उन जमीनों पर कब्जा हटवाने में लग गए जिन पर बीस पच्चीस साल पहले ग्रामीणों ने मकान बनवा लिए थे। मोहनलालगंज के भाजपा सांसद कौशल किशोर मुख्यमंत्री से मिलकर यह आरोप लगा चुके हैं कि अधिकारियों की कृपा के कारण ही अरबों खरबों की सरकारी जमीन पर भूमाफिया काबिज हैं। अब वही अधिकारी सरकार के अभियान को पटरी से उतार देना चाहते हैं। वह बताते हैं, ‘मलिहाबाद के पास एक पूरे गांव को ही ढहाने का वन विभाग के अधिकारियों ने नोटिस दे दिया। जबकि इस गांव को बसे लगभग पचास साल हो चुके हैं। गरीबों को उनके मकान ढहाने का नोटिस दे अधिकारी असली भूमाफिया को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।’

राज्य में बिजली व्यवस्था में सुधार हुआ है। सरकार सत्तारूढ़ दल के नेताओं के गृह जनपद नहीं बल्कि धार्मिक स्थलों में 24 घंटे बिजली आपूर्ति कर रही है। सरकार की कोशिश है कि इस साल गर्मी के मौसम में बेहतर विद्युत आपूर्ति कर अपने दावे को सच साबित करे।
उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के पास एक कस्बा है अजुहा। वैसे तो अजुहा गल्ले की बड़ी मंडी है, लेकिन पिछले एक दशक से उसे नकल मंडी के नाम से जाना जाता है। इस तरह की कई दर्जन नकल मंडियां राज्य भर में नकलचियों के लिए स्वर्ग रही हैं। राज्य में नकल का कारोबार लगभग सात हजार करोड़ का है। इस बार इन नकल मंडियों में सन्नाटा पसरा रहा, जिससे नकल माफिया की कमर टूट गई। योगी सरकार ने नकल उद्योग की कमर तोड़ दी। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रवक्ता आर पी मिश्र कहते हैं, ‘नकल पर अंकुश लगा है लेकिन सरकार को अभी और प्रयास करने होंगे। सरकार ने परीक्षा केन्द्रों के चयन में पारदर्शिता बरती। सभी परीक्षा केन्द्रों में सीसीटीवी की मदद से नकल रोकी गई।

यूपी नहीं देखा तो इंडिया नहीं देखा
यूपी नहीं देखा तो इंडिया नहीं देखा। पिछले दिनों राज्य की पर्यटनमंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने अपने आवास पर एक कैलेंडर जारी किया जिसमें हर पर्यटन स्थल के बारे में बताते हुए ये शब्द लिखे गए थे। इससे साफ हो गया कि योगी सरकार पर्यटन को बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।
ताजमहल पर ही सरकारों का पूरा भरोसा रहा है। पूरी दुनिया के पर्यटक ताज देखने उत्तर प्रदेश आते थे। उनमें कुछ काशी की ओर भी रुख कर लेते थे। लेकिन अब सरकार ने धार्मिक पर्यटन पर जोर दिया है। जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बरसाने में होली मनाने का निर्णय किया तो विपक्ष उन पर हमलावर हुआ। इससे पहले मुख्यमंत्री अयोध्या में दीपावली मना चुके थे।
वृृंदावन में एक छोटी सी दुकान के मालिक राजीव लोचन शर्मा विपक्ष पर ही सवाल उठाते हैं, ‘यदि सरकारों ने पर्यटन पर ध्यान दिया होता तो लाखों लोगों को रोजगार मिलता। उत्तर प्रदेश में क्या नहीं है। यहां सिर्फ ताजमहल ही नहीं है। राम की नगरी अयोध्या यहीं है। चित्रकूट यहीं है। कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा, उनकी लीला स्थली वृंदावन, बरसाना नंदगांव, गोकुल गोर्वधन भी यहीं है। बाबा विश्वनाथ यहीं निवास करते हैं। शेख सलीम चिश्ती व मलिक मोहम्मद जायसी की मजार व जन्मस्थली यहीं है। भगवान बुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर व जहां पहली बार अपने शिष्यों को उपदेश किया वह सारनाथ भी यहीं है। वास्तव में सरकार यदि धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है तो इससे लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है।’

बड़ा निर्णय लेकिन कार्यकर्ता नाराज
राजधानी लखनऊ के एक जिले के लोकनिर्माण विभाग के अधिकारी बहुत परेशान थे। पूछा तो बताने लगे कि अब सरकार ने ठेके देने की जो प्रक्रिया अपनाई है उससे उनके हाथ पैर बंध गए हैं। एक बड़े ठेके के लिए सरकार के एक बड़े मंत्री व सचिव ने सिफारिश की थी। अब छोटे छोटे काम के लिए भी ई टेंडर ही पड़ते हैं। जब टेंडर खुले तो ठेका मंत्री व सचिव के कृपापात्र नहीं पा सके। टेंडर लगभग 22 प्रतिशत नीचे डाला गया था।’ यही हाल लगभग सभी ठेकों का है। जो लोग बहुत 15 से 20 प्रतिशत तक नीचे जाकर ठेके ले रहे हैं उनका कहना है कि अब ठेकों में बचत बहुत कम है। राज्य के तमाम विधायक व सांसद सरकार से इस बात पर नाराज हैं कि उसने छोटे ठेकों पर भी ई टेंडरिंग की प्रक्रिया लागू कर दी है। यह मुद्दा सरकार व संगठन की बैठकों में भी उठ चुका है। पार्टी के एक विधायक कहते हैं, ‘जिन कार्यकर्ताओं ने चुनाव में सर्वस्व झोंक दिया, उनके लिए पार्टी कुछ नहीं कर रही है। सरकार ने पार्टी कार्यकर्ताओं के ठेके व सरकारी कोटा लेने पर भी रोक लगा दी है।’

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